- उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा लगभग आधे विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरे उतारने की योजना बना रही है
- टिकट कटौती का उद्देश्य ऐंटी-इनकम्बैंसी को कम करना और सामाजिक समीकरणों में संतुलन बनाना है
- पश्चिम यूपी, ब्रज, अवध, कानपुर-बुंदेलखंड और गोरखपुर में भाजपा ने स्थानीय नाराजगीको ध्यान में रखा है
उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव कुछ महीने ही दूर है. इस बीच लगातार दो बार सत्ता में रह चुकी भाजपा तीसरे टर्म में वापसी के लिए पुरजोर कोशिश में जुटी है. इसके लिए फील्डिंग भी सेट की जा रही है और समीकरणों को साधने के लिए करीब आधे विधायकों के टिकट भी काटे जा सकते हैं. इसकी वजह सीधे तौर पर यह है कि ऐंटी-इनकम्बैंसी फैक्टर है. भाजपा ने लोकसभा चुनाव में बड़ी हार झेली थी और माना गया था कि कुछ सांसदों से लोग नाराज थे और उन्हें फिर से उतारा गया तो लोगों ने उनके खिलाफ मतदान किया. भाजपा सीधे 62 से 33 सीटों पर आ गई थी. ऐसे में अब पार्टी रिस्क नहीं लेना चाहती.
भाजपा के लिए ऐसा करना नया भी नहीं है. मध्य प्रदेश और गुजरात के चुनाव में भाजपा ने 35 से 40 फीसदी विधायकों के टिकट काट दिए थे. इसका उसे फायदा भी मिला और स्थानीय नाराजगी खत्म होती दिखी, जो मौजूदा विधायकों से थी. इसके अलावा कुछ टिकट इसलिए भी बदले जाएंगे ताकि सामाजिक समीकरणों को साधा जा सके. जैसे गैर-यादव ओबीसी की संख्या बढ़ सकती है. इसके अलावा दलित और युवा चेहरे भी बढ़ाने की कोशिश की जाएगी. फिर एक सवाल यह भी है कि कैसे राष्ट्रीय लोकदल को पश्चिम में साधा जाए. इसके अलावा अवध और पूर्वांचल में अपना दल, निषाद पार्टी और सुभासपा को भी साथ लेकर चलना है.
ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा और जयंत चौधरी की रालोद 2022 के चुनाव के बाद एनडीए में आए हैं. इसलिए अब सीटों का समीकरण भी साफ तौर पर बदल जाएगा. भाजपा ने 2022 के चुनाव में 376 सीटों पर अपने कैंडिडेट उतारे थे. इस बार यह आंकड़ा 328 पर जाकर रुक सकता है. अब तक मिली जानकारी के अनुसार पश्चिम यूपी की 71 सीटो में से 25 भाजपा विधायकों का टिकट खतरे में है. यहां की सहारनपुर-मुजफ्फरनगर बेल्ट में सपा और कांग्रेस के गठबंधन को बढ़त मिली थी. कुछ लोगों के टिकट तो आपसी कलह की वजह से भी कट सकते हैं क्योंकि पार्टी व्यक्तिगत लड़ाई में अपना नुकसान नहीं चाहेगी.
इसके अलावा लोकसभा चुनाव के दौरान ठाकुरों का भी गुस्सा यहां दिखा था. ऐसे में कुछ विधायकों को इसका भी नुकसान उठाना पड़ सकता है. भाजपा अपने इस कोर वोट बैंक को साधना चाहेगी. ब्रज क्षेत्र की बात करें तो यहां भी 65 सीटों में से करीब दो दर्ज क्षेत्रों में नए कैंडिडेट आ सकते हैं. भाजपा कई बार से आगरा, अलीगढ़, हाथरस, फिरोजाबाद जैसे इलाकों में मजबूत है, लेकिन सपा ने यहां भी सेंध लगाई है. इसलिए पार्टी अब ऐंटी-इनकम्बैंसी को थामने के लिए चेहरे ही बदल सकती है. माना जा रहा है कि यहां दलितों के वोट का एक हिस्सा सपा और कांग्रेस को गया है. उनका भरोसा जीतने की भाजपा पूरी कोशिश करेगी. इसके अलावा लोध, कुशवाहा और शाक्य समाज के नेताओं को तवज्जो मिल सकती है.
अवध में किन पर रहेगा फोकस
अवध को कांग्रेस के परंपरागत क्षेत्र के तौर पर देखा जाता रहा है. खासतौर पर रायबरेली, सुल्तानपुर, अमेठी जैसे इलाके. इनमें भाजपा ने दो विधानसभा चुनावों में अच्छी बढ़त पाई थी, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. कांग्रेस मजबूत हो रही है तो सपा भी उसके साथ बढ़ रही है. ऐसे में भाजपा यहां भी दो दर्जन विधायकों का पत्ता साफ कर सकती है. इसके अलावा सपा से आए मनोज पांडेय जैसे नेताओं को मौका मिल सकता है. इसके अलावा पासी और कुर्मी समाज पर भी पार्टी का फोकस बढ़ सकता है. इसी तरह कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में भी दो दर्जन विधायक टारगेट पर आ सकते हैं. लोकसभा चुनाव में भाजपा को बांदा, जालौन, हमीरपुर और मोहनलालगंज में हार झेलनी पड़ी थी. इसलिए यहां भी पार्टी का फोकस रहेगा कि कैसे भी स्थानीय नाराजगी को दूर किया जाए.
काशी में भी क्यों चिंतित है भाजपा, गोरखपुर में ब्राह्मणों पर रहेगा फोकस?
पीएम नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट वाले काशी क्षेत्र में 72 विधानसभा सीटें आती हैं. यहां के बारे में पार्टी को इनपुट मिला है कि करीब 20 सीटों पर सत्ता विरोधी लहर तेज है. इसलिए यहां पर बड़े बदलाव दिख सकते हैं. खुद पीएम नरेंद्र मोदी की जीत का अंतर 2024 में डेढ़ लाख पर आकर थम गया था. अब गोरखपुर बेल्ट की बात करें तो यहां की कुल 62 सीटों में से 22 पर विधायकों का पत्ता कट सकता है. यहां ब्राह्मणों को ज्यादा तवज्जो मिल सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि एक नैरेटिव ठाकुर बनाम ब्राह्मण वाला बन रहा है. आरोप लगते रहे हैं कि ब्राह्मणों को साइडलाइन किया जा रहा है. ऐसे में यहां पर ब्राह्मणों को साधने के प्रयास थोड़े अधिक हो सकते हैं.
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