- पद्मनाभस्वामी मंदिर के सातवें दरवाजे को धार्मिक मान्यताओं और जहरीली गैसों के कारण अब तक नहीं खोला गया है
- चीन के पहले सम्राट चिन शिन हुआंग की कब्र में पारे की नदियां और यांत्रिक जाल हैं, जिसके कारण छेड़ा नहीं गया
- गिजा पिरामिड के क्वींस चैंबर की संकरी सुरंगों के अंत में दो पत्थर के दरवाजे हैं, जिन्हें खोला नहीं जा सका
Unopened Doors In The World: कहते हैं कि इंसान की उत्सुकता और विज्ञान की ताकत के आगे प्रकृति और इतिहास ने हमेशा घुटने टेके हैं. लेकिन दुनिया के नक्शे पर कुछ ऐसे दरवाजे, तहखाने और तिजोरियां भी मौजूद हैं, जहां पहुंचकर आधुनिक तकनीक और महाशक्तियों तक के कदम ठिठक जाते हैं. भारत के सुदूर दक्षिण में स्थित एक मंदिर का सातवां दरवाजा हो या चीन की जमीन के नीचे दफन एक सम्राट का साम्राज्य— इन जगहों को आज तक पूरी तरह से खोला नहीं जा सका है. इन्हें बंद रखने के पीछे केवल भूत-प्रेत या प्राचीन श्रापों के मिथक नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे छिपा है प्राचीन इंजीनियरिंग का वो खौफनाक विज्ञान और सरकारों की वो व्यावहारिक मजबूरियां, जिसने दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों को भी लाचार कर दिया है. आइए इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे ही रहस्यों की परतें खोलते हैं जिनके आगे आज का आधुनिक विज्ञान और ताकत भी नतमस्तक है. सबसे पहले बात अपने देश भारत से शुरू करते हैं.
1. पद्मनाभस्वामी मंदिर का 'वोल्ट बी': नागबंधम और हवा का अदृश्य पहरा
केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की तिजोरियों ने उस समय पूरी दुनिया की आंखें चौंधिया दी थीं, जब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में इसके पांच द्वारों को जून-जुलाई 2011 में खोला गया. वहां से करीब एक लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का जो खजाना निकला, उसने इस मंदिर को दुनिया का सबसे अमीर मंदिर बना दिया. लेकिन असली सस्पेंस तब शुरू हुआ, जब भारत के पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) विनोद राय (Vinod Rai) की टीम 'वोल्ट बी' (सातवें दरवाजे) के सामने जाकर खड़ी हो गई.उसे अब तक खोला नहीं जा सका है.

मिथक और मान्यता: इस दरवाजे पर न तो कोई ताला है और न ही कोई कुंडी. सदियों से यह मान्यता चली आ रही है कि इसे प्राचीन काल में सिद्ध पुरुषों ने 'नाग पाशम' या 'नाग बंधम' मंत्रों के जरिए लॉक किया था. त्रावणकोर राजपरिवार और स्थानीय पुरोहितों का स्पष्ट कहना है कि इसे केवल वही खोल सकता है जिसे 'गरुड़ मंत्र' का शुद्ध और सटीक उच्चारण आता हो. किसी भी मशीन या आधुनिक औजार से इसे जबरन खोलने का मतलब सीधे तौर पर प्रलय या देश पर किसी बड़े विनाश को बुलावा देना होगा.
वैज्ञानिक सच: जब विज्ञान के चश्मे से इस रहस्य को देखा जाता है, तो इसकी परतें और दिलचस्प हो जाती हैं. पुरातत्वविदों के अनुसार, यह तहखाना सदियों से पूरी तरह से 'एयर-टाइट' यानी हवा रहित बंद है. इतने लंबे समय तक बिना वेंटिलेशन के बंद रहने के कारण इसके भीतर अत्यधिक जहरीली गैसों का भारी जमावड़ा हो चुका है. बिना अत्यधिक आधुनिक लाइफ-सपोर्ट सिस्टम के इस दरवाजे को पार करना किसी के लिए भी आत्मघाती साबित हो सकता है. इसके साथ ही, भारत की सर्वोच्च अदालत और सरकार भी स्थानीय जनभावनाओं, गहरी धार्मिक आस्था और राजपरिवार के अधिकारों का सम्मान करते हुए इस संवेदनशील मामले में आगे बढ़ने से बचती आई है.
