भारतीय राजनीति में दलगत आस्था और विचारधारा को छोड़कर पार्टियां बदलना कोई नई बात नहीं है. कपड़े बदलने की तरह ही नेता पार्टियां बदलते आए हैं। अमूमन चुनाव के समय यह दलबदल व्यक्तिगत तौर पर होता है ताकि जीत की संभावना पक्की की जा सके. लेकिन इतिहास में कई ऐसे मौके भी आए हैं जब बड़े पैमाने पर दलबदल कर सरकारें बनाईं और बिगाड़ी गई हैं.
'आया राम-गया राम' की इसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए दलबदल विरोधी कानून बना, लेकिन इसके बावजूद यह सिलसिला जारी है. फर्क बस इतना आया है कि जहां पहले फुटकर दलबदल होते थे, वहीं अब 'थोक में' दलबदल होने लगा है. आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों के सामूहिक दलबदल की चर्चा के बीच यह मुद्दा फिर सुर्खियों में है. AAP नेता राघव चड्ढा इसे लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बताते हुए सवाल उठा रहे हैं कि क्या दलबदल अब एक संगठित राजनीतिक रणनीति बन चुका है?
आया राम, गया राम: यहीं से शुरू हुई कहानी
1967 में हरियाणा के हसनपुर से विधायक गया लाल ने मात्र 9 घंटों में तीन बार पार्टी बदली. पहले कांग्रेस छोड़ी, फिर यूनाइटेड फ्रंट में गए, वापस कांग्रेस में लौटे और फिर दोबारा यूनाइटेड फ्रंट में चले गए. इस घटना ने भारतीय राजनीति में अस्थिरता के एक नए युग की शुरुआत की. 'आया राम, गया राम' मुहावरा यहीं से पैदा हुआ. 1967 से 1971 के बीच दलबदल के कारण करीब 45 राज्य सरकारें गिरीं, जो इस प्रवृत्ति की गंभीरता को दिखाता है.
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जनता पार्टी का विघटन और केंद्र की सत्ता का संकट
आपातकाल के बाद 1977 में मोरार जी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी. लेकिन अंदरूनी मतभेदों और दलबदल ने इसे तोड़ दिया. चौधरी चरण सिंह 76 से अधिक सांसदों के साथ अलग हो गए और जनता पार्टी (सेक्यूलर) बना ली. इंदिरा गांधी की कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देकर उनकी सरकार बनवा दी, लेकिन बहुमत परीक्षण से ठीक पहले समर्थन वापस ले लिया. नतीजा- सरकार गिर गई और केंद्र की राजनीति हिल गई.
भजनलाल का ‘रातों-रात' दलबदल
1980 में हरियाणा में एक अनोखा घटनाक्रम देखने को मिला. मुख्यमंत्री भजनलाल ने इस्तीफा देने के बजाय अपने पूरे मंत्रिमंडल और 40 विधायकों के साथ कांग्रेस (I) जॉइन कर ली. यानी सरकार बदली नहीं, सीधे पूरी की पूरी सरकार ही दूसरी पार्टी में बदल गई. इस घटना ने राजनीतिक नैतिकता पर बड़ा सवाल खड़ा किया और 1985 में दलबदल विरोधी कानून लाने की राह बनाई.
चंद्रशेखर की बगावत और गिरती सरकार

वीपी सिंह की सरकार भी दलबदल से नहीं बच सकी. चंद्रशेखर 64 सांसदों के साथ अलग हो गए और नई पार्टी बना ली. राजीव गांधी की कांग्रेस ने उन्हें समर्थन देकर प्रधानमंत्री बनवाया, लेकिन महज सात महीने बाद समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गई. इसने दलबदल कानून की खामियों को उजागर किया.
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‘वोट के बदले नोट' और संसद की साख पर सवाल
1993 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया. आरोप लगा कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को पैसे देकर समर्थन हासिल किया गया. सरकार तो बच गई, लेकिन इस कांड ने संसद की साख को गहरी चोट पहुंचाई और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा.

पीवी नरसिम्हा राव और शिबू सोरेन
कानून कड़ा हुआ, लेकिन रास्ते भी निकले
1985 में दलबदल विरोधी कानून लागू हुआ और 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसे और सख्त करते हुए 91वां संशोधन किया. अब 1/3 की जगह 2/3 सदस्यों के टूटने पर ही दलबदल मान्य हुआ. लेकिन राजनीति ने इसके भी रास्ते निकाल लिए, जैसे वोटिंग के दौरान अनुपस्थित रहना.
मनमोहन सरकार और ‘मैनेजमेंट' की राजनीति
2008 में परमाणु करार के मुद्दे पर मनमोहन सरकार अल्पमत में आ गई. विश्वास मत के दौरान विपक्ष के कुछ सांसदों ने व्हिप तोड़ा, तो कुछ गैरहाजिर रहे. नतीजा- सरकार बच गई, लेकिन यह साफ हो गया कि दलबदल अब सिर्फ पार्टी बदलना नहीं, बल्कि वोटिंग मैनेजमेंट का खेल भी बन चुका है.
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राज्यों में ‘थोक दलबदल' का दौर
हाल के वर्षों में दलबदल ने और आक्रामक रूप ले लिया.
2022: एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बगावत, महाराष्ट्र सरकार गिरी.
2020: ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ 22 विधायक अलग हुए, मध्य प्रदेश सरकार गिरी.
2019: कर्नाटक में 17 विधायकों के इस्तीफे से सरकार बदली.
गोवा और अरुणाचल में तो पूरी सरकारें ही पार्टी बदल गईं.
क्या दलबदल अब ‘मॉडल' बन गया है?
भारतीय राजनीति में दलबदल का इतिहास लंबा और विवादित रहा है. 'आया राम-गया राम' से शुरू हुई यह कहानी अब 'थोक दलबदल' तक पहुंच चुकी है. कानून बने, संशोधन हुए, लेकिन राजनीति ने हर बार नए रास्ते खोज लिए. ऐसे में सवाल वही है जो आज फिर उठ रहा है क्या दलबदल पर लगाम लग पाना संभव है, या यह लोकतंत्र की स्थायी सच्चाई बन चुका है?
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