- उद्धव को साल 2019 में BJP से गठबंधन तोड़कर कांग्रेस-एनसीपी के साथ नया महाविकास आघाड़ी गठबंधन बनाना भारी पड़ा.
- मुख्यमंत्री पद खुद लेने का फैसला उनके और एकनाथ शिंदे के बीच मतभेदों को बढ़ावा देने वाला साबित हुआ.
- कोरोना महामारी और महाविकास आघाड़ी के घटक दलों के बीच आपसी विवादों ने ठाकरे सरकार को कमजोर कर दिया.
उद्धव ठाकरे को ठीक 4 साल बाद फिर एक बार अपनी पार्टी में बगावत झेलनी पडी है. पिछली बगावत जून 2022 में हुई थी. इस बार 6 सांसदों ने उन्हें ठेंगा दिखाया है. आशंका ये भी बनी हुई है कि जल्द ही उनके विधायक और पार्षद भी टूट कर विरोधी खेमें में दाखिल हो जायेंगे. पार्टी की इस दुर्गति के पीछे साल 2019 में ठाकरे की ओर से लिये गये दो फैसले और उनकी दो आदतें कारण मानी जा रहीं है.
दो गलत फैसले... जो भारी पड़े ठाकरे को
बीजेपी से गठबंधन तोड़ कांग्रेस-एनसीपी से हाथ मिलाना. साल 2019 के विधानसभा चुनाव के पहले शिवसेना ने बीजेपी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया था. चुनाव नतीजे आने पर इसी गठबंधन को बहुमत मिला. बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि दूसरे नंबर पर शिव सेना थी. देवेंद्र फडणवीस शपथ लेने के लिये तैयार थे. लेकिन उद्धव ठाकरे इस बात पर अड़ गए कि 2.5 साल के लिए मुख्यमंत्री पद शिव सेना को मिलना चाहिए. जब बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं हुई तो उद्धव ठाकरे ने विपरीत विचारधारा वाली विरोधी पार्टियों- कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर नया गठबंधन बनाया, जिसका नाम दिया गया महाविकास आघाड़ी. बीजेपी उद्धव के इस फैसले से बड़ी आहत हुई कि सबसे बडी पार्टी होने और उसके गठबंधन को बहुमत मिलने के बावजूद वो सरकार नहीं बना सकी. इस झटके के बावजूद बीजेपी ने सत्ता में वापसी की कोशिशें जारी रखीं.
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खुद मुख्यमंत्री बनना भी एक गलती?
खुद मुख्यमंत्री बनना... जब ये तय हो गया कि मुख्यमंत्री शिव सेना का होगा तो कईयों को लगा कि उद्धव भी अपने पिता की तरह रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाएंगे. यानी खुद मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे. पार्टी में ठाकरे परिवार के बाहर सबसे ताकतवर नेता एकनाथ शिंदे थे और उन्हें लग रहा था कि ठाकरे उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाएंगे. शिंदे के अरमान पर उस वक्त पानी फिर गया, जब ठाकरे ने खुद मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना का फैसला किया. ठाकरे ने ये फैसला अपने बेटे आदित्य और पत्नी रश्मी की सलाह पर लिया था. लेकिन फैसला लेते वक्त वे शिंदे की महत्वकांक्षा की अनदेखी कर गए.
ठाकरे मुख्यमंत्री तो बन गए. लेकिन 5 साल का कार्यकाल पूरा न कर सके. उनके कार्यकाल के दौरान कोरोना महामारी ने दस्तक दे दी. महाविकास आघाडी के घटक दलों के बीच आपसी विवाद शुरू हो गए. उस सरकार में सबसे ज्यादा शरद पवार और अजीत पवार की चलती थी. यहां तक कहा जाने लगा कि शरद पवार सुपर सीएम हैं. वित्त मंत्रालय एनसीपी के पास था और कांग्रेस और एनसीपी के मंत्री और विधायक पक्षपात का आरोप लगाने लगे कि फंड बांटने में उनके साथ नाइंसाफी हुई है. इन्हीं सब बातों का फायदा उठाते हुए बीजेपी ने मह्त्वकांक्षा पर चोट पडने से घायल एकनाथ शिंदे को अपने पाले में कर लिया और उन्हें शिव सेना में बगावत करने में मदद कर दी. शिव सेना न केवल दो फाड़ हो गयी, बल्कि शिव सेना का आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह ठाकरे से छिनकर शिंदे को मिल गया.
ठाकरे की दो गलत आदतें
नेताओं और कार्यकर्ताओं से जुडाव नहीं... उद्धव ठाकरे ने साल 2003 में जबसे पार्टी की कमान संभाली, तबसे उनपर आरोप लगते आए हैं कि वे जमीनी कार्यकर्ताओं और पार्टी के नेताओं से तालमेल नहीं रखते. उनसे एक दूसरी बनाकर रखते हैं. उनसे मिलना दूभर है. वे राज्य में ज्यादा घूमते नहीं और चुनाव के मौके पर सीमित रैलियां ही करते हैं. जब वे मुख्यमंत्री थे जब भी उन पर आरोप लगे कि वे कार्यालय नहीं जाते थे और अपने बंगले मातोश्री से ही सरकार चलाते थे. उनकी अनुपलब्धता का जिक्र शरद पवार ने अपनी आत्मकथा में भी किया है.
चुनिंदा नेताओं का घेरा.. ठाकरे ने अपने इर्दगिर्द दो-तीन ऐसे नेताओं का घेरा बना रखा था जो उनके फैसलों को प्रभावित करते थे और ये तय करते थे कि ठाकरे को किससे मिलना है और किस से नहीं. ऐसा ही एक नाम था मिलिंद नार्वेकर का. साल 2005 में पहले नारायण राणे और फिर जब राज ठाकरे ने शिव सेना छोडी तो उन्होने यही आरोप लगाया. उद्धव ठाकरे की यहीं दोनो आदतें उनके लिए घातक साबित हुई और साल 2022 और 2026 में उनके खिलाफ हुई बगावत में इन्होने अहम भूमिका अदा की.
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