ये भी पढ़ें: बजाज चेतक: कभी इस स्कूटर पर दौड़ता था देश, 70 देशों में होता था निर्यात, फिर कैसे पहुंचा अर्श से फर्श पर?
2. चिन शिन हुआंग की कब्र: पारे की नदियां और तकनीक की लाचारी
साल 1974 में चीन के शीआन में जब कुछ किसान कुआं खोद रहे थे, तब उनके हाथ मिट्टी के सैनिकों की एक विशाल फौज लगी, जिसे आज हम 'टेराकोटा आर्मी' के नाम से जानते हैं. यह फौज चीन के पहले सम्राट चिन शिन हुआंग के मकबरे की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी. यह खोज जितनी बड़ी थी, उसके पीछे का रहस्य उतना ही खौफनाक निकला, क्योंकि सम्राट की मुख्य कब्र को आज पांच दशक बाद भी चीन सरकार ने खोलने की हिम्मत नहीं दिखाई है.
प्राचीन जाल और मिथक: चीनी इतिहासकार सिमा कियान के प्राचीन दस्तावेजों में दावा किया गया है कि सम्राट को अमर होने की सनक थी और वे पारे (Mercury) को जादुई द्रव्य मानते थे. उन्होंने अपनी कब्र को सुरक्षित रखने के लिए उसके चारों तरफ पारे की बहती हुई कृत्रिम नदियां और झीलें बनवाई थीं. साथ ही, कब्र के भीतर घुसपैठियों को मार गिराने के लिए ऑटोमेटिक तीर-कमान के यांत्रिक जाल फिट किए गए थे.

विज्ञान का खौफ: शुरुआत में इतिहासकारों ने इसे महज एक डरावनी कहानी माना था. लेकिन जब आधुनिक वैज्ञानिकों ने रोबोटिक कैमरों और मृदा परीक्षण (Soil Testing) का सहारा लिया, तो सच सामने आ गया. मकबरे के आसपास की मिट्टी में पारे का स्तर सामान्य से सैकड़ों गुना अधिक पाया गया. पारे की इतनी भारी मात्रा का मतलब है कि कब्र का दरवाजा खुलते ही जो जहरीली भाप निकलेगी, वह पलक झपकते ही इंसान के फेफड़ों और तंत्रिका तंत्र को तबाह कर देगी. दूसरा बड़ा कारण पुरातत्व विज्ञान की अपनी सीमा है. जब टेराकोटा सैनिकों को पहली बार निकाला गया, तो हवा के संपर्क में आते ही उन पर लगा सदियों पुराना रंगीन पेंट कुछ ही मिनटों में उड़ गया और वे भूरे पड़ गए. चीनी वैज्ञानिक नहीं चाहते कि मौजूदा अधूरी तकनीक के कारण सम्राट की कब्र के भीतर मौजूद बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहरें हवा लगते ही हमेशा के लिए नष्ट हो जाएं.
ये भी पढ़ें: डालडा कभी भारतीय किचन का था किंग ! 90% बाजार पर था कब्जा, जानिए कैसे अर्श से पहुंचा फर्श पर ?
3. गिजा का ग्रेट पिरामिड: 'क्वींस चैंबर' के बंद रास्ते और रोबोट्स की नाकामी
रहस्यों की बात हो और मिस्र के पिरामिडों का जिक्र न हो, ऐसा मुमकिन नहीं है. गिजा के ग्रेट पिरामिड के भीतर राजा और रानी के कक्ष (किंग्स एंड क्वींस चैंबर) बने हैं. क्वींस चैंबर के भीतर दो बेहद संकरी सुरंगें जाती हैं, जो बाहर नहीं खुलतीं बल्कि पिरामिड की दीवारों के भीतर ही कहीं खत्म हो जाती हैं.साल 1993 और फिर 2002 में, वैज्ञानिकों ने इन संकरी सुरंगों के भीतर छोटे रोबोटिक कैमरे भेजे. सुरंग के आखिर में रोबोट्स का रास्ता एक छोटे पत्थर के दरवाजे ने रोक दिया, जिसमें तांबे के दो पिन लगे हुए थे. जब वैज्ञानिकों ने रोबोटिक ड्रिल के जरिए उस पत्थर में छोटा सा छेद करके कैमरा अंदर डाला, तो सामने कुछ फीट की दूरी पर एक और पत्थर का दरवाजा दिखाई दिया, जिसे आज तक खोला नहीं जा सका है.

