- केतन अग्रवाल मर्डर केस में सिया को फांसी की सजा दिए जाने की मांग की जा रही है.
- लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में महिलाओं को फांसी दिए जाने और उन्हें फंदे से लटकाने का मामला बहुत रेयर है.
- आजाद भारत के 79 साल के इतिहास में केवल एक ही बार किसी महिला को कानूनन रूप से फंदे से लटकाया गया है.
Ketan Agarwal Murder Case: सिया और केतन के मामले ने इस वक्त पूरे देश को हिलाकर रख दिया है. सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, सिया के खिलाफ गुस्सा चरम पर है और लोग लगातार उसके लिए मृत्युदंड (फांसी) की मांग कर रहे हैं. लेकिन क्या भारतीय न्याय व्यवस्था में एक महिला अपराधी को फांसी के फंदे तक पहुंचाना इतना आसान है? जब भावनाओं का तूफान शांत होता है, तब कानून की असली किताब खुलती है. इतिहास गवाह है कि आजाद भारत में महिलाओं को मृत्युदंड मिलना 'दुर्लभ से दुर्लभतम' रहा है. आइए समझते हैं कि देश का कानून और इतिहास इस मांग पर क्या कहता है.
1955 का वो इकलौता मामला: जब भारत में पहली और आखिरी बार किसी महिला को फांसी हुई
आज भले ही लोग सिया के लिए फांसी की मांग कर रहे हों, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक केवल एक ही महिला को कानूनी तौर पर फांसी के फंदे पर लटकाया गया है. उस महिला अपराधी का नाम था रतनबाई जैन.
क्या था रतनबाई जैन का अपराध?
रतनबाई जैन दिल्ली के एक फर्टिलिटी/स्टेरिलिटी क्लीनिक (परिवार नियोजन या बांझपन निवारण केंद्र) में मैनेजर के रूप में काम करती थीं. उस दौर (1950 के दशक) के हिसाब से वह एक कामकाजी और आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम महिला थीं. रतनबाई वह भारतीय महिला थी, जिसे आजाद भारत में पहली और आखिरी बार कानूनी तौर पर फांसी की सजा मिली.

रतनबाई का क्या था अपराध?
रतनबाई को अपने पति के चरित्र पर शक था. उसे लगा कि उसके पति के तीन लड़कियों के साथ अवैध संबंध हैं. इस शक के कारण उसने तीन लड़कियों की बेरहमी से हत्या की थी. इन लड़कियों को मारने के लिए रतनबाई जैन ने किसी हथियार (जैसे चाकू या बंदूक) का इस्तेमाल करने के बजाय एक बेहद शातिर रास्ता चुना. उसने तीनों लड़कियों के खाने-पीने की चीज में एक जानलेवा केमिकल (जहर) मिला दिया. जहर इतना घातक था कि उसे खाते ही तीनों लड़कियों की तड़प-तड़पकर मौत हो गई.
निचली अदालत से तिहाड़ जेल तक का सफर
एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की 'इंडियाः डेथ पेनल्टी रिपोर्ट्स' के मुताबिक, जिला एवं सत्र न्यायालय ने अपराध की क्रूरता को देखते हुए रतनबाई को मौत की सजा सुनाई. मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गया, लेकिन उनकी क्रूरता को देखते हुए कोई राहत नहीं मिली. 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में रतनबाई जैन को फांसी दे दी गई. उसके बाद से आज तक भारत में किसी भी महिला को फांसी नहीं हुई है.

