- कर्नाटक सरकार द्वारा महिला कर्मचारियों को मासिक धर्म अवकाश देने के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है.
- याचिकाकर्ता महिलाओं का तर्क है कि मासिक धर्म अवकाश समानता के संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है.
- उनका तर्क है कि मासिक धर्म के दौरान अनिवार्य अवकाश कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव बढ़ा सकता है.
कर्नाटक सरकार द्वारा महिला कर्मचारियों को मासिक धर्म अवकाश देने के आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है. इस याचिका में विभिन्न निजी कंपनियों में कार्यरत करीब 17 महिला कर्मचारियों ने राज्य सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं. साथ ही सरकार से मासिक धर्म अवकाश को रद्द करने की भी मांग की है.
याचिकाकर्ता महिलाओं का कहना है कि यह नियम समानता के संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है. उनका तर्क है कि मासिक धर्म के दौरान अनिवार्य अवकाश की व्यवस्था कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव को बढ़ावा दे सकती है. उन्होंने आशंका जताई कि इस तरह की नीति से नियोक्ता महिलाओं को नियुक्त करने से कतराने लग सकते हैं.
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यह लैंगिक समानता के सिद्धांत के विपरीत: याचिकाकर्ता
महिला कर्मचारियों ने अदालत को बताया कि ऐसी नीति से यह धारणा बन सकती है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम सक्षम हैं, जो लैंगिक समानता के सिद्धांत के विपरीत है. उनका कहना है कि भले ही सरकार का उद्देश्य महिलाओं की सुविधा और स्वास्थ्य से जुड़ा हो, लेकिन इसके व्यावहारिक और दीर्घकालिक प्रभाव नकारात्मक हो सकते हैं.
पुरुष कर्मचारियों ने किया था सरकार के आदेश का विरोध
याचिका में हाई कोर्ट से राज्य सरकार के मासिक धर्म अवकाश आदेश को रद्द करने की मांग की गई है. उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी कुछ पुरुष कर्मचारियों ने इस नीति का विरोध किया था. अब इस मुद्दे पर महिला कर्मचारियों के अदालत पहुंचने के बाद बहस और तेज हो गई है. मामले पर हाई कोर्ट में सुनवाई जारी है और फैसले पर राज्य भर के कर्मचारियों और कॉरपोरेट सेक्टर की नजर बनी हुई है.
बता दें कि कर्नाटक सरकार ने पिछले साल दिसंबर में सरकारी क्षेत्र में कार्यरत महिला कर्मचारियों को हर महीने एक दिन का मासिक धर्म अवकाश देने का आदेश दिया था. सरकार ने आदेश जारी कर स्थायी, संविदा और आउटसोर्स नौकरियों में कार्यरत 18 से 52 वर्ष की आयु की महिलाओं के लिए यह आदेश जारी किया था.
उधर, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश की नीति लाने के अनुरोध से संबंधित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया था. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसी स्थिति में महिलाओं को नौकरी देना मुश्किल हो सकता है और इस तरह का प्रावधान अनजाने में लैंगिक रूढ़ियों को और मजबूत कर सकता है.
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