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Suvendu Adhikari: पार्षद से कैसे 30 सालों में CM पद पर पहुंचे शुभेंदु अधिकारी, कभी ममता के वफादार रहे, 5 साल पहले BJP में आए और बदल दी किस्मत

Suvendu Adhikari News: बंगाल के नए 'अधकारी' शुभेंदु की चर्चा कर लेना जरूरी है. वो शख्स जो कभी ममता बनर्जी का सबसे खास था, अचानक पार्टी छोड़ी बीजेपी के हो गए. पहले 2021 में नंदीग्राम में हराया तो इस बार भवानीपुर भी जीत लिया. ममता का ही खास होकर ममता दीदी को उन्हीं के गढ़ में दो बार हराना आसान भी नहीं था.

Suvendu Adhikari: पार्षद से कैसे 30 सालों में CM पद पर पहुंचे शुभेंदु अधिकारी, कभी ममता के वफादार रहे, 5 साल पहले BJP में आए और बदल दी किस्मत
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  • शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री होंगे, शपथ ग्रहण समारोह 21 राज्यों के CMs की उपस्थिति में होगा
  • शुभेंदु अधिकारी का जन्म 1970 में पूर्वी मेदिनीपुर के कांथी में हुआ और वे राजनीतिक परिवार से आते हैं
  • 2020 में टीएमसी से इस्तीफा देकर शुभेंदु भाजपा में शामिल हुए और 2021 में ममता बनर्जी को नंदीग्राम से हराया था
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नई दिल्ली:

Suvendu Adhikari West Bengal CM: पश्चिम बंगाल की सियासत के लिए आज का दिन बहुत बड़ा है. भाजपा ने प्रचंड जीत के बाद अपने नए सीएम का ऐलान भी कर दिया है. शुभेंदु अधिकारी बंगाल के नए मुखिया होंगे और आज 11 बजे शपथग्रहण के साथ ही प्रदेश में एक नए युग की शुरुआत हो जाएगी. बीजेपी ने शपथग्रहण समारोह को भव्य बनाने के लिए 21 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को न्योता भेजा है, जहां या तो बीजेपी का सीएम है या पार्टी गठबंधन में है. पीएम मोदी,  गृह मंत्री अमित शाह,राजनाथ सिंह सरीखे कद्दावर नेताओं की उपस्थिति से भाजपा इसे शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी दिखाना चाहती है. इस बीच बंगाल के नए 'अधकारी' शुभेंदु की चर्चा कर लेना जरूरी है. वो शख्स जो कभी ममता बनर्जी का सबसे खास था, अचानक पार्टी छोड़ी बीजेपी के हो गए. पहले 2021 में नंदीग्राम में हराया तो इस बार भवानीपुर भी जीत लिया. ममता का ही खास होकर ममता दीदी को उन्हीं के गढ़ में दो बार हराना आसान भी नहीं था. शुभेंदु दोनों चुनावों में ममता बनर्जी के मजबूत विकल्प बनकर उभरे, आइए खास दिन बात  होगी शुभेंदु अधिकारी की...

पूर्वी मेदिनीपुर में जन्म, पिता का बंगाल की राजनीति में बड़ा नाम 

शुभेंदु अधिकारी आज से 55 साल पहले 15 दिसंबर 1970 को पूर्वी मेदिनीपुर के कांथी में एक समृद्ध राजनीतिक परिवार में जन्मे थे. पिता 
शिशिर अधिकारी पहले ही बंगाल की राजनीति में जानी-मानी शख्सियत थे सो नाम और रुतबा पहले से ही था.मेदिनीपुर के पूरे क्षेत्र पर दशकों से अधिकारी परिवार का गहरा प्रभाव रहा है. शुभेंदु ने सबसे पहले 1989 में कांग्रेस की छात्र परिषद के माध्यम से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की. सियासी बारीकियां भी वहीं सीखीं जहां कहा जाता था उनके परिवार की सहमति के बिना पत्ता भी नहीं हिलता. 

