पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना बीजेपी का दशकों से एक प्रमुख चुनावी वादा रहा है. पिछले 12 वर्षों में बीजेपी ने इस दिशा में तेजी से कदम आगे बढ़ाए हैं. शुरुआत उत्तराखंड से हुई जो देश में समान नागरिक संहिता लागू करने वाला स्वतंत्र भारत का पहला राज्य बना. इसके बाद बीजेपी ने राज्य दर राज्य समान नागरिक संहिता के लिए फैसले किए. अब तक आठ राज्यों में इस बारे में कदम उठाए जा चुके हैं. लेकिन सवाल है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जहां बीजेपी पिछले साढ़े नौ वर्षों से शासन में है, अब तक कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया.
बीजेपी की रणनीति का हिस्सा
बीजेपी नेताओं के अनुसार यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया. पार्टी ने सबसे पहले छोटे राज्य उत्तराखंड में इसे लागू करने का फैसला किया ताकि उसके प्रभाव, प्रतिक्रिया और कानूनी पहलुओं का अध्ययन किया जा सके. केंद्रीय नेतृत्व को यह भी लगता था कि उत्तराखंड के कानून को अदालतों में चुनौती दी जा सकती है लिहाजा अदालतों का रुख देखने के बाद ही अन्य राज्यों में इस दिशा में आगे बढ़ा जाना चाहिए. वैसे उत्तराखंड के कानून को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है.
17 राज्यों में बीजेपी के सीएम
इसके बाद एक-एक कर बीजेपी शासित राज्यों ने आगे बढ़ना शुरू भी कर दिया है. अभी 17 राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्री हैं. इनमें गुजरात, प बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और असम ने उत्तराखंड की तर्ज पर समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कदम उठा लिए हैं. गुजरात और असम ने इसे लागू करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है. वहीं अन्य पांच बीजेपी शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता के लिए समितियों का गठन कर दिया गया है और जल्दी ही विधेयक भी विधानसभा में लाए जाएंगे.
अमित शाह का रुख
गृह मंत्री अमित शाह ने मई 2026 में दिल्ली के लाल किले पर आयोजित जनजातीय महाकुंभ में आदिवासी समुदायों को आश्वस्त कर चुके हैं कि जो भी यूसीसी लागू होगा, वह आदिवासी क्षेत्रों और आदिवासी व्यक्तियों पर लागू नहीं होगा। साथ ही, उनके अधिकारों, संस्कृति और परंपराओं से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी. उत्तराखंड के कानून में भी आदिवासियों को बाहर रखा गया है और यही आश्वासन अन्य राज्यों में भी दिया गया है.
क्या कहते हैं योगी
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने अभी तक समान नागरिक संहिता की दिशा में कोई कदम आगे क्यों नहीं बढ़ाया है. पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए जारी अपने घोषणापत्र में इसका सीधे तौर पर वादा भी नहीं किया था. न ही योगी सरकार ने अन्य बीजेपी शासित राज्यों की तरह समिति का गठन कर समान नागरिक संहिता की दिशा में कोई कदम आगे बढ़ाया है. न ही मुख्यमंत्री योगी की ओर से सीधे तौर पर इसे लागू करने को लेकर कोई बयान दिया गया है. हालांकि यूसीसी को लेकर उनके कई बयानों की बहुत चर्चा हुई है. इनमें से पिछले साल जनवरी में दिया गया एक बयान काफी चर्चित है जिसमें उन्होंने कहा था कि यूपी में तो समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है. माना गया कि उनका इशारा विवाह के पंजीकरण और अन्य प्रावधानों को लेकर था.
इसके बाद जुलाई 2023 में योगी ने यूसीसी को सामाजिक न्याय से जोड़ा था. उन्होंने विपक्षी दलों के सामाजिक न्याय के नारे पर तंज कसते हुए कहा, "वास्तविक सामाजिक न्याय की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का हो. आधी आबादी को उनके अधिकारों से वंचित करके आप सामाजिक न्याय की बात नहीं कर सकते." उन्होंने यह भी विश्वास जताया था कि "एक न एक दिन देश में समान नागरिक संहिता जरूर लागू होकर रहेगी." जब देश भर में विधि आयोग ने यूसीसी पर आम जनता और धार्मिक संगठनों से सुझाव मांगे थे, तब उत्तर प्रदेश राज्य विधि आयोग ने भी इस पर अपनी सैद्धांतिक सहमति दी थी.
फिर लागू क्यों नहीं?
जब योगी आदित्यनाथ प्रचंड रूप से समान नागरिक संहिता के पक्ष में हैं तब उनकी सरकार ने इसे लागू करने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया है. बीजेपी नेताओं के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं. वे इस बात से इनकार करते हैं कि आपसी मतभेदों के कारण ऐसा हुआ. बल्कि इसके पीछे व्यावहारिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं. पहली बात तो यह है कि 2022 के चुनावी घोषणापत्र में वादा न होने के कारण बीजेपी पर इसे पूरा करने की कोई चुनावी बाध्यता नहीं है. पार्टी ने तब लव जिहाद और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों का जिक्र किया था लेकिन सीधे तौर पर समान नागरिक संहिता का उल्लेख नहीं किया था.
सूत्रों के अनुसार अभी पार्टी ने यह तय नहीं किया है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में इसे मुद्दा बनाया जाएगा या नहीं। उनके मुताबिक यूसीसी को घोषणा पत्र में डालने का प्रश्न अभी जल्दबाजी का है और उचित समय आने पर इस बारे में निर्णय किया जाएगा। उन्होंने इन बातों को निराधार बताया कि पसमांदा मुस्लिम समाज को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही बीजेपी इसी कारण समान नागरिक संहिता नहीं लाना चाहती है। उन्होंने कहा कि राज्य में ध्रुवीकरण बिल्कुल स्पष्ट है और ऐसे में मुस्लिमों का कोई भी वर्ग शायद ही बीजेपी का साथ दे।
राष्ट्रीय स्तर पर कानून
एक प्रश्न यह भी उठ रहा है कि जिस तरह बीजेपी संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की व्यवस्था करने में लगी है, क्या उसके पीछे उसका इरादा समान नागरिक संहिता का विधेयक संसद में पारित कराना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार सेक्युलर सिविल कोड की वकालत की है जिसे देशव्यापी समान नागरिक संहिता कहा गया है. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के लिए अलग से कानून बनाने के बजाय, यूपी सरकार इस बात का इंतजार कर रही है कि क्या केंद्र सरकार खुद संसद के जरिए पूरे देश के लिए एक कॉमन सिविल कोड लेकर आती है. अगर केंद्र ऐसा करता है, तो यूपी को अलग से कानून बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. यूपी सरकार का पूरा ध्यान फिलहाल कानून-व्यवस्था को और मजबूत करने और केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए आपराधिक कानूनों को जमीनी स्तर पर लागू करने पर केंद्रित है. ऐसे में लगता है कि योगी सरकार एक समय में एक ही बड़े कानूनी बदलाव को प्राथमिकता दे रही है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं