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लाल आतंक तो गया, अब 'नो सिग्नल' ले रहा जान! झारखंड के चतरा में पहाड़ चढ़कर हाजिरी दे रहे गुरुजी

झारखंड के चतरा में डिजिटल इंडिया का सपना दम तोड़ रहा है. यहां एम्बुलेंस बुलाने के लिए पहाड़ फतह करना पड़ता है और गुरुजी को हाजिरी के लिए पेड़ पर चढ़ना पड़ता है. पढ़ें चतरा से सूर्यकांत कमल की यह ग्राउंड रिपोर्ट.

लाल आतंक तो गया, अब 'नो सिग्नल' ले रहा जान! झारखंड के चतरा में पहाड़ चढ़कर हाजिरी दे रहे गुरुजी
चतरा में लाल आतंक से भी ज्यादा मोबाइल नेटवर्क का खौफ, पहाड़ पर चढ़कर हाजिरी लगा रहे गुरुजी
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Jharkhand News in Hindi: एक दौर था जब झारखंड के चतरा का जिक्र होते ही 'लाल आतंक' की दहशत दिलो-दिमाग पर छा जाती थी. आज बंदूकें तो खामोश हैं, लेकिन विकास की रफ्तार अब भी कोसों दूर है. जहां देश 5G की ऊंची उड़ान भर रहा है, वहीं चतरा के सुदूर इलाकों में मोबाइल नेटवर्क 'लाल आतंक' से भी ज्यादा खौफनाक साबित हो रहा है. यहां मोबाइल फोन जेब में रखने वाली चीज नहीं, बल्कि सिग्नल ढूंढने के लिए पहाड़ों और पेड़ों पर चढ़ने का एक जरिया मात्र बनकर रह गया है.

हाजिरी के लिए क्लास नहीं, पहाड़ चढ़ना है जरूरी

डिजिटल एजुकेशन के इस दौर में चतरा के प्रतापपुर और कुंदा प्रखंड की तस्वीरें देख आपका कलेजा कांप जाएगा. प्रतापपुर के बामी गांव के स्कूल में डिजिटल क्लास तो दूर की बात, गुरुजी को अपनी 'ऑनलाइन हाजिरी' बनाने के लिए स्कूल छोड़कर ऊंचे पहाड़ों की दौड़ लगानी पड़ती है. सहायक शिक्षक शशि कुमार गुप्ता बताते हैं कि अगर पहाड़ पर चढ़कर नेटवर्क मिल गया तो हाजिरी लग गई, वरना उस दिन वे सरकारी कागजों में 'गैरहाजिर' मान लिए जाते हैं.

मोबाइल नेटवर्क के लिए पेड़ पर चढ़े युवक.

मोबाइल नेटवर्क के लिए पेड़ पर चढ़े युवक.
Photo Credit: NDTV Reporter

30 गांवों में नेटवर्क के लिए जान जोखिम में डाल रहे लोग

कुंदा प्रखंड के 78 में से करीब 30 गांव आज भी पूरी तरह 'डिजिटल ब्लैकआउट' में जी रहे हैं. कुटिल, मरगड़ा, एकता और दारी जैसे गांवों में मोबाइल सिर्फ एक महंगा खिलौना है. मेडिकल इमरजेंसी हो या कोई जरूरी कॉल, ग्रामीणों को घंटों पैदल चलकर किसी ऊंचे पेड़ या पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है. विडंबना देखिए कि इलाके में बीएसएनएल (BSNL) के टॉवर तो खड़े हैं, लेकिन वे काम नहीं कर रहे हैं.

बीएसएनएल के अधिकारियों ने दी सफाई

ग्रामीण विकास कुमार गंझू का कहना है कि बीमार मरीजों के लिए एम्बुलेंस बुलाना भी यहां किसी जुए से कम नहीं. फोन लगेगा या नहीं, यह पूरी तरह किस्मत और पहाड़ की ऊंचाई पर निर्भर है. इस मुद्दे पर बीएसएनएल के अधिकारियों का तर्क है कि जंगल क्षेत्रों में केवल 700 MHz बैंड लगा है, जबकि बेहतर कनेक्टिविटी के लिए 2100 MHz की जरूरत है.

विधायक का आश्वासन, पर जनता का सवाल वही...

चतरा विधायक जनार्दन पासवान ने इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए जल्द समाधान का भरोसा दिया है. लेकिन सवाल वही है- क्या 'डिजिटल इंडिया' का शोर इन सुदूर गांवों तक पहुंचेगा? क्या गुरुजी को हाजिरी के लिए जान जोखिम में डालकर पहाड़ चढ़ना बंद होगा? चतरा की जनता अब खोखले वादों नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन पर 'नेटवर्क की डंडियों' का इंतजार कर रही है.

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