- SC ने कहा भूमि अधिग्रहण में क्षतिपूर्ति के संवैधानिक अधिकार को वित्तीय बोझ के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता
- अदालत ने NHAI की याचिका पर सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की है
- शीर्ष अदालत ने कहा कि अपने आदेश में तीन अहम स्पष्टीकरण भी दिए
सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अहम सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है. चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि सिर्फ वित्तीय बोझ का हवाला देकर भूमि अधिग्रहण में उचित क्षतिपूर्ति के संवैधानिक अधिकार को कम नहीं किया जा सकता है. शीर्ष अदालत ने कहा कि सिर्फ आर्थिक बोझ के आधार पर उचित मुआवजा नहीं छीना जा सकता है.
पीठ ने NHAI की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने 2019 के फैसले को केवल भविष्य में लागू करने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि मुआवजा और ब्याज का भुगतान वित्तीय बोझ की मात्रा पर निर्भर नहीं हो सकता. अदालत ने कहा कि उचित मुआवजे की संवैधानिक गारंटी को इस आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता. केवल संभावित वित्तीय देनदारी दिखाना समीक्षा का वैध आधार नहीं है.
NHAI ने अदालत से कहा था कि अगर 2019 के फैसले को पुराने मामलों पर भी लागू किया गया तो सरकार पर करीब 29,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा. इसलिए इसे केवल भविष्य के मामलों पर लागू किया जाए. हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले से अंतिम रूप ले चुके मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा.
अदालत ने तीन अहम स्पष्टीकरण दिए
- 28 मार्च 2015 तक लंबित मामले
- जिन भूमि मालिकों के क्षतिपूर्ति के दावे 28 मार्च 2015 (जब नया भूमि अधिग्रहण कानून प्रभावी हुआ) तक लंबित थे, उन्हें मुआवजा और ब्याज का लाभ मिलेगा.
- जहां मुआवजा बढ़ा लेकिन क्षतिपूर्ति का मुद्दा तय नहीं हुआ, ऐसे मामलों में भूमि मालिक कानून के अनुसार क्षतिपूर्ति और ब्याज की मांग कर सकते हैं. हालांकि ब्याज केवल उस तारीख से मिलेगा जब दावा उठाया गया
2015 से पहले अंतिम हो चुके मामले
जिन मामलों में 28 मार्च 2015 से पहले मुआवजा अंतिम रूप ले चुका था और कोई कार्यवाही लंबित नहीं थी, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा. 2019 में एक मामले में अदालत ने कहा था कि जमीन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के लिए ली गई है, जमीन मालिकों को 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत क्षतिपूर्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है.
बाद में NHAI ने अदालत से कहा कि यह फैसला केवल भविष्य में लागू किया जाए. 4 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने यह मांग भी खारिज कर दी थी. उसके खिलाफ दायर रिव्यू पिटीशन पर बुधवार को यह फैसला आया. इस मामले में NHAI और केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए.
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