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तमिलनाडु में चौतरफा चुनावी संग्राम: विजय की पार्टी करेगी उलटफेर या सत्ता में होगी DMK, AIADMK की वापसी?

तमिलनाडु में सियासत का सबसे बड़ा मुकाबला शुरू. सत्ता की लड़ाई में डीएमके vs एआईएडीएमके-बीजेपी vs विजय vs एनटीके और बागी चेहरे. क्या स्टालिन दोबारा सत्ता में लौटेंगे या कोई नया चेहरा खेल बदल देगा?

तमिलनाडु में चौतरफा चुनावी संग्राम: विजय की पार्टी करेगी उलटफेर या सत्ता में होगी DMK, AIADMK की वापसी?
  • तमिलनाडु में इस बार चौतरफा चुनावी मुकाबला, कई गठबंधन और बागी नेता मैदान में.
  • DMK vs AIADMK-BJP के बीच सीधी टक्कर, लेकिन विजय और NTK बने गेमचेंजर.
  • जातीय समीकरण, टूटते गठबंधन और नए चेहरे चुनाव को बेहद जटिल बना रहे हैं.
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चेन्नई:

तमिलनाडु की सियासत इस बार पूरी तरह से गरमा चुकी है. विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में चौतरफा मुकाबला देखने को मिल रहा है, जहां बदलते गठबंधन, आपसी टकराव और नए चेहरों की एंट्री ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प और जटिल बना दिया है. इस चुनाव के केंद्र में हैं मुख्यमंत्री एम के स्टालिन की अगुवाई वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम गठबंधन. इस गठबंधन में कांग्रेस समेत एक दर्जन से ज्यादा दल शामिल हैं. 2019, 2021 और 2024 के लगातार तीन चुनाव जीतने के बाद यह गठबंधन अब दूसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रहा है.

डीएमके के साथ कमल हासन और विजयकांत

इस बार डीएमके को नए सहयोगियों का भी साथ मिला है, जिसमें अभिनेता से नेता बने कमल हसन की पार्टी मक्कल निधि मय्यम और दिवंगत विजयकांत की स्थापित देसिया मुरपोक्कू द्रविड़ कषगम शामिल हैं. डीएमके ने चुनाव को 'तमिलनाडु बनाम एनडीए' का रूप देने की कोशिश की है. सरकार अपनी योजनाओं, जैसे महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, मासिक आर्थिक सहायता और कैश ट्रांसफर को बड़ा मुद्दा बना रही है.

स्टालिन का महिलाओं की आर्थिक मदद दोगुना करने का वादा

साथ ही, राज्य की आर्थिक मजबूती का दावा भी कर रही है. वहीं, एम के स्टालिन  ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार दोबारा आती है तो महिलाओं को मिलने वाली आर्थिक मदद को दोगुना कर दिया जाएगा. लेकिन विपक्ष भी पूरी तरह हमलावर है. कानून-व्यवस्था, महिलाओं के खिलाफ अपराध, ड्रग्स का बढ़ता इस्तेमाल और परिवारवाद के आरोप डीएमके सरकार पर लगातार लगाए जा रहे हैं.

जयललिता की पार्टी के लिए करो या मरो वाला चुनाव 

दूसरी तरफ, एआईएडीएमके (ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम) और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन वापसी की कोशिश में जुटा है. इस गठबंधन की कमान ईडापड्डी के पलानीस्वामी यानी ईपीएस के हाथ में है. यह चुनाव उनके लिए करो या मरो की तरह देखा जा रहा है, क्योंकि जे जयललिता के निधन के बाद पार्टी लगातार तीन चुनाव हार चुकी है. एआईएडीएमकी ने बीजेपी के साथ फिर से हाथ मिलाया है और टीटीवी दिनाकरन को भी एनडीए में शामिल कर लिया है, ताकि थेवर समुदाय के वोटों को एकजुट किया जा सके. ओ पनीरसेल्वम इसी समुदाय से आते हैं और राज्य की राजनीति में खास तौर पर एआईएडीएमके के लिए यह एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है.

हालांकि, इस गठबंधन के सामने भी कई चुनौतियां हैं. डीएमडीके का डीएमके के साथ जाना, एस रामादौस और उनके बेटे अंबुमनी रामादौस के बीच खींचतान और वीके शशिकला और ओ पनीरसेलवम को वापस लेने से इनकार, ये सब वोट बैंक को बांट सकते हैं.

विजय बड़ी ताकत बन कर उभरे

इसी बीच एक नई और तीसरी ताकत बनकर उभरे हैं अभिनेता से नेता बने विजय. उनकी पार्टी तमिलगा वेट्टेरी कषगम पहली बार चुनाव लड़ रही है.
विजय खुद को डीएमके और एआईएडीएमके दोनों का विकल्प बताने की कोशिश कर रहे हैं. उनके पास युवाओं और महिलाओं का बड़ा समर्थन बताया जा रहा है. उन्होंने डीएमके पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोप लगाए हैं, वहीं बीजेपी को वैचारिक विरोधी बताया है.

हालांकि, उनकी पार्टी के सामने भी चुनौतियां हैं. मजबूत गठबंधन का अभाव और करूर रैली में हुई भगदड़ जैसी घटनाओं ने उनके संगठन और नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े किए हैं. इतिहास गवाह है कि शिवाजी गणेशन और विजयकांत जैसे बड़े सितारे भी लोकप्रियता को सत्ता में नहीं बदल पाए, जबकि रजनीकांत ने राजनीति में आने से ही किनारा कर लिया था.

चौथी ताकत तमिलर काची

चौथी ताकत के तौर पर नाम तमिलर काची भी मैदान में है, जिसका नेतृत्व सीमान कर रहे हैं. यह पार्टी लगातार अकेले चुनाव लड़ती रही है और करीब 8.5% वोट शेयर बनाए रखती है. हालांकि, इस बार इसके कुछ वोट विजय की ओर शिफ्ट होने की चर्चा है, जिसे पार्टी खारिज करती है.

इस पूरे चुनावी समीकरण को और उलझा दिया है एक नए राजनीतिक मोड़ ने. वीके शशिकला और एस रामादौस के बीच बनती समझदारी ने कई नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. ये दोनों ईडापड्डी के पलानीस्वामी, टीटीवी दिनाकरन और अंबुमनी रामादौस जैसे नेताओं को गद्दार मानते हुए उनके वोट बैंक को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

कुल मिलाकर, तमिलनाडु इस बार ऐसे चुनावी रण में उतर चुका है जहां कई ताकतें, टूटते समीकरण और नए नैरेटिव एक साथ टकरा रहे हैं. यह चुनाव न सिर्फ राज्य की राजनीति का भविष्य तय करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि क्या पारंपरिक द्रविड़ राजनीति का दबदबा बरकरार रहेगा या कोई नई ताकत उभरकर सामने आएगी.

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