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'लड़के फिर शादी ही क्यों करते हैं?', दहेज उत्पीड़न को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज के नाम पर लड़का पक्ष लड़की और उसके परिवार पर दबाव बनाते हैं. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि उनकी कोशिश यही होती है कि दुल्हन और उसके परिवार को निचोड़ दिया जाए.

'लड़के फिर शादी ही क्यों करते हैं?', दहेज उत्पीड़न को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
  • सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना और दुल्हन एवं उसके परिवार का अपमान तुरंत बंद करने की अपील की
  • जस्टिस नागरत्ना ने दहेज की मांग और आर्थिक दबाव के कारण दुल्हन परिवार को अपमानित करने की कड़ी निंदा की
  • सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए पति के छोटे भाई की सजा चुनौती खारिज कर दी
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना मामले पर शुक्रवार को कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि समाज में दुल्हन और उसके परिवार का अपमान बंद होना चाहिए. लड़के शादी क्यों करते हैं और फिर लड़की और उसके परिवार का अपमान क्यों करते हैं? जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच छत्तीसगढ़ के उस मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें शादी के तीन साल के भीतर एक महिला ने अपने ससुराल में फांसी लगाकर जान दे दी थी. आरोप था कि पति और उसके परिवार की ओर से लगातार दहेज की मांग और मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा था.

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि लड़के शादी क्यों करते हैं और फिर लड़की और उसके परिवार का अपमान क्यों करते हैं? एक संदेश जाना चाहिए कि वे दुल्हन और उसके परिवार का अपमान जारी नहीं रख सकते. कोर्ट ने कहा कि दहेज के नाम पर लड़की और उसके परिवार पर आर्थिक दबाव बनाया जाता है. जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी में कहा कि उनकी कोशिश यही होती है कि दुल्हन और उसके परिवार को निचोड़ा जाए.

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उन्होंने रिकॉर्ड में मौजूद आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि लड़की के परिवार को “भिखारी” कहा गया, जबकि वे अपनी बेटी को बचाने की कोशिश कर रहे थे.

मामले में ट्रायल कोर्ट और बाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति के परिवार के कई सदस्यों को IPC की धारा 304B (दहेज मृत्यु), 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 498A (क्रूरता और प्रताड़ना) के तहत दोषी ठहराया था.

सुप्रीम कोर्ट में पति के छोटे भाई ने केवल धारा 498A के तहत अपनी सजा को चुनौती दी थी, लेकिन कोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि आपको खुश होना चाहिए कि केवल 498A लगी है और सिर्फ तीन साल की सजा है.

कोर्ट ने FIR दर्ज होने में देरी की दलील भी खारिज कर दी और कहा संदेश जाना चाहिए कि  दुल्हनों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है. जस्टिस उज्जल भुइयां ने भी टिप्पणी की कि ये पढ़े-लिखे लोग हैं. अंत में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा.

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आशीष भार्गव
Senior Editor – Legal News
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