राजधानी रांची के नगड़ी में प्रस्तावित रिम्स-2 परियोजना को लेकर झारखंड की राजनीति एक बार फिर गर्म हो गई है. राज्य मंत्रिमंडल द्वारा करीब 4,189 करोड़ रुपये की लागत से रिम्स-2 के निर्माण को प्रशासनिक स्वीकृति दिए जाने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने सरकार के फैसले पर खुलकर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि सरकार को इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले नगड़ी के रैयतों और ग्रामीणों से संवाद करना चाहिए था. राज्य कैबिनेट ने 2जुलाई को इस महत्वाकांक्षी रिम्स 2 परियोजना को मंजूरी दी है.
हेमंत को नहीं भूलना चाहिए वह शिबू सोरेन के बेटे हैं
बंधु तिर्की ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे शिबू सोरेन के पुत्र हैं. शिबू सोरेन ने हमेशा जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ी है. यदि नगड़ी के रैयत अपनी जमीन को लेकर विरोध कर रहे हैं तो उनकी बात भी गंभीरता से सुनी जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन विकास के नाम पर स्थानीय लोगों की सहमति और अधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए.
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भूमि अधिग्रहण पर बंधु तिर्की का बड़ा सवाल
पूर्व मंत्री ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध रिम्स-2 या स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार से नहीं है. उनका कहना है कि झारखंड को आधुनिक चिकित्सा संस्थान की जरूरत है, लेकिन इसके लिए उपजाऊ रैयती और खतियानी जमीन का अधिग्रहण उचित नहीं है. सरकार को ऐसा वैकल्पिक स्थल तलाशना चाहिए, जहां परियोजना भी बने और किसानों तथा आदिवासी परिवारों का विस्थापन भी न हो. यह रुख वह पहले भी सार्वजनिक रूप से रखते रहे हैं.
दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि रिम्स-2 बनने से झारखंड में सुपर स्पेशियलिटी स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा विस्तार होगा. नए अस्पताल परिसर में अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं, अतिरिक्त बेड, मेडिकल शिक्षा और अनुसंधान की बेहतर व्यवस्था विकसित की जाएगी, जिससे राज्य के मरीजों को दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम करनी पड़ेगी.
बंधु तिर्की के सवाल से बढ़ा बवाल
अब पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के ताजा बयान के बाद रिम्स-2 परियोजना महज एक विकास परियोजना नहीं रह गई है, बल्कि यह स्थानीय रैयतों के अधिकार, भूमि अधिग्रहण, विस्थापन और राजनीतिक संवेदनशीलता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुकी है. परियोजना को लेकर एक ओर सरकार इसे स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की दिशा में ऐतिहासिक पहल बता रही है, तो दूसरी ओर प्रभावित ग्रामीण अपनी जमीन और आजीविका की सुरक्षा को लेकर आंदोलनरत हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और ग्रामीणों के बीच होने वाला संवाद, सहमति और समाधान की प्रक्रिया ही इस महत्वाकांक्षी परियोजना की दिशा और भविष्य तय करेगी.
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