- साल 2006 में वाम मोर्चा सरकार ने सिंगुर में टाटा मोटर्स की नैनो कार फैक्ट्री के लिए कृषि भूमि अधिग्रहित की थी
- 2008 में किसानों के विरोध आंदोलन के कारण टाटा मोटर्स ने परियोजना वापस लेकर गुजरात में फैक्ट्री स्थापित की थी
- 2011 में ममता बनर्जी की सरकार ने किसानों को मासिक आर्थिक सहायता और चावल देने का निर्णय लिया था
साल 2006 में जिस सिंगुर ने पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी थी, वही सिंगुर आज 18 साल बाद फिर सवालों के घेरे में खड़ा है. तब सवाल था—उपजाऊ ज़मीन पर उद्योग क्यों? आज सवाल है—आख़िर उस ज़मीन का हुआ क्या? जिस आंदोलन ने वाम मोर्चा की 34 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंका, उसी आंदोलन के बाद बने हालात से आज सिंगुर का किसान सबसे ज़्यादा उलझा हुआ नज़र आ रहा है.
सत्ता बदली, सरकार बदली, लेकिन ज़मीन, खेती और रोज़गार को लेकर असमंजस जस का तस बना हुआ है.
2006: जब सिंगुर बना राजनीति का केंद्र
साल 2006 में तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने सिंगुर में टाटा मोटर्स की नैनो कार फैक्ट्री के लिए करीब 1,000 एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहित करने का फैसला लिया. भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत ज़मीन लेने की प्रक्रिया शुरू हुई.आरोप लगे कि किसानों से जबरन ज़मीन ली जा रही है और भूमिहीन मज़दूरों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई.
इसी मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने आंदोलन का नेतृत्व किया. आंदोलन तेज़ होता गया, राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई और अंततः 2008 में टाटा मोटर्स ने परियोजना वापस लेकर गुजरात के साणंद में फैक्ट्री स्थापित कर ली.

2011: आंदोलन से सत्ता तक
सिंगुर आंदोलन पश्चिम बंगाल की राजनीति में निर्णायक साबित हुआ. साल 2011 में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं. सत्ता में आने के बाद सिंगुर की ज़मीन को लेकर विशेष समिति बनाई गई. किसानों को हर महीने 2,000 रुपये और 16 किलो चावल देने का फैसला हुआ, जो आज भी लागू है.2016 में सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण को रद्द करते हुए ज़मीन किसानों को लौटाने का आदेश दिया. इसके बाद लगभग 60 प्रतिशत ज़मीन जो किसानों को वापस मिली, उसे पूरी तरह खेती योग्य बनाने का दावा किया गया.
ज़मीनी हकीकत थोड़ी अलग दिख रही है.
स्थानीय किसानों का कहना है कि ज़मीन वापस तो मिली, लेकिन वह पहले जैसी उपजाऊ नहीं रही.करीब 50 से 70 प्रतिशत ज़मीन आज भी ऐसी है, जहां नियमित खेती संभव नहीं हो पा रही है. स्थानीय निवासी मलय घोष बताते हैं, “कहा गया था कि खेती भी होगी और उद्योग भी आएगा. लेकिन हकीकत यह है कि न खेती बची, न उद्योग आया. सब कुछ तबाह कर दिया गया. 148 लोगों के लिए इतनी बड़ी फैक्ट्री बंद कर दी गई. आखिर सिंगुर को क्या मिला—16 किलो चावल और 2,000 रुपये.”
सिंगुर क्षेत्र में आलू और धान मुख्य फसलें रही हैं, लेकिन किसान बताते हैं कि अब लागत बढ़ गई है और दाम नहीं मिल रहे.
सिंगुर के किसान दिलीप कहते हैं, “मेरे पास सिर्फ़ एक बीघा ज़मीन है. किसी तरह ज़िंदगी कट रही है. पहले आलू की बोरी 400 रुपये में बिकती थी, अब 200 में भी नहीं बिकती. सारे आलू को कोल्ड स्टोरेज में रखना पड़ता है. किसान बर्बाद हो गए हैं. सरकार कहती है 2,000 रुपये दे रही है, लेकिन सब किसानों को नहीं मिलता. स्थानीय नेता चेहरा देखकर स्लिप देते हैं. हमें बोला गया कि अब पैसा नहीं मिलेगा. मैं आंदोलन में था, मार भी खाई थी. अंधेरे में हमें पीटा गया. आज लगता है कि इतनी अच्छी ज़मीन चली गई. तब लगा था सही कर रहे हैं, लेकिन अब लोग खुद कह रहे हैं कि फैक्ट्री होनी चाहिए थी.”
सभी किसान एक राय नहीं
हालांकि सिंगुर में किसानों की राय एक जैसी नहीं है. कुछ आज भी मानते हैं कि उपजाऊ ज़मीन पर उद्योग नहीं होना चाहिए. प्रोसेनजीत दास सिंगुर में किसानी कर अपना घर चलाते हैं. उनका कहना है, “हमने आंदोलन इसलिए किया क्योंकि कृषि भूमि में उद्योग नहीं होने चाहिए. अगर खेतों में फैक्ट्री होगी, तो लोग क्या खाएंगे? उस समय सरकार ने किसानों से बात नहीं की और जबरदस्ती ज़मीन ली. ज़मीन वापस मिली है, लेकिन जिस ज़मीन पर खेती नहीं होती, वह साल भर में फिर बंजर हो जाती है.”
दूध कुमार धारा अब संतुलन की बात कर रहे हैं और कहते हैं, “हम चाहते हैं कि 1,000 एकड़ में से 50 प्रतिशत ज़मीन खेती के लिए और 50 प्रतिशत उद्योग के लिए हो. जहां खेती संभव है, वहां खेती हो. बाकी बंजर ज़मीन पर उद्योग से हमें कोई आपत्ति नहीं.” कुछ किसान सरकार के प्रयासों को अधूरा मानते हैं, तो कुछ मानते हैं कि कोशिश हो रही है. जयराम घोष ने बताया, “सरकार मेहनत कर रही है, लेकिन जब खेती नहीं होती तो वही ज़मीन फिर समस्या बन जाती है.” वहीं पियूष कांटी घोष का कहना है, “2,000 रुपये में घर नहीं चलता. हमें और चाहिए. खेती योग्य ज़मीन खेती के लिए ही रहनी चाहिए.”
प्रधानमंत्री का दौरा और फिर गरमाई राजनीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावित सिंगुर दौरे को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज़ हैं. 2006 में तृणमूल कांग्रेस आंदोलन की अगुआ थी, आज सत्ता में है. आज विपक्ष में भारतीय जनता पार्टी है. लेकिन इस राजनीतिक शोर के बीच किसान का सवाल अब भी वही है— जीत किसकी हुई? राजनीति की या किसान की? सिंगुर का आंदोलन इतिहास बन चुका है, लेकिन उसका असर आज भी ज़मीन पर महसूस किए जा सकता है. जिस आंदोलन ने सत्ता बदली, वह किसान की ज़िंदगी पूरी तरह नहीं बदल सका.
आज सिंगुर दो ध्रुवों के बीच खड़ा है— एक ओर बंजर होती ज़मीन, दूसरी ओर रोज़गार और उद्योग की तलाश. और इस पूरी लड़ाई में अगर कोई सबसे ज़्यादा छूट गया है, तो वह है सिंगुर का किसान.
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