लेफ्ट की हुकूमत के बीच खुद का वजूद बनाया 

शुभेंदु जब राजनीतिक बारीकियां सीख रहे थे तब बंगाल में लेफ्ट का काफी दबदबा था. उस बीच विपक्षी छात्र नेता के रूप में शुभेंदु ने अपनी जगहरह बनाई जो वाकई काबिल-ए-तारीफ है. यह उनके संघर्ष और नेतृत्व क्षमता का पहला बड़ा प्रमाण था. साल  1995 में कांथी नगर पालिका में पार्षद के रूप में चुनकर उन्होंने अपने चुनावी सफर की औपचारिक शुरुआत की. 

ममता के चहेते बने शुभेंदु

पार्षद बनने के बाद साल 1998 में जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नींव रखी, तो शुभेंदु अधिकारी और उनका परिवार बिना किसी संकोच के ममता के साथ जुड़ गया. टीएमसी से जुड़ते ही शुभेंदु के लिए चुनौतियां भी इंतजार कर रही थीं. 9 साल बाद एक घटना हुई.वामपंथी सरकार ने नंदीग्राम में केमिकल हब बनाने के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहित करने का फैसला किया, उस समय लेफ्ट सरकार इतनी शक्तिशाली थी कि कोई भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता था.यहीं पर शुभेंदु अधिकारी ने वो कर दिखाया, जिसने उन्हें एक आम नेता से 'मास लीडर' बना दिया. 

ममता बनर्जी बेशक इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा थीं.वह कोलकाता से लेकर दिल्ली तक मीडिया में नंदीग्राम की आवाज उठा रही थीं, लेकिन कैमरों से दूर असली लड़ाई नंदीग्राम की संकरी पगडंडियों और खेतों में लड़ी जा रही थी. जमीन पर इस आंदोलन को खड़ा करने, लोगों को हिम्मत देने और लेफ्ट के मजबूत काडर से सीधी टक्कर लेने का काम शुभेंदु अधिकारी कर रहे थे.

उन्होंने गांव वालों को एकजुट करके 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी' (BUPC) बनाई. शुभेंदु का काम करने का तरीका बाकी नेताओं से बिल्कुल अलग था.वह सिर्फ रैलियों में भाषण देकर वापस कोलकाता लौटने वाले नेता नहीं थे. वह रात को नंदीग्राम के गांवों में रुकते, लोगों से ठेठ स्थानीय भाषा में बात करते और उनके डर को दूर करते. जहां लेफ्ट सरकार पुलिस और अपने काडर के दम पर लोगों को डरा रही थी, वहीं शुभेंदु किसानों के लिए एक मजबूत ढाल बनकर खड़े हो गए थे. इसी जमीनी जुड़ाव की वजह से गांव वाले उन पर आंख मूंदकर भरोसा करने लगे थे. 14 मार्च 2007 की पुलिस फायरिंग के बाद, जब पूरा प्रदेश खौफ में था, शुभेंदु ने पीछे हटने के बजाय घायलों को अस्पताल पहुंचाया और डरे हुए परिवारों का संबल बने.

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नंदीग्राम की बंपर जीत और शुभेंदु का उदय 

राजनीति के जानकार मानते हैं कि नंदीग्राम की असली चाबी शुभेंदु के हाथों में थी, जिससे 2011 में 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार का पतन सुनिश्चित हुआ. 2011 की बंपर जीत ने यह साबित कर दिया कि शुभेंदु अधिकारी अब केवल एक विधायक नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति के एक स्तंभ बन चुके हैं. उनकी कार्यक्षमता को देखते हुए ममता बनर्जी ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत करने के लिए 2009 के लोकसभा चुनाव में तमलुक सीट से उतारा.उन्होंने लेफ्ट के दिग्गज नेता लक्ष्मण सेठ को 1 लाख से ज्यादा वोटों से हराकर न केवल अपनी ताकत दिखाई, बल्कि नंदीग्राम के किसानों के लिए एक प्रकार का 'न्याय' भी सुनिश्चित किया.2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद, उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी.

