- देश के कई राज्यों में अप्रैल में तापमान 45 डिग्री से ऊपर पहुंच गया है, जिससे गर्मी और लू की स्थिति बनी है
- विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने मई से जुलाई के बीच अल नीनो की संभावना जताई है, जो वैश्विक मौसम प्रभावित करेगा
- भारत मौसम विभाग ने इस साल मॉनसून सामान्य से कम रहने और बारिश में आठ प्रतिशत तक कमी का अनुमान लगाया है
राजधानी दिल्ली समेत देश के कई राज्यों में इन दिनों भीषण गर्मी से बुरा हाल है. अप्रैल महीने में ही तापमान 45 डिग्री के पार पहुंच गया है और लू जैसी स्थिति बन रही है. मौसम विभाग लू और गर्मी को लेकर अलर्ट जारी कर रहा है. सरकारें स्कूलों की छुट्टियां कर रही हैं. जहां स्कूल खुल रहे हैं वहां टाइमिंग में बदलाव किया जा रहा है. हर रोज तापमान नए रिकॉर्ड को छू रहा है. सबसे डरावनी बात यह है कि इस साल मॉनसून भी कम ही बरसेंगे. कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति हो सकती है. ऐसा सिर्फ भारत में नहीं बल्कि दुनियाभर के कई देशों में हो रहा है. दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिक मौसम के इस बदलाव को लेकर टेंशन में हैं. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी जारी की है कि इस साल मई से जुलाई के बीच 'अल नीनो' (El Nino) की स्थिति दोबारा विकसित हो सकती है. भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह खबर किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं है. समझिए यह क्या है और इससे भारत पर क्या असर पड़ेगा?
विश्व मौसम एजेंसी का अलर्ट
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने कहा है कि अल नीनो मौसम की स्थितियां मई 2026 से ही विकसित होने की संभावना है, जिससे वैश्विक तापमान और बारिश के पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं. मई-जून-जुलाई में तापमान सामान्य से ज्यादा रहेगा. WMO ने कहा कि यह संकेत खासतौर से दक्षिणी उत्तरी अमेरिका, मध्य अमेरिका और कैरिबियन के साथ-साथ यूरोप और उत्तरी अफ्रीका में बहुत मजबूत है.

भारत के मौसम विभाग ने पहले ही दी थी चेतावनी
इससे पहले भारत के मौसम विभाग (IMD) ने भी इस साल मॉनसून सामान्य से कम रहने की अनुमान जताया था. IMD ने कहा था कि इस साल देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान जून से सितंबर के बीच में बारिश सामान्य से कम होने के आसार हैं. इस साल सामान्य से 8 फीसदी तक कम बारिश होगी. मौसम विभाग ने कहा था कि ला नीना की स्थितियां कमजोर हो रही हैं और अल नीनो का प्रभाव बढ़ता दिख रहा है.
क्या है अल नीनो?
अल नीनो एक एक प्राकृतिक जलवायु घटना है. यह ला नीना का विपरीत है और पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली जलवायु पैटर्नों में से एक हैं. ये घटनाएं वैश्विक मौसम को नया रूप देती हैं और विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा, सूखे और चरम मौसमी घटनाओं को प्रभावित करती हैं. अल नीनो की पहचान मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान में होने वाली वृद्धि से होती है. यह आमतौर पर हर दो से सात साल में होता है और लगभग नौ से बारह महीनों तक रहता है.

भारत पर क्या होगा इसका असर?
विश्व मौसम एजेंसी और भारत मौसम विभाग के डेटा के अनुसार पिछला अल नीनो कमजोर पड़ चुका है. राहत की बात यह है कि जून-अगस्त के दौरान 'ला नीना' सक्रिय होने की 60-70% संभावना है. यही अल नीनो मॉनसून को कमजोर करता है. ऐसे में इसका मजबूत होना भारत के लिए टेंशन की बात जरूर है. मॉनसून के सीजन में इस मौसमी स्थिति की वजह से सामान्य से कम बारिश होगी. भारत के कई राज्यों में किसान मॉनसून पर आधारित खेती करते हैं. उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों में भीषण गर्मी पड़ती है. मॉनसून की बारिश से ही राहत मिलती है. ऐसे इस साल कम बारिश होने का अनुमान है.
यह भी पढ़ें: दिल्ली में इस सीजन का सबसे गर्म दिन, आज से असल 'अग्निपरीक्षा'; क्या है हीट डोम जिससे धधक रहा भारत
पिछली बार क्या हुआ था?
पिछला अल नीनो जून 2023 में शुरू हुआ था और इसने भारत को काफी प्रभावित किया. साल 2023 में अगस्त का महीना पिछले 123 वर्षों में सबसे सूखा रहा. मॉनसून में करीब 6% की कमी दर्ज की गई थी. कम बारिश के कारण धान, दलहन और गन्ना की पैदावार घटी. नतीजतन, सरकार को चावल के निर्यात पर बैन लगाना पड़ा. इसकी वजह से इनकी कीमतें काफी बढ़ गईं और आम आदमी की जेब पर इसका सीधा असर हुआ. CCCS की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 वैश्विक स्तर पर अब तक का सबसे गर्म साल रहा. भारत के कई हिस्सों में सर्दियों में भी सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया गया.
यह भी पढ़ें: आसमान से बरसते अंगारों के बीच आ रही है गुड न्यूज, दिल्ली से लेकर बिहार-झारखंड तक होगी बारिश, पढ़िए IMD का अपडेट
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं