- अमरावती में भारत की पहली क्वांटम कंप्यूटिंग टेस्टिंग फैसिलिटी देश के टेक भविष्य के लिए बड़ा कदम है.
- क्वांटम कंप्यूटर क्यूबिट के जरिए एक साथ कई संभावनाओं पर एक साथ काम करके जटिल समस्याओं को तेजी से हल करते हैं.
- भारत ने करोड़ों का निवेश किया है लेकिन चीन और अमेरिका से मुकाबला करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है.
भारत अब उस टेक्नोलॉजी की दुनिया में कदम रख रहा है जिसे भविष्य की सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है. आंध्र प्रदेश के अमरावती में मंगलवार (14 अप्रैल 2026) को देश की पहली स्वदेशी क्वांटम कंप्यूटिंग टेस्टिंग फैसिलिटी लॉन्च हो गई है. इस पहल को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने लॉन्च किया है. इसे एसआरएम यूनिवर्सिटी अमरावती में स्थापित किया गया है. यह प्रोजेक्ट अमरावती क्वांटम वैली का हिस्सा है, जिसे नेशनल क्वांटम मिशन के तहत विकसित किया जा रहा है. सरकार का लक्ष्य क्वांटम कंप्यूटिंग में देश को आत्मनिर्भर बनाना और वैश्विक रेस में एक अहम और मजबूत जगह बनाना है. चलिए बताते हैं कि आखिर यह क्वांटम कंप्यूटिंग है क्या और कैसे यह भविष्य में टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग बन सकता है.

क्वांटम टेक्नोलॉजी कैसे काम करती है और क्यों इसे गेम चेंजर कहा जा रहा है?
आम कंप्यूटर जिसे हम-आप इस्तेमाल करते हैं वो बाइनरी सिस्टम बिट्स 0 या 1 पर कार्य करते हैं. यानी हर बिट या तो 0 होता है या 1. लेकिन क्वांटम कंप्यूटर्स इससे बिल्कुल अलग होते हैं. वो क्यूबिट पर काम करते हैं. यानी 0 और 1 दोनों एक साथ हो सकते हैं. इसे सुपरपोजिशन कहा जाता है. मतलब साफ है- एक आम कंप्यूटर एक समय में एक ही रास्ते से समस्या हल करता है जबकि क्वांटम कंप्यूटर एक साथ कई संभावित रास्तों को एक्सप्लोर कर सकता है.

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क्रांतिकारी बदलाव आने की संभावना
सुपरपोजिशन के संदर्भ में क्वांटम फिजिक्स कहती है कि छोटे स्तर पर मॉलिक्युल्स (कण) एक साथ कई स्टेट में रह सकते हैं. इलेक्ट्रॉन एक साथ कई एनर्जी स्टेट में हो सकता है. क्यूबिट उसी सिद्धांत पर काम करता है. मतलब ये एक ही समय में कई समस्याओं पर काम कर सकता है. यही कारण है कि यह टेक्नोलॉजी बेहद जटिल समस्याओं को बहुत तेजी से हल कर सकती है.
चाहे नई दवाओं की खोज हो या बड़े डेटा का एनालिसिस करना हो. कोई बेहद मुश्किल मैथ्स की समस्या हो या साइबर सिक्योरिटी और क्रिप्टोग्राफी जैसी गूढ़ चीजें, क्वांटम कंप्यूटर्स पूरी टेक की दुनिया के लिए वरदान बन सकते हैं. क्वांटम कम्यूनिकेशन, डेटा को लगभग हैक-प्रूफ बना सकती है. तो क्वांटम मटीरियल्स, नई पीढ़ी के सुपरकंडक्टर्स बना सकते हैं.
रेयर अर्थ बेरियम कॉपर ऑक्साइड जैसे सुपरकंडक्टर्स कॉम्पैक्ट फ्यूजन रिएक्टर्स में बेहद कारगर साबित होगें, जिनमें भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा के बड़े स्रोत बनने की पूरी संभावना है. यानी यह टेक्नोलॉजी आने वाले समय में हर बड़े सेक्टर को बदलने वाली है.
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पर इसे बनाने में एक बड़ी समस्या भी है...
हालांकि इसे बनाना इतना आसान भी नहीं क्योंकि इससे जुड़ी एक बड़ी मुश्किल इसे गर्मी और आवाज से बचाना होता है. जी हां, यह तकनीक एक तरफ बेहद ताकतवर है तो दूसरी ओर उतनी ही नाजुक भी है. हल्की गर्मी भी सिस्टम को खराब कर सकती है. तो बाहरी शोरगुल से क्यूबिट टूट जाता है. इसे करीब-करीब परम शून्य यानी एब्सलूट जीरो तापमान पर चलाना पड़ता है.
यह वरदान कैसे साबित हो सकता है?
इससे हेल्थकेयर में क्रांति आ जाएगी क्योंकि आज जिस दवा के रिसर्च में 10 साल लग जाते हैं उसे यह रियल टाइम में कर सकता है. इससे दवाओं की उत्पत्ति बहुत तेज हो सकती है. इससे कैंसर, वायरस, बैक्टीरिया पर आधारित बीमारियों समेत अन्य रहस्यमयी बीमारियों के इलाज में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
वहीं आज जिस तरह से साइबर सिक्योरिटी और डेटा की सुरक्षा को लेकर हर रोज नई चुनौतियां सामने रही हैं वहीं क्वांटम कंप्यूटिंग की मदद से सुरक्षित डेटा या साइबर सिक्योरिटी को हैक करना लगभग नामुमकिन होगा. ऐसे में यह देश की सुरक्षा और बैंकिंग सेक्टर के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है.

