BRICS देश बना लें कॉमन करेंसी तो बदल जाएगी दुनिया की तस्वीर लेकिन एक्सपर्ट बता रहे इसे 'टेढ़ी खीर'
BRICS Summit में CBDC लिंकिंग पर चर्चा संभव है. जानिए क्या BRICS देश डॉलर के बजाय अपनी करेंसी में व्यापार करेंगे, व्यापार घाटे की चुनौतियों के बीच भारत को फायदा होगा या खतरे पैदा होंगे.
नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाले BRICS समिट में सीमा पार भुगतान को आसान बनाने के लिए सदस्य देशों की केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव चर्चा में रह सकता है. भारत इस वर्ष BRICS की अध्यक्षता कर रहा है. हालांकि ऐसा प्रस्ताव रखा गया तो भी इसका उद्देश्य डॉलर को एक झटके में हटाना नहीं, बल्कि सदस्य देशों के बीच व्यापार भुगतान को तेज, सस्ता और ज्यादा भरोसेमंद बनाना हो सकता है.
इकोनॉमी-पॉलिसी एक्सपर्ट और क्वांटिव एडवाइजरी LLP के फाउंडर सोहम बनर्जी कहते हैं, 'अगर BRICS देश बड़े पैमाने पर डॉलर के बजाय अपनी-अपनी करेंसी में व्यापार करने लगें, तो भारत को लेनदेन लागत में राहत मिल सकती है, लेकिन व्यापार घाटे और करेंसी रिस्क जैसी मुश्किलें भी सामने आ सकती हैं.
भारत के लिए स्थानीय करेंसी में व्यापार का विचार इसलिए अहम है क्योंकि रूस से क्रूड ऑयल, UAE और सऊदी अरब से तेल-गैस, चीन से इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक सामान जैसे आयात बड़े पैमाने पर होते हैं. डॉलर में भुगतान करने के लिए भारत को पहले डॉलर की जरूरत पड़ती है. स्थानीय करेंसी सेटलमेंट बढ़ने पर कुछ लेनदेन में डॉलर खरीदने, विदेशी बैंकों के जरिए भुगतान कराने और अंतरराष्ट्रीय ट्रांसफर के खर्च को कम किया जा सकता है.

CBDC लिंकिंग होती क्या है, पहले ये समझ लें
CBDC किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी डिजिटल करेंसी है. इसे क्रिप्टोकरेंसी से अलग समझना चाहिए. यह सरकार और केंद्रीय बैंक की आधिकारिक करेंसी का डिजिटल रूप है. भारत में भारतीय रिजर्व बैंक ने डिजिटल रुपया पायलट शुरू किया है. प्रस्ताव यह है कि BRICS देशों की आधिकारिक डिजिटल करेंसी के बीच तकनीकी कनेक्शन बनाया जाए, ताकि सीमा पार भुगतान जल्दी और कम लागत में हो सके.
मिसाल के तौर पर, कोई भारतीय आयातक रूस से सामान खरीदता है. अभी उसे डॉलर में भुगतान करना पड़ सकता है. भविष्य में स्थानीय करेंसी सेटलमेंट के तहत भारतीय कंपनी रुपये में भुगतान करे और रूस की कंपनी रूबल में रकम पाए. बीच में बैंक, केंद्रीय बैंक या डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों करेंसी के बीच विनिमय और सेटलमेंट कराए. इससे भुगतान में लगने वाला समय और कुछ लागत कम हो सकती है.
लेकिन यह अभी एक संभावना है, लागू व्यवस्था नहीं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने BRICS देशों की CBDC को जोड़ने का विचार रखा है, लेकिन इसे लागू करने में राजनीतिक और तकनीकी बाधाएं हैं. 2025 के रियो समिट में सदस्य देशों के पेमेंट सिस्टम्स के बीच इंटरऑपरेबिलिटी यानी आपसी तालमेल बढ़ाने की बात हुई थी. अब इसे CBDC स्तर तक ले जाने पर चर्चा हो सकती है.

भारत को क्या फायदे हो सकते हैं?