वैज्ञानिक असमंजस: पिरामिड की इस अद्भुत इंजीनियरिंग को लेकर वैज्ञानिक आज भी हैरान हैं. इस दरवाजे को पूरी तरह तोड़ने का मतलब होगा पिरामिड के आंतरिक ढांचे के संतुलन को खतरे में डालना. पुरातत्वविद आज भी इस उलझन में हैं कि आखिर इन गुप्त द्वारों के पीछे ऐसा क्या छिपाया गया था, जिसे सुरक्षित रखने के लिए पिरामिड के भीतर भी एक और अभेद्य दीवार खड़ी करनी पड़ी.
4. तियाहुआनाको का 'सूर्य द्वार': पाषाण विज्ञान की अनसुलझी पहेली
समुद्र तल से करीब 13,000 फीट की ऊंचाई पर बोलिविया के एंडीज पर्वतों में स्थित 'तियाहुआनाको' का प्राचीन शहर आज भी रहस्यों से घिरा है. इसी शहर में मौजूद है 'गेटवे ऑफ द सन' यानी सूर्य द्वार. यह कोई आम दरवाजा नहीं है, बल्कि एक ही विशालकाय ग्रेनाइट पत्थर को काटकर बनाया गया 10 टन वजनी ढांचा है. इस दरवाजे के ऊपर एक अज्ञात ईश्वर और उनके चारों तरफ 48 रहस्यमयी आकृतियां उकेरी गई हैं. पुरातत्वविदों का मानना है कि यह दरवाजा असल में एक बेहद जटिल खगोलीय और सौर कैलेंडर है, जो प्राचीन काल में ग्रहों की चाल की सटीक गणना करता था.

विज्ञान के पीछे हटने की वजह: भू-वैज्ञानिकों के पास आज भी इसका जवाब नहीं है कि बिना किसी आधुनिक क्रेन या लोहे के औजारों के, इतनी ऊंचाई पर 10 टन के एक ही पत्थर को इतनी महीन कलात्मकता के साथ कैसे काटा गया. इस दरवाजे से जुड़े रहस्यों को जबरन खोजने की कोशिशों पर बोलिवियाई सरकार ने इसलिए रोक लगा रखी है, क्योंकि ग्रेनाइट का यह प्राचीन ढांचा बेहद संवेदनशील स्थिति में है और थोड़ी सी भी मानवीय चूक इसे हमेशा के लिए नष्ट कर सकती है.
5. मिस्र का 'ग्रेट स्फिंक्स': पंजे के नीचे छिपा 'हॉल ऑफ रिकॉर्ड्स'
गिजा के पिरामिडों के ठीक सामने बैठी हुई शेर के शरीर और इंसान के सिर वाली 'ग्रेट स्फिंक्स' की विशाल मूर्ति सदियों से इंसानी कौतूहल का केंद्र रही है. लेकिन इसका सबसे बड़ा रहस्य इसके ठीक नीचे छिपा है, जिसे आज तक आधिकारिक तौर पर खोला नहीं जा सका है.कुछ इतिहासकारों का दावा है कि स्फिंक्स के दाहिने पंजे के ठीक नीचे जमीन में एक गुप्त कमरा है, जिसे 'हॉल ऑफ रिकॉर्ड्स' कहा जाता है. माना जाता है कि इस कमरे में मानव सभ्यता का पूरा इतिहास और खोए हुए द्वीप 'अटलांटिस' की उन्नत तकनीक के दस्तावेज रखे हुए हैं.