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जबकि शेयर बाजार के लिए रिस्क का पूर्वानुमान लगाना, धोखाधड़ी का पता लगाना और प्रोटफोलियो को ऑप्टिमाइज करना बेहद आसान हो जाएगा. हर वो विश्लेषण जो आज घंटों में संभव है वो मिनटों का काम होगा.
इससे लॉजिस्टिक और सप्लाई चेन पर भी बेहद फर्क पड़ जाएगा. एयरलाइंस स्टाफ के रॉस्टर हों या विमानों के रूट्स, डिलिवरी सिस्टम हो या ट्रैफिक मैनेजमेंट, क्वांटम सिस्टम लाखों डेटा को एक साथ ऑप्टिमाइज करके कुल खर्च को भी कम करेगा, साथ ही समय की बहुमूल्य बचत भी होगी.
इसके साथ ही भविष्य के AI भी क्वांटम की ताकत वाले होंगे यानी बेहद शक्तिशाली समझ वाले जो बड़े-से-बड़ा डेटा आसानी से समझ लेंगे और नतीजे देंगे. इसके इस्तेमाल से मौसम का पूर्वानुमान लगाने में भी क्रांतिकारी परिवर्तन होने की संभावना है.
लेकिन सच्चाई यह भी है कि क्वांटम कंप्यूटिंग अभी पूरी तरह से तैयार नहीं है. इस पर प्रयोग ही चल रहे हैं, जिसमें बड़ी मात्रा में एरर आ रहे हैं. वहीं टेक्नोलॉजी बहुत महंगी है लिहाजा सार्वजनिक इस्तेमाल में आने में इसे कई साल लग सकते हैं.
हालांकि जब यह पूरी तरह से सफल हो जाएगा तो कंप्यूटिंग की दुनिया में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी. तो जैसे बिजली ने इंडस्ट्री को बदला और इंटरनेट ने पूरी दुनिया को बदल डाला, वैसे ही क्वांटम टेक्नोलॉजी आने वाले 25-30 सालों में दुनिया की पूरी दिशा ही बदल सकती है.

भारत क्यों लगा रहा है इतना बड़ा दांव
भारत ने 2023 में नैशनल क्वांटम मिशन लॉन्च किया था जिसके लिए छह हजार करोड़ से अधिक का बजट तय किया गया था. इसका मकसद रिसर्च से लेकर इंडस्ट्री तक पूरा क्वांटम इकोसिस्टम बनाना है. डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया को नई ताकत देना और भारत को टेक्नोलॉजी में वर्ल्ड लीडर बनाना है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारत इस रेस में अमेरिका, चीन जैसे देशों से पीछे चल रहा है.
चीन ने इस क्षेत्र में 15 बिलियन डॉलर से अधिक निवेश किए हैं, तो अमेरिका में निजी कंपनियां ही करीब 7 बिलियन डॉलर लगा चुकी हैं. ऐसे में भारत के लिए अमरावती का यह प्रोजेक्ट बेहद अहम हो जाता है. चूंकि यह अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और टेक्नोलॉजी लीडरशिप से जुड़ी तकनीक है, लिहाजा अगर भारत इस रेस में आगे निकला तो आने वाले दशकों में यह देश की दिशा तय कर सकता है.
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