- यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीट बंटवारे पर अभी औपचारिक बातचीत शुरू नहीं हुई है
- कांग्रेस यूपी में गठबंधन में बराबर हिस्सेदारी की उम्मीद रखती है, जबकि समाजवादी पार्टी कम सीट देना चाहती है
- UP कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने दलित वोट बैंक मजबूत करने और गठबंधन को मजबूती देने का काम शुरू किया है
यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच फिलहाल सीट बंटवारे पर औपचारिक रूप से बातचीत शुरू नहीं हुई है. कांग्रेस कितनी सीटें चाहती है. इस सवाल के जवाब में यूपी कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि मैं तो चाहूंगा कि बराबरी की हिस्सेदारी हो. जल्दी ही जब बातचीत होगी, तब शीर्ष नेतृत्व तय करेगा. मैं इतना अधिकृत नहीं हूं कि पहले ही घोषणा कर दूं, लेकिन हमारी बराबर की हिस्सेदारी की बात रहेगी.
उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं. दस साल पहले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन हुआ था. तब समाजवादी पार्टी को 298 और कांग्रेस को 105 सीटें मिलीं थीं. हालांकि कुछ सीटों पर दोनों दलों में फ्रेंडली फाइट भी हुई थी. बहरहाल चुनावों में बीजेपी की बड़ी जीत के बाद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन बिखर गया. करीब सात सालों बाद बीते लोकसभा चुनाव में दोनों दल फिर साथ आए और इस बार कामयाबी मिली. यूपी की 80 सीटों में से समाजवादी पार्टी ने 62 सीटें लड़कर 37 सीटें जीती और कांग्रेस ने 17 में से 6 सीटों पर जीत दर्ज की.

कांग्रेस नेताओं का मानना है कि 2017 में समाजवादी पार्टी की सरकार थी, तब भी गठबंधन में कांग्रेस को 105 सीटें मिली थी. तो इस बार उससे ज्यादा ही सीटें मिलनी चाहिए. कांग्रेस को यह भी लगता है चूंकि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनना है, ऐसे में समाजवादी पार्टी कांग्रेस को नाराज करना नहीं चाहेगी. कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक गठबंधन में अहम भूमिका मिली तो कांग्रेस दलित और ब्राह्मण वोटों का ट्रांसफर समाजवादी पार्टी को आसानी से करवा पाएगी. यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय अगड़ी जाति से आते हैं. लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की बड़ी जीत की एक बड़ी वजह यह थी कि दोनों घटक दलों के वोट आपस में ट्रांसफर हुए थे. ऐसा विधानसभा चुनाव में तभी होगा, जब गठबंधन में कांग्रेस को मजबूत जगह मिलेगी. इससे गैर यादव जातियों में संदेश जाएगा कि आखिलेश यादव पर कांग्रेस का नियंत्रण रहेगा.

यही नहीं एनडीटीवी से बात करते हुए राजेंद्र पाल गौतम ने बीएसपी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती से भी साथ आने का अनुरोध किया. बीजेपी विरोधी दलों से एकजुट होने की अपील करते हुए राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि जो लोग बहुजन समाज के मुद्दों पर काम करना चाहते हैं, संविधान और लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं, वो इस दमनकारी, मनुवादी सरकार के ख़िलाफ एकजुट हों, सबका स्वागत है. मायावती को लेकर उन्होंने कहा, बहन जी हमारे समाज की बड़ी नेता हैं, हम उनका सम्मान करते हैं. वो मजबूत नेता रही हैं, पता नहीं उनकी क्या मजबूरी है!
दरअसल पिछले महीने राजेंद्र पाल गौतम ने कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ लखनऊ में अचानक मायावती के आवास पहुंचकर उनसे मिलने की नाकाम कोशिश की थी. गौतम ने कहा कि मेरा उनके परिवार के साथ संबंध रहा है. इसलिए मैं उनका हाल जानने चला गया. अगर वो बुलाएंगी तो ज़रूर मिलने जाऊंगा.

बहरहाल मायावती के स्वागत की बात हो या सीट बंटवारे में बराबरी का दावा, कांग्रेस के नए प्रभारी का बयान समाजवादी पार्टी के लिए असहज करने वाला है. हालांकि माना जा रहा है कि दोनों दलों के शीर्ष नेता यानी राहुल गांधी और अखिलेश यादव कोई बीच का रास्ता निकाल लेंगे. बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से केवल 2 विधायक बन पाए और समाजवादी पार्टी ने 111 सीटों पर जीत हासिल की थी.
दलित समाज से आने वाले और पेशे से वकील राजेंद्र पाल गौतम शुरुआती दिनों में बीएसपी में सक्रिय थे. 2015 से 25 तक वो आम आदमी पार्टी से विधायक और इस दौरान केजरीवाल सरकार में करीब सात साल तक मंत्री रहे. भीमराव अंबेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने के समय ली गई प्रतिज्ञाओं को एक कार्यक्रम में दोहराने के बाद हुए विवाद के बाद उन्हें 2022 में मंत्री पद छोड़ना पड़ा. इसके बाद गौतम 2024 में कांग्रेस में शामिल हो गए. कम समय में ही उन्होंने राहुल गांधी का भरोसा जीत लिया. पिछले साल उन्हें कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग का अध्यक्ष बनाया गया था. दलित समाज में उनकी बेबाक सुर मजबूत छवि के मद्देनजर राहुल गांधी ने उन्हें अब उत्तर प्रदेश की अहम ज़िम्मेदारी सौंपी है जहां से वो ख़ुद सांसद भी हैं.
बीते विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी यूपी कांग्रेस की प्रभारी थीं. तब उन्होंने चालीस फ़ीसदी टिकटें महिलाओं को दी थीं. लेकिन आधी आबादी का दांव बुरी तरह नाकाम रहा. नए प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के पास ज़्यादा समय नहीं है और ना ही यूपी में कांग्रेस के पास मज़बूत संगठन है. ऐसे में आने वाला समय ही तय करेगा कि यूपी चुनाव में राहुल गांधी के दलित ट्रम्प कार्ड का कितना असर होता है?
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