वैज्ञानिक जांच और रोक: साल 1990 के दशक में वैज्ञानिकों ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग राडार (GPR) के जरिए जांच की, तो स्फिंक्स के पंजों के नीचे सचमुच कुछ कृत्रिम चैंबर्स मौजूद होने की पुष्टि हुई. लेकिन मिस्र के पुरातत्व विभाग ने इस जगह पर किसी भी तरह की खुदाई पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है. वजह यह है कि स्फिंक्स की यह मूर्ति चूना पत्थर (Limestone) से बनी है, जो समय के साथ बेहद कमजोर हो चुका है. इसके नीचे किसी भी तरह की खुदाई पूरी मूर्ति के ढहने का कारण बन सकती है.
6. तेओतिहुआकान: मेक्सिको के पिरामिड के नीचे 'पारे की गुप्त सुरंग'
मेक्सिको में स्थित 'प्लम्ड सर्पेंट' पिरामिड के नीचे पुरातत्वविदों को साल 2003 में एक ऐसी गुप्त सुरंग का पता चला, जो करीब 1800 साल से पूरी तरह सील थी. प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, यह सुरंग पाताल लोक में जाकर खुलती है. जब शोधकर्ताओं ने रोबोटिक कैमरों की मदद से इस सुरंग के आखिरी छोर पर मौजूद तीन गुप्त कक्षों की जांच की, तो वहां भारी मात्रा में लिक्विड मरकरी (तरल पारा) फैला हुआ मिला. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह पारा प्राचीन काल में किसी पवित्र नदी को दर्शाने के लिए वहां भरा गया था. अत्यधिक जहरीले पर्यावरण और सुरंग के ढहने के खतरे के कारण, इस गुप्त चैंबर के अंतिम द्वारों को पूरी तरह से खोलने की अनुमति आज भी नहीं मिली है. अब बात करते हैं एक ऐसे दरवाजे की जो आधुनिक काल का है लेकिन इसे भी खोलने की अनुमति नहीं है.

7. स्वालबार्ड ग्लोबल सीड वॉल्ट: कयामत के दिन की तिजोरी
यह तिजोरी किसी प्राचीन राजा ने नहीं, बल्कि आधुनिक इंसानों ने खुद बनाई है. आर्कटिक महासागर में नॉर्वे के एक सुदूर द्वीप पर बर्फ की पहाड़ियों को काटकर 400 फीट की गहराई में 'स्वालबार्ड ग्लोबल सीड वॉल्ट' बनाया गया है. इसे दुनिया की सबसे सुरक्षित तिजोरी माना जाता है, जिसे 'डूम्सडे वॉल्ट' (कयामत के दिन की तिजोरी) भी कहते हैं. इस वॉल्ट के भीतर दुनिया भर की फसलों के करोड़ों बीजों के बैकअप को सुरक्षित रखा गया है, ताकि अगर कभी परमाणु युद्ध, एस्टेरॉयड का हमला या कोई वैश्विक महामारी आए और धरती से सब कुछ खत्म हो जाए, तो यहां से इंसानी जिंदगी को दोबारा शुरू किया जा सके.
इस तिजोरी के दरवाजे को खोलने की अनुमति दुनिया के किसी भी अमीर या ताकतवर शख्स को नहीं है. यह इलाका पूरी तरह से सैन्य निगरानी और आधुनिक मोशन सेंसर्स से लैस है. इस डिजिटल युग में भी इस तिजोरी को किसी भी तरह के इंटरनेट या नेटवर्क से दूर रखा गया है ताकि इसे हैक न किया जा सके. इसे केवल बेहद खास आपातकालीन परिस्थितियों में ही अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत खोला जा सकता है.कुल मिलाकर चाहे वह प्राचीन काल की वास्तुकला और इंजीनियरिंग का खौफ हो, या फिर भविष्य को सुरक्षित रखने की आधुनिक इंसानी जिद— दुनिया के ये बंद दरवाजे और तिजोरियां इस बात का प्रमाण हैं कि सब कुछ जान लेने का दावा करने वाला विज्ञान आज भी इतिहास और भविष्य के कुछ पन्नों के सामने बेबस खड़ा है.
ये भी पढ़ें: 'मेलोडी' वाले पारले की कहानी जान लीजिए 'G': कैसे बना दुनिया का सबसे बड़ा बिस्किट साम्राज्य ?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं