- ब्रिक्स समिट से पहले पीएम मोदी और पुतिन ने जी-7 की तुलना में ब्रिक्स की आर्थिक ताकत पर जोर दिया
- ब्रिक्स देशों में एशिया से अफ्रीका तक के देश शामिल हैं, जहां दुनिया की आधी आबादी रहती है
- भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के बावजूद ब्रिक्स मंच ने दोनों देशों को करीब लाने में मदद की
दिल्ली में अगले दो दिनों तक ब्रिक्स समिट का आयोजन है. उससे पहले ब्रिक्स बिजनेस फोरम को संबोधित करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका की लीडरशिप वाले जी-7 पर बिना नाम लिए ही तंज कस दिया. पुतिन ने सीधे तौर पर कहा कि कहां जी-7 की जीडीपी दुनिया के 18 फीसदी के बराबर है और कहां ब्रिक्स की जीडीपी दुनिया के 40 फीसदी हिस्से के बराबर है. ब्रिक्स देशों में एशिया से अफ्रीका तक के मुल्क शामिल हैं, जिनमें दुनिया की आधी आबादी बसती है. इसके अलावा 25 फीसदी दुनिया का कारोबार इन देशों के बीच ही होता है. लेकिन ब्रिक्स अपने आप में खास है तो इसमें कुछ विरोधाभास भी हैं. इन सबके बीच ब्रिक्स दुनिया के कई बड़े और आपसी संघर्षों में उलझे देशों के लिए एक ब्रिज भी बना है.
इस समूह में भारत और चीन जैसी सीमा विवाद से जुड़ी प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाएं हैं. इसके अलावा ईरान और सऊदी अरब जैसे पश्चिम एशिया में प्रभाव की होड़ रखने वाले देश एक साथ बैठकर संवाद करते हैं. सबसे बड़ा उदाहरण तो पड़ोसी देश भारत और चीन ही हैं. दोनों देश दुनिया की टॉप 5 अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं, आबादी के मामले में पहले और दूसरे नंबर पर हैं. एक-दूसरे से लंबी सीमा साझा करते हैं. इसके बाद भी आपस में अविश्वास रहा है और सीमा पर विवाद का मसला रहा है. लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक दोनों देशों के बीच एक विश्वास की खाई रही है. लेकिन इस सबके बीच भी ब्रिक्स के मंच पर दोनों साथ रहते हैं. ब्रिक्स के 20 सालों के इतिहास में यह संगठन दोनों देशों को करीब लाने वाला रहा है.
इसके अलावा एक और विरोधाभास ब्रिक्स में जाकर खत्म होता है. इस्लाम के शिया और सुन्नी फिरकों का प्रतिनिधित्व करने वाले ईरान और सऊदी अरब के बीच भी तनाव अकसर चरम पर रहा है, लेकिन यहां दोनों एक मंच पर होंगे. यही नहीं इसी मंच पर संयुक्त अरब अमीरात भी होगा, जिस पर ईरान ने कुछ दिन पहले ही हमले किए थे. एक अहम तथ्य यह भी है कि अकसर तेल उत्पादक देशों के हित एक होते हैं और तेल आयातकों के अलग होते हैं. लेकिन इस मंच पर सऊदी अरब, ईरान और रूस जैसे तेल के टॉप निर्यातक साथ हैं तो वहीं तेल के सबसे बड़े आयातक चीन और भारत भी इसका हिस्सा हैं.
इस संगठन में जुड़ने की कोई बाध्यता नहीं है. ब्रिक्स का ढांचा किसी सैन्य गठबंधन (जैसे नाटो) की तरह बाध्यकारी नहीं है बल्कि यह आपसी परामर्श और राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जहां हर सदस्य देश के पास अपने हितों को साधने की कूटनीतिक स्वतंत्रता होती है. इस तरह ब्रिक्स पूरी तरह एक ब्रिज की तरह काम कर रहा है, जो अलग-अलग सभ्यताओं को साथ लाया है तो वहीं अलग हितों वाले देशों को भी साथ बिठा रहा है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं