साल 1927 में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के चार क्रांतिकारियों को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी की सजा दी थी. इसके पीछे की वजह 'काकोरी कांड' था, जो 9 अगस्त 1925 को हुआ था. इसके दो साल बाद स्वतंत्रता सेनानियों को सजा के तौर पर फांसी दे दी गई थी. ऐसे में काकोरी ट्रेन एक्शन' की वर्षगांठ पर देश के कई राजनेताओं ने श्रद्धांजलि दी है. 'काकोरी ट्रेन एक्शन' की वर्षगांठ पर गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट लिखा कि काकोरी ट्रेन एक्शन स्वतंत्रता संग्राम का वह अविस्मरणीय अध्याय है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति को नई ऊर्जा दी."
गृहमंत्री ने आगे कहा कि चंद्रशेखर आजाद और राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में वीर स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने अदम्य साहस और समर्पण से इस एक्शन के माध्यम से ब्रिटिश शासन को यह बता दिया कि इस देश के संसाधनों पर देशवासियों का ही अधिकार है. देश काकोरी ट्रेन एक्शन के सभी अमर क्रांतिकारियों का सदैव ऋणी रहेगा."
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "काकोरी ट्रेन एक्शन की वर्षगांठ पर मां भारती की सेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले सभी अमर सपूतों शत-शत नमन करता हूं. इस ऐतिहासिक घटना ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई गति और ऊर्जा प्रदान करते हुए जन-जन को देश की स्वतंत्रता के लिए जागृत किया. मातृभूमि की रक्षा के लिए मर-मिटने वाले अमर बलिदानियों की गौरव गाथा सदैव भावी पीढ़ियों को गौरवान्वित करती रहेगी."
इसके अलावा कई अन्य नेताओं ने भी इस घटना को याद करते हुए सोशल मीडिया के जरिए श्रद्धांजलि अर्पित की है. ऐसे में आइए जानते हैं कि काकोरी ट्रेन एक्शन क्या था और घटना के वक्त क्या हुआ था.
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काकोरी ट्रेन एक्शन की घटना क्या थी?
काकोरी में ट्रेन डकैती हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) का पहला बड़ा एक्शन था. 'नंबर 8 डाउन ट्रेन' शाहजहांपुर और लखनऊ के बीच चलती थी. एक दिन, इस ट्रेन में सरकारी खजाने के बैग थे, जिन्हें लखनऊ में ब्रिटिश खजाने में जमा किया जाना था.
क्रांतिकारियों ने इस पैसे को लूटने की योजना बनाई, क्योंकि उनका मानना था कि यह पैसा असल में भारतीयों का ही है. उनका मकसद HRA के लिए फंड जुटाना और अपने काम और मिशन की ओर लोगों का ध्यान खींचना था.
9 अगस्त 1925 को, जब ट्रेन लखनऊ से करीब 15 किलोमीटर दूर काकोरी स्टेशन से गुजर रही थी, तो पहले से ही ट्रेन में मौजूद HRA के सदस्य राजेंद्रनाथ लाहिड़ी ने चेन खींचकर ट्रेन रोक दी. इसके बाद, राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्लाह खान सहित करीब दस क्रांतिकारी ट्रेन में चढ़े और गार्ड को काबू में कर लिया. उन्होंने खजाने के बैग लूट लिए और लखनऊ भाग गए. इस बैग में करीब 4,600 रुपये थे. HRA की स्थापना राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्ला खान ने किया था.
इस घटना के बाद, ब्रिटिश अधिकारी भड़क गए और उन्होंने हिंसक कार्रवाई शुरू कर दी. जल्द ही HRA के कई सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया. बिस्मिल को अक्टूबर में गिरफ्तार किया गया. अशफाकउल्लाह नेपाल और फिर डाल्टनगंज (जो अब झारखंड में है) चले गए थे. उन्हें एक साल बाद गिरफ्तार किया गया. अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किए गए चालीस लोगों में से चार को मौत की सजा सुनाई गई, जबकि बाकियों को लंबी जेल की सजा मिली. कहा जाता है कि HRA के दो सदस्यों ने उनके साथ धोखा किया था. इस घटना के बाद, HRA के एकमात्र प्रमुख नेता जो गिरफ्तारी से बच पाए, वे चंद्रशेखर आजाद थे.
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