कोर्ट ने भारत में अब तक कुल 21 महिलाओं को दी है फांसी की सजा
रतनबाई के बाद किसी महिला को फांसी भले न हुई हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि महिलाओं को मृत्युदंड नहीं मिलता. वर्तमान समय (वर्ष 2026) के आंकड़ों को देखें तो भारत में मृत्युदंड की सजा पाए कुल 571 कैदियों में से 21 महिलाएं हैं, जो फांसी की कगार पर खड़ी हैं. ये वो महिलाएं हैं जो आतंकवाद, सिलसिलेवार बम धमाकों, ऑनर किलिंग (सम्मान के नाम पर हत्या), मासूम बच्चों की हत्या, पूरे परिवार का नरसंहार और डकैती के दौरान की गई हत्याओं जैसे संगीन जुर्मों में दोषी पाई गई हैं.
इन 21 महिलाओं में दो सबसे चर्चित नाम
- शबनम अली (अमरोहा कांड): अपने ही परिवार के 7 सदस्यों को कुल्हाड़ी से काटने वाली शबनम पिछले 15 साल से जेल में बंद है और मृत्युदंड की कगार पर है. कोर्ट से उसकी फांसी तय हो चुकी है, लेकिन कानूनी दया याचिकाएं अभी भी प्रक्रिया में हैं.
- फहमीदा मोहम्मद हनीफ सैयद: 2003 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों की इस दोषी ने अपनी अपील के अंतिम फैसले के लिए 16 साल का लंबा इंतजार किया है.
इनमें से अधिकांश महिलाओं को निचली अदालतों द्वारा साल 2024 और 2025 के बीच सजा सुनाई गई थी, और वे अभी भी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से अपनी सजा की पुष्टि (कन्फर्मेशन) का इंतजार कर रही हैं.
यह भी पढ़ें - कसाब को फांसी तक पहुंचाने वाले वकील उज्जवल निकम दिलाएंगे केतन अग्रवाल को न्याय
पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को क्यों कम मिलती है फांसी?
आखिर ऐसा क्यों है कि पुरुषों को भारत में कई बार फांसी हुई (जैसे निर्भया के दोषी, कसाब, अफजल गुरु) लेकिन महिलाओं का नंबर नहीं आता? International Journal of Law Management & Humanities (IJLMH) में प्रकाशित एक स्टडी "Gender Bias in Execution of Death Penalty in Post-Independence India" के मुताबिक, इसके पीछे तीन बड़े सामाजिक और कानूनी कारण हैं.
न्यायपालिका का 'नरम और सुरक्षात्मक' रुख
कानूनी विशेषज्ञ और समाजशास्त्री इसे न्यायपालिका के पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण और सहानुभूति के मिश्रण के रूप में देखते हैं. भारतीय समाज में महिलाओं को पारंपरिक रूप से "नर्चरर" (पोषण करने वाली, मां या पत्नी) के रूप में देखा जाता है. जजों के लिए एक महिला को ठंडे दिमाग से हत्या करने वाली के रूप में स्वीकार करना मानसिक रूप से तब तक मुश्किल होता है, जब तक कि अपराध की क्रूरता हदें पार न कर दे.
'कम करने वाले कारक' (Mitigating Factors) का फायदा
सुप्रीम कोर्ट के 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' (दुर्लभ से दुर्लभतम) सिद्धांत के तहत, जब किसी की सजा तय की जाती है, तो अपराधी का बैकग्राउंड देखा जाता है. महिलाओं के मामलों में अदालतों का दिल इन बातों पर पिघल जाता है.
- पारिवारिक निर्भरता: क्या महिला के छोटे बच्चे हैं? क्या वह अपने परिवार की इकलौती देखभाल करने वाली है?
- उत्पीड़न का इतिहास: क्या वह महिला खुद लंबे समय से घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना या सामाजिक उत्पीड़न का शिकार थी, जिसकी वजह से उसने गुस्से में यह कदम उठाया?
- सुधार की गुंजाइश: अदालतें अक्सर मानती हैं कि महिला अपराधियों के सुधरने और समाज में वापस लौटने की संभावना पुरुषों से कहीं अधिक होती है.
- सख्त कानूनी सुरक्षा (जैसे गर्भावस्था): भारतीय कानून (CrPC की धारा 416) के तहत महिला अपराधियों को एक विशेष सुरक्षा प्राप्त है. यदि मृत्युदंड पाई कोई भी महिला गर्भवती है, तो हाई कोर्ट को उसकी फांसी की सजा को अनिवार्य रूप से आजीवन कारावास में बदलना ही होगा.

केतन मर्डर केस में सिया को क्या मिलेगी सजा?
सिया-केतन मामले में जनता का गुस्सा जायज है, क्योंकि जब समाज में कोई जघन्य अपराध होता है, तो आक्रोश भड़कना लाजिमी है. लेकिन भारत का कानूनी इतिहास और आंकड़े बताते हैं कि अदालती चौखट पर आते-आते भावनाओं की जगह ठंडे सबूत और 'जेंडरलुक' (लैंगिक दृष्टिकोण) हावी हो जाता है.
सिया को फांसी होगी या उम्रकैद, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत में उसके वकील उसकी मानसिक स्थिति या किसी 'उकसावे' को कितना साबित कर पाते हैं. सोशल मीडिया भले ही अपना फैसला सुना दे, लेकिन कानून का इतिहास कहता है कि महिला के लिए फांसी का फंदा आज भी देश में सबसे दुर्लभ सजा है.
यह भी पढ़ें - 'हमारी बेटी और चेतन दोनों को फांसी दो...,' केतन हत्याकांड पर सिया के माता-पिता का बड़ा बयान
यह भी पढ़ें - पुणे रेप-मर्डर केस में 59 दिन में फैसला: 4 साल की बच्ची से दरिंदगी करने वाले 65 साल के भीमराव को फांसी
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं