नई दिल्ली: बुजुर्गों के अधिकारों के संरक्षण से जुड़ी जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से कहा है कि वे सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एडवोकेट जनरल/स्टैंडिंग काउंसिल को पत्र लिखकर इस संबंध में ताजा स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को कहें. कोर्ट के आदेश के मुताबिक, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अटॉर्नी जनरल का पत्र प्राप्त होने की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर वृद्धाश्रमों की स्थापना और वहां उपलब्ध सुविधाओं से संबंधित विस्तृत जानकारी देनी होगी.
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्य कांत की बेंच ने केस की लंबे समय से सुनवाई ना होने पर चिंता जताई. याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बुजुर्गों के अधिकारों को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की गई है. याचिका में बुजुर्गों के लिए पेंशन, आश्रय, जेरियाट्रिक देखभाल और चिकित्सा सुविधाओं के अलावा माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम (MWP Act) के प्रभावी क्रियान्वयन का मुद्दा उठाया गया है. याचिकाकर्ता डॉ. अश्विनी कुमार ने स्वयं पेश होकर कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार को तीन प्रमुख मुद्दों पर स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी थी कि देश में कितने वृद्धाश्रम हैं, बुजुर्गों को कितनी पेंशन दी जा रही है और उनके लिए चिकित्सा सुविधाओं की क्या स्थिति है. उन्होंने कहा कि कोर्ट ने इस मामले में लगातार निगरानी का आदेश दिया था.
'करोड़ों लोगों से जुड़ा है मामला'
डॉ. कुमार ने कहा कि यह करोड़ों लोगों से जुड़ा मामला है. छह-सात साल से इस पर सुनवाई नहीं हुई है. इस मामले को प्राथमिकता देने के लिए कुछ किया जाना चाहिए. मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि 2022 के बाद यह मामला सूचीबद्ध क्यों नहीं हुआ, इसकी जानकारी नहीं है. डॉ. कुमार ने बताया कि उन्होंने 2022 के बाद खुद पांच बार मामले का उल्लेख किया. अगस्त 2023 में केंद्र ने एक हलफनामा दाखिल किया था, जिसमें 15 राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों का विवरण दिया गया था, हालांकि, उनके अनुसार केंद्र ने अब तक पूरी जानकारी वाला अद्यतन हलफनामा दाखिल नहीं किया है. उन्होंने केंद्र को इसे दाखिल करने के लिए दो-तीन सप्ताह का समय देने का आग्रह किया. सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश वकील ने सुझाव दिया कि मामले को संबंधित हाईकोर्टों के पास भेजा जा सकता है.
'मामले को हाईकोर्टों पर नहीं छोड़ा जा सकता'
इस पर डॉ. कुमार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को अपने ही आदेश को लागू कराना है और यह कहना उचित नहीं होगा कि मामला हाईकोर्टों को भेज दिया जाए. उन्होंने कहा कि बुजुर्गों के अधिकारों से जुड़ा यह मुद्दा पूरे देश के लिए समान निर्णय की मांग करता है और इसे अलग-अलग हाईकोर्टों पर नहीं छोड़ा जा सकता. CJI ने इस पर टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में पहले सिद्धांत तय करने चाहिए थे और उनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी हाईकोर्टों पर छोड़ी जानी चाहिए थी.
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