मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से ले जाकर दिल्ली पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है. जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक को हटाए जाने के बारे में दिल्ली पुलिस ने कहा कि हाई कोर्ट के आदेशों और मेडिकल विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को देखते हुए उन्हें जरूरी मेडिकल देखभाल के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
सोनम बीते 21 दिन से जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे थे. वह 'कॉकरोच जनता पार्टी' के अभिजीत दीपके के विरोध प्रदर्शन के तहत ये अनशन कर रहे हैं.
-
पीएम मोदी के ग्लोबल विजन से लेकर RBI गवर्नर के बड़े बयान तक, अखबारों के फ्रंट पेज पर छाया NDTV समिट -
'भारतीय दयालु, ईमानदार और बुद्धिमान होते हैं', खामेनेई ने अपने प्रतिनिधि को भारत भेजते समय क्या कहा था? -
NDTV WORLD SUMMIT 2026 : कृति सेनन को बिकिनी सीन करने में क्यों लगे 12 साल? -
ब्रिटेन के हरियाणवी मेयर तुषार कुमार ने बताया कैसे गरीबों की मदद ने जिताया चुनाव -
टैक्स सिर्फ कमाई पर लगे, पूरी रकम पर नहीं..."F&O ट्रेडर्स के नुकसान पर बोले Zerodha को-फाउंडर निखिल कामत -
जिस शशि थरूर को सुनती है पूरी दुनिया, संसद में वह किसे सुनना पसंद करते हैं? खुद खोला राज -
AI से बुलेट ट्रेन तक... अश्विनी वैष्णव ने बताया भारत का फ्यूचर प्लान -
NDTV World Summit 2026: वेजिटेरियन खिलाड़ियों को कौन सी दिक्कतें होती हैं? Savita, Neeru ने बताया -
NDTV World Summit 2026 के मंच पर भारत की 'गोल्डन गर्ल्स' ने बताया जीत का मंत्रा! | Asian Games 2026 -
NDTV World Summit 2026: Lovlina Borgohain ने बताया जीवन का सबसे बड़ा चैलेंज! क्यों लगने लगे ठहाके?
लेकिन आखिर सोनम वांगचुक हैं कौन? कहां से आते हैं और इतने मशहूर कैसे हैं?
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के बीच अब हर कोई उनकी कहानी जानता चाहता है. सोनम वांगचुक का जन्म 2 सितंबर 1966 को लद्दाख के 'अल्ची' नामक एक बेहद छोटे और दुर्गम गांव में हुआ था. उनके पिता सोनम वांग्याल लद्दाख के एक रसूखदार राजनेता थे, जो बाद में जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी बने. इसके बावजूद सोनम का शुरुआती बचपन आम बच्चों से बिल्कुल अलग रहा.
उन्हें 8-9 साल की उम्र तक किसी औपचारिक स्कूल में नहीं भेजा गया. उन्होंने अपनी मातृभाषा लद्दाखी में अपनी मां से ही घर पर शुरुआती शिक्षा हासिल की. इस घरेलू माहौल ने उनकी रचनात्मकता और प्रकृति को समझने की बुनियादी समझ को बेहद मजबूत बना दिया.

भूख हड़ताल के दौरान सोनम वांगचुक
Photo Credit: Abhijit Dipke/X
ट्यूशन पढ़ा कर किया गुजारा
इस मोड़ पर पीछे हटने के बजाय वांगचुक ने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर खुद अपनी फीस का इंतजाम किया. उन्होंने साल 1987 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एनआईटी श्रीनगर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री पूरी की.
अक्सर लोगों को यह भ्रम होता है कि उन्होंने किसी आईआईटी से पढ़ाई की है, लेकिन सच यह है कि उन्होंने एनआईटी से स्नातक करने के बाद साल 2011 में फ्रांस के प्रसिद्ध क्रेटेरे संस्थान से मिट्टी की टिकाऊ इमारतों से जुड़ी 'अर्थन आर्किटेक्चर' की उच्च स्तरीय पढ़ाई की. उनकी इन्हीं सेवाओं के लिए सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ने उन्हें मानद डी.लिट की उपाधि से भी नवाजा है.
छात्रों के लिए खोला यूनिक स्कूल
इंजीनियरिंग की डिग्री हाथ में आने के बाद वांगचुक के पास किसी मल्टीनेशनल कंपनी में शानदार नौकरी करने का मौका था, लेकिन उन्होंने लद्दाख की लचर शिक्षा व्यवस्था को बदलने का कठिन रास्ता चुना. उन्होंने साल 1988 में 'स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख' यानी सेकमोल (SECMOL) की स्थापना की.
इस अनोखे स्कूल का पूरा कैंपस पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित होता है और यहां किताबों को रटने के बजाय व्यावहारिक ज्ञान यानी 'लर्निंग बाई डूइंग' पर जोर दिया जाता है. इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए वे वर्तमान में 'हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख' यानी हियाल (HIAL) यूनिवर्सिटी के माध्यम से उच्च शिक्षा में भी ऐसे ही व्यावहारिक और पर्यावरण-अनुकूल कोर्सेज को बढ़ावा दे रहे हैं.

लद्दाख की प्यास बुझाने वाला 'आइस स्तूपा'
सोनम वांगचुक के आविष्कार लद्दाख की भौगोलिक और मौसमी चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी दुनिया में बेजोड़ माने जाते हैं. लद्दाख में सर्दियों के दिनों में पानी बहकर बर्बाद हो जाता है, जबकि वसंत ऋतु में जब किसानों को फसलों के लिए पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब वहां पानी की भारी किल्लत हो जाती है. इस गंभीर संकट को दूर करने के लिए वांगचुक ने साल 2013 में 'आइस स्तूपा' यानी कृत्रिम ग्लेशियर का आविष्कार किया.
इस तकनीक में सर्दियों के पानी को एक पाइप के जरिए ढलान से नीचे लाया जाता है, जिससे प्राकृतिक दबाव बनता है और पानी एक फव्वारे के रूप में हवा में ऊपर उछलता है.

आइस स्तूप के अविष्कार से पानी की समस्या से एक हद तक राहत मिलती है.

दुनिया ने माना लोहा, मिला 'एशिया का नोबेल'
सोनम वांगचुक को साल 2018 में प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस पुरस्कार को पूरे एशिया का नोबेल पुरस्कार माना जाता है. इसके अलावा उनके आइस स्तूपा प्रोजेक्ट के लिए उन्हें साल 2016 में वैश्विक स्तर पर 'रोलेक्स अवार्ड्स फॉर एंटरप्राइज' से नवाजा गया. उन्हें साल 2017 में 'ग्लोबल अवार्ड फॉर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर' और 2014 में 'यूनेस्को चेयर फॉर अर्थन आर्किटेक्चर' सम्मान भी मिल चुका है.
यह भी पढ़ें: सोनम वांगचुक सफदरजंग अस्पताल में, जंतर-मंतर पर अब अभिजीत दीपके ने शुरू किया अनशन
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं