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क्यों आदमखोर बनते जा रहे हैं बाघ? सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट में आयी बड़ी चेतावनी

CSE की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इकोलॉजी और हैबिटैट में बदलाव के कारण भारत में बाघों का व्यवहार बदल रहा है. जनवरी‑जून 2025 में बाघों के हमलों में 43 लोगों की मौत हुई.

क्यों आदमखोर बनते जा रहे हैं बाघ? सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट में आयी बड़ी चेतावनी
  • भारत में पर्यावरणीय बदलाव और मानव गतिविधियों के दबाव से बाघों के स्वभाव में बदलाव देखने को मिला है
  • जनवरी से जून 2025 में बाघों द्वारा कम से कम 43 लोगों की हत्या की गई, जो पिछले वर्ष के लगभग समान है
  • बाघों के प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहे हैं, जिससे वे जंगलों के बाहर मानव बस्तियों में आकर संघर्ष कर रहे हैं
नई दिल्ली:

देश में तेजी से बदलती इकोलॉजी और बाघों के प्राकृतिक हैबिटैट पर बढ़ते दबाव ने एक गंभीर संकट पैदा कर दिया है. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की ताज़ा “2026 State of India's Environment” रिपोर्ट ने दावा किया है कि पर्यावरणीय बदलावों और मानव गतिविधियों के हस्तक्षेप ने बाघों के व्यवहार को प्रभावित किया है. इसके चलते इंसानों पर हमलों की घटनाएं बढ़ रही हैं. रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से जून 2025 के बीच भारत में बाघों ने कम से कम 43 लोगों की हत्या की, जो पिछले साल की समान अवधि (44 मौतें) के लगभग बराबर है. 

राजस्थान के निमली में जारी की गयी रिपोर्ट

रिपोर्ट राजस्थान के निमली में जारी की गई, जिसमें कहा गया है कि बाघों के हैबिटैट लगातार सिकुड़ रहे हैं. जंगलों के आसपास मानव बस्तियों का विस्तार, संरक्षण रणनीतियों में असंतुलन और पारिस्थितिक संरचना में बदलाव बाघों को अपने मूल स्वभाव से अलग व्यवहार करने के लिए मजबूर कर रहे हैं. यही वजह है कि कुछ मामलों में बाघों ने मनुष्यों को केवल हमला ही नहीं किया, बल्कि 2025 में हुए 43 हमलों में से चार में शवों के हिस्से खा भी लिए जो चिंताजनक प्रवृत्ति है.

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विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में बाघों की संख्या बढ़ना एक उपलब्धि है, लेकिन इसके साथ ही कई नई चुनौतियां भी पैदा हुई हैं. रिपोर्ट बताती है कि बाघों की आबादी वाले 20 राज्यों में बाघ आरक्षित क्षेत्रों के लगभग 40% हिस्से में करीब 6 करोड़ लोग रह रहे हैं. ऐसे क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों का दबाव और बाघों के क्षेत्रों में लगातार हस्तक्षेप संघर्ष को बढ़ा रहा है.

टाइगर रिजर्व में बढ़ रही है बाघों की संख्या

CSE की रिपोर्ट यह भी बताती है कि कई टाइगर रिज़र्व अब सैचुरेशन पॉइंट पर पहुंच चुके हैं. इसका मतलब है कि रिज़र्व में बाघों की संख्या अधिक है, और नए क्षेत्र उपलब्ध न होने के कारण बाघ संरक्षित जंगलों से बाहर निकल रहे हैं. बाहर निकलते ही उनकी मुलाकात अक्सर खेतों, बस्तियों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों से हो रही है जहां संघर्ष अपरिहार्य बन जाता है.

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रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि हैबिटैट का सिकुड़ना, मानव दबाव, और असंतुलित संरक्षण नीतियां बाघों में इस व्यवहारिक बदलाव के मुख्य कारण हैं. विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर मानव‑बाघ संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है.

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लेखक के बारे में
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हिमांशु शेखर मिश्रा
Senior Editor, Political & Current Affairs
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