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2016 में शुभेंदु को मिले अहम मंत्रालय और फिर एक उपजा एक असंतोष

2016 में ममता बनर्जी को बंगाल के प्रशासनिक ढांचे और संगठन को और अधिक धार देने के लिए शुभेंदु की जरूरत महसूस हुई. उन्हें वापस राज्य की राजनीति में बुलाया गया और परिवहन और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए गए. इन विभागों के जरिए शुभेंदु का सरकारी मशीनरी और जमीनी ढांचे पर नियंत्रण और भी मजबूत हो गया.इस दौरान उन्होंने मुर्शिदाबाद, मालदा और जंगल महल जैसे उन क्षेत्रों में भी टीएमसी को खड़ा किया, जहां पहले विपक्ष का कब्जा था.वे पूरे बंगाल के हर कार्यकर्ता के लिए 'दादा' बन चुके थे.

लेकिन राजनीतिक सफर कभी एक सीधी लकीर में नहीं चलता.2016 के बाद कुछ विवादों ने उनकी छवि को प्रभावित किया, लेकिन असली भूकंप 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद आया. बीजेपी के बेहतरीन प्रदर्शन ने ममता बनर्जी को परेशान कर दिया, जिसके बाद चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की एंट्री हुई. इसी दौरान ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी का पार्टी में वर्चस्व बहुत तेजी से बढ़ा.शुभेंदु जैसे 'ग्राउंड लीडर' को महसूस होने लगा कि पार्टी में कॉर्पोरेट स्टाइल के दखल के कारण उनके जैसे पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है. यह असंतोष महीनों तक सुलगता रहा और आखिरकार नवंबर 2020 में कैबिनेट से इस्तीफे के साथ बाहर आ गया.

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लाख रोका गया पर शुभेंदु ने कर दी थी बगावत

इसके बाद तो जैसे टीएमसी में खलबली मच गई और पार्टी आलाकमान को समझ आ गया कि एक बहुत बड़े कद का नेता उनके हाथ से फिसल रहा है.टीएमसी के वरिष्ठ नेता सौगता रॉय और खुद प्रशांत किशोर ने शुभेंदु को मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन शुभेंदु अपना मन बना चुके थे.

दिसंबर 2020 में शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस और विधायकी से इस्तीफा दे दिया.यह एक 20 साल पुराने रिश्ते का अंत था. 19 दिसंबर 2020 को मेदिनीपुर में अमित शाह की रैली में उन्होंने भगवा चोला ओढ़ लिया.टीएमसी के लिए यह एक बड़ा झटका था, जबकि बीजेपी के लिए यह बंगाल में सत्ता के द्वार खोलने जैसा था. टीएमसी ने उन पर ईडी और सीबीआई के डर का आरोप लगाया, जबकि शुभेंदु ने पार्टी को 'प्राइवेट लिमिटेड कंपनी' बताकर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी.

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नंदीग्राम का कुरुक्षेत्र

2021 के चुनाव में ममता बनर्जी ने अपनी सुरक्षित भवानीपुर सीट छोड़कर शुभेंदु के गढ़ नंदीग्राम से लड़ने का फैसला किया.यह चुनावी मुकाबला नहीं, बल्कि साख और अहंकार का युद्ध बन गया था. नंदीग्राम में शुभेंदु ने ममता बनर्जी को हराकर पूरे देश को चौंका दिया. इस जीत ने उन्हें रातों-रात बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया और उन्हें 'लीडर ऑफ अपोजिशन' का पद मिला.

वर्तमान और भविष्य का दृष्टिकोण

आज शुभेंदु अधिकारी ममता सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं. वे बंगाल में बीजेपी का सबसे मुखर और आक्रामक चेहरा हैं.शुभेंदु और ममता की यह सियासी दुश्मनी इस बात का सटीक उदाहरण है कि राजनीति में न कोई पक्का दोस्त होता है और न ही कोई पक्का दुश्मन.
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि नंदीग्राम का यह नायक, जिसने लेफ्ट को गिराया और फिर 'दीदी' को चुनौती दी, वह आने वाले समय में बंगाल की सत्ता का समीकरण कैसे बदलेगा.
 

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