CBDC आधारित भुगतान से भारत को चार संभावित लाभ मिल सकते हैं.
- लेनदेन तेज हो सकता है: कॉरेस्पोंडेंट बैंक्स और बीच की प्रक्रियाएं कम होने पर भुगतान जल्दी सेटल हो सकता है.
- ट्रांजैक्शन कॉस्ट घट सकती है: करेंसी कन्वर्जन, बैंक फीस और कुछ क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट खर्च कम हो सकते हैं.
- डॉलर पर निर्भरता घट सकती है: हर व्यापार सौदे के लिए डॉलर जुटाने की जरूरत कुछ हद तक कम हो सकती है.
- संकट में विकल्प मिलेगा: किसी वैश्विक पेमेंट चैनल में बाधा आने पर वैकल्पिक व्यवस्था व्यापार जारी रखने में मदद कर सकती है.
क्वांटिव एडवाइजरी LLP के फाउंडर सोहम बनर्जी ने NDTV से कहा, 'BRICS पेमेंट इंटीग्रेशन को केवल डी-डॉलराइजेशन के नजरिये से देखना बहुत संकीर्ण सोच है. असली अवसर ट्रांजैक्शन कॉस्ट, सेटलमेंट डिले और सीमित क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट चैनल्स पर निर्भरता कम करने में है.'
उनके मुताबिक भारत के लिए आपस में जुड़ा डिजिटल पेमेंट आर्किटेक्चर व्यापार, रेमिटेंस और बिजनेस-टू-बिजनेस ट्रांजैक्शन में उपयोगी हो सकता है. लेकिन रणनीतिक उद्देश्य करेंसी का प्रतीकात्मक इस्तेमाल नहीं, बल्कि पेमेंट सिस्टम की एफिशिएंसी और रेजिलिएंस होना चाहिए.

फिर डॉलर को हटाना आसान क्यों नहीं?
अमेरिकी डॉलर आज भी वैश्विक व्यापार, निवेश, कर्ज और केंद्रीय बैंक रिजर्व में प्रमुख करेंसी है. डॉलर की ताकत केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था से नहीं आती, बल्कि गहरे कैपिटल मार्केट्स, अधिक लिक्विडिटी, आसान कन्वर्टिबिलिटी और इंस्टीट्यूशनल ट्रस्ट से भी जुड़ी है.
BRIC शब्द गढ़ने वाले और गोल्डमैन सैक्स के पूर्व अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने रॉयटर्स से कहा कि करीब 18 महीने पहले तक वह BRICS देशों के बीच किसी वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था के विचार को 'फैंटेसी' मानते थे. लेकिन पेमेंट टेक्नोलॉजी में हुई प्रगति के बाद उनकी राय बदली है. फिर भी उन्होंने यह भी कहा कि BRICS की राजनीतिक अहमियत मजबूत है, जबकि ठोस साझा नीतियां बनाने में समूह का रिकॉर्ड सीमित रहा है. न्यू डेवलपमेंट बैंक को छोड़कर वे बहुत कम बड़े संस्थागत नतीजे गिना पाते हैं.
ओ'नील का संकेत साफ है- टेक्नोलॉजी भुगतान का रास्ता तैयार कर सकती है, लेकिन उसे चलाने के लिए देशों के बीच भरोसा, नियम और आर्थिक तालमेल जरूरी होगा.
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती, व्यापार घाटा
भारत का BRICS देशों के साथ व्यापार घाटा बड़ा है. उपलब्ध वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, BRICS के साथ भारत का कुल व्यापार घाटा करीब 226.1 अरब डॉलर है. इसमें चीन के साथ घाटा 112.16 अरब डॉलर, रूस के साथ 50 अरब डॉलर से अधिक, UAE के साथ 26.53 अरब डॉलर और सऊदी अरब के साथ 20 अरब डॉलर से ज्यादा बताया गया है.
सोहम बनर्जी कहते हैं, 'स्थानीय करेंसी में सेटलमेंट तब सबसे सुचारु होता है, जब व्यापार प्रवाह दोनों दिशाओं में कुछ हद तक संतुलित हो. लगातार सरप्लस वाला देश दूसरे देश की करेंसी जमा करता जाएगा. फिर उस करेंसी को निवेश, आयात, कन्वर्जन या आकर्षक वित्तीय एसेट्स में लगाने का रास्ता होना चाहिए.'
