- ब्रिक्स देशों के पास दुनिया की चौथाई से अधिक जीडीपी है, जिससे उनका वैश्विक महत्व लगातार बढ़ रहा है
- ब्रिक्स सदस्यता के लिए आर्थिक मजबूती और राजनीतिक स्थिरता आवश्यक है, जो पाकिस्तान के मामले में पूरी नहीं होती
- पाकिस्तान ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत विरोधी रवैया अपनाया है, जिससे उसकी छवि प्रभावित हुई है
दुनिया में हर जगह ब्रिक्स का अभी डंका बज रहा है. अमेरिका से लेकर अफ्रीका तक के छोटे से छोटे देश ब्रिक्स की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए हैं. आखिर हो भी क्यों ना, दुनिया की 40 फीसदी से ज्यादा जीडीपी ब्रिक्स देशों के पास है. आज यही बात रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी जी 7 पर तंज कसते हुए कह दी.
क्या चीन ने मदद नहीं की?
अब सवाल उठता है कि चीन से पाताल से गहरी और आसमान से ऊंची दोस्ती का दंभ भरने वाला पाकिस्तान आखिर इसमें शामिल क्यों नहीं है? क्या चीन ने कोशिश नहीं की या पाकिस्तान खुद नहीं चाहता कि वो ब्रिक्स का सदस्य देश बने? पहले सवाल का जवाब थोड़ा लंबा है इसलिए पहले दूसरे और तीसरे सवाल का जवाब जान लें. चीन ने पूरी कोशिश की कि पाकिस्तान भी ब्रिक्स का हिस्सा बन जाए. इसी तरह पाकिस्तान तो कब से मुंह फाड़े हुए है कि वो ब्रिक्स का हिस्सा बन जाए. मगर ये हो नहीं पाया. पर आखिर क्यों?
फिर क्या कारण है?
दरअसल, इसका कारण ब्रिक्स ही है. ब्रिक्स को बनाते समय चारों सदस्यों भारत, चीन, रूस और ब्राजील ने ये तय किया था कि सभी सदस्यों की रजामंदी पर ही नया सदस्य जोड़ा जाएगा. चीन ने कई बार रूस के जरिए भी भारत को समझाने की कोशिश की, लेकिन भारत ने इसे स्वीकार नहीं किया. साथ ही ब्रिक्स के अन्य सदस्य देश भी नहीं चाहते कि ब्रिक्स भारत विरोधी या चीन समर्थक फोरम बन जाए. इसलिए इसमें ऐसे ही देशों को अब तक जोड़ा गया है, जो भले एक-दूसरे को पसंद नहीं करते हों, पर किसी के माउथपीस न हों. उनकी सोच स्वतंत्र हो और रिकॉर्ड अच्छा हो.
पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमी ये
दूसरे पाकिस्तान इसलिए भी ब्रिक्स से जुड़ने की पात्रता नहीं रखता क्योंकि इसके सभी सदस्य उभरती हुई या मजबूत अर्थव्यवस्था हैं. पाकिस्तान की माली हालात पूरी दुनिया में किसी से छिपी नहीं है. कर्ज, आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता से वो बीमार देश माना जाता है. ऐसे में पाकिस्तान के शामिल होने से ब्रिक्स को कोई फायदा तो नहीं ही होने वाला, उल्टा वो बोझ जरूर बन जाएगा. जैसे वो अन्य संगठनों में शामिल होने के बाद बोझ बनकर बैठा है. चाहे वो एससीओ हो, ओआईसी हो, सार्क हो. एससीओ में हाल ही में दुनिया ने देखा कि जब सभी सदस्य वैश्विक मुद्दों पर चर्चा कर रहे थे तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत के खिलाफ जहर घोलने लगे. ओआईसी मुस्लिम देशों का संगठन है. इसलिए पाकिस्तान उसमें जुड़ा हुआ है, मगर वहां भी हर बैठक को वो भारत के खिलाफ जहर उगलने में करता रहता है, जबकि भारत ओआईसी का मेंबर तक नहीं है. इसी तरह सार्क को भी पाकिस्तान ने भारत से दुश्मनी की बलि चढ़ा दिया है.
चीन-भारत की करीबी बड़ी परेशानी
यही कारण है कि पाकिस्तान ने जब 2023 में ब्रिक्स सदस्यता के लिए औपचारिक तौर पर आवेदन किया तो भारत की असहमति और आर्थिक-रणनीतिक के पाकिस्तान को न तो पूर्ण सदस्यता मिली और न ही उसे पार्टनर देश का दर्जा दिया गया. अब स्थिति ये है कि भारत में ब्रिक्स की मेजबानी हो रही है और बगल में पाकिस्तान कुढ़ रहा है. चीन भी अब भारत से संबंध सुधारने पर जोर देने लगा है, जिससे पाकिस्तान की जलन और बढ़ गई है. अब वो चीन को ऐसा करने से ना तो रोक पाने की हैसियत में है और ना ही उसकी बुराई करने की हैसियत में है. कारण चीन के कर्ज से पाकिस्तान दबा हुआ है. साथ ही उसके सारे हथियार लड़ाकू विमान से लेकर एंटी एयर डिफेंस तक चीन के हैं. तो अब वो बस ये दुआ कर रहा है कि भारत और चीन के बीच फिर किसी बात पर खटपट हो जाए और वो इसका फायदा और कर्ज लेकर उठा सके.
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