भारत और चीन के बीच भरोसा एक बड़ी राजनीतिक चुनौती हो सकता है. रॉयटर्स के सूत्रों के मुताबिक, भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के कारण चीन से जुड़ी अलीपे प्लस की भारत के इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम से कनेक्ट होने की योजना को आगे नहीं बढ़ाया था. इसी तरह ईरान और UAE के संबंधों में तनाव और वित्तीय संपर्क सीमित होना व्यापक BRICS पेमेंट नेटवर्क की राह में अड़चन बन सकता है.
भारत के लिए कैसी रणनीति देख रहे हैं एक्सपर्ट्स?
ब्रिक्स की साझा करेंसी फिलहाल ऐसा सपना है, जिसे चीन इसे आगे बढ़ाना चाहता है, लेकिन भारत सतर्क है. इसलिए योजना चर्चा तक सीमित रह सकती है. भारत का फोकस डॉलर को सीधे हटाना नहीं है. भारत पेमेंट सिस्टम को अधिक तेज, सस्ता और भरोसेमंद बनाना चाहता है, न कि डॉलर के खिलाफ खुली लड़ाई खड़ा करना चाहता है.
एक ही बार में डॉलर को छोड़ देने के बजाय भारत के लिए चरणबद्ध और मल्टी-लेयर्ड रणनीति ज्यादा व्यावहारिक हो सकती है. जहां डॉलर में व्यापार तेज और सुविधाजनक है, वहां उसका इस्तेमाल जारी रहे. जिन देशों के साथ व्यापार अपेक्षाकृत संतुलित है या जिनके साथ लोकल करेंसी सेटलमेंट की जरूरत और क्षमता अधिक है, वहां रुपये में भुगतान बढ़ाया जा सकता है.

बनर्जी का सुझाव है कि भारत को मल्टी-लेयर्ड मॉडल अपनाना चाहिए- डॉलर का इस्तेमाल वहां जारी रहे जहां वह सबसे एफिशिएंट है, लोकल करेंसी में व्यापार वहां बढ़े जहां द्विपक्षीय व्यापार इसे सपोर्ट देता है, लिक्विडिटी संभालने के लिए स्वैप अरेंजमेंट हों, और चुने हुए ट्रेड कॉरिडोर्स में CBDC इंटरऑपरेबिलिटी का धीरे-धीरे परीक्षण किया जाए.
इस मॉडल में सफलता का पैमाना डॉलर में हुए कारोबार का प्रतिशत नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि भुगतान सस्ता, तेज, पर्याप्त लिक्विडिटी वाला, भरोसेमंद और वास्तविक व्यापार प्रवाह के अनुरूप बना या नहीं.
BRICS अगर डॉलर में कारोबार घटाकर अपनी मुद्राओं में ज्यादा व्यापार करता है, तो यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है. इससे भारत को पेमेंट के विकल्प, तेज सेटलमेंट और डॉलर निर्भरता में कुछ कमी का लाभ मिल सकता है. लेकिन भारत का बड़ा BRICS व्यापार घाटा, सदस्य देशों के बीच राजनीतिक मतभेद, करेंसी की कन्वर्टिबिलिटी, पर्याप्त लिक्विडिटी और भरोसेमंद नियम बड़े सवाल बने रहेंगे.
इसलिए BRICS की असली परीक्षा कोई नई साझा करेंसी बनाने की नहीं, बल्कि ऐसा पेमेंट नेटवर्क तैयार करने की हो सकती है, जो व्यापार को वास्तव में आसान बनाए और भारत जैसे देशों के लिए आयात बढ़ाने के साथ निर्यात और निवेश के अवसर भी बढ़ाए. बनर्जी कहते हैं कि ब्रिक्स का लक्ष्य पानी बदलना नहीं, बल्कि भुगतान की पाइपलाइन को तेज, सस्ता और अधिक लचीला बनाना है.
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