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15 लाख मुआवजे के साथ ससम्मान विदाई दो, जबरन रिटायर किए गए अफसर के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

प्रमोशन के कुछ महीनों बाद ही बेकार बता एक अधिकारी को सरकार ने जबरन रिटायर कर दिया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के फैसले को पलट दिया है. अदालतन ने सरकार को 15 लाख मुआवजे के साथ अधिकारी को प्राइड फेयरवेल का आदेश दिया.

15 लाख मुआवजे के साथ ससम्मान विदाई दो, जबरन रिटायर किए गए अफसर के हक में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट.
नई दिल्ली:

सरकारी नौकरी मिलते ही लोग भविष्य की चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं. यह कहा जाता है कि अब कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन सरकारी नौकरी में जबरन रिटायर करने का रिवाज है. अब एक ऐसे ही मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ा फैसला आया है, जो दूसरे केसों के लिए नजीर बन सकता है. मामला भारतीय व्यापार सेवा के अधिकारी एस.एस. दास से जुड़ा है. जिन्हें 2018 में प्रमोशन के कुछ ही महीनों बाद बेकार बता जबरन रिटायर कर दिया गया था. तब उनकी 5 साल की नौकरी बची हुई थी. एस.एस. दास ने इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. सुनवाई के बाद सर्वोच्च अदालत ने एस.एस. दास के पक्ष में फैसला सुनाया. 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 15 लाख मुआवजा के साथ-साथ फेयरवेल भी दें

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय व्यापार सेवा के अधिकारी एस.एस. दास को उनकी सेवानिवृत्ति से करीब पांच साल पहले ‘डेडवुड' बता अनिवार्य रूप से रिटायर करने के केंद्र सरकार के फैसले को रद्द कर दिया है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने अधिकारी को सभी सेवा और वित्तीय लाभ देने के साथ-साथ सम्मानजनक फेयरवेल देने का भी निर्देश दिया है. कोर्ट ने केंद्र सरकार को अधिकारी को हुई क्षति के लिए 15 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया.

जबरिया रिटायरमेंट से पहले संयुक्त सचिव के पद पर प्रमोट हुए थे एस.एस. दास

एस.एस. दास को 2018 में FR 56(j) के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी. कोर्ट ने पाया कि उनका सेवा रिकॉर्ड लगातार शानदार रहा था और उन्हें कई मौकों पर ‘आउटस्टेंडिंग' और ‘वेरी गुड' ग्रेडिंग मिली थी. इतना ही नहीं, अनिवार्य सेवानिवृत्ति से कुछ ही समय पहले उन्हें संयुक्त सचिव स्तर पर पदोन्नति भी दी गई थी.

प्रमोशन के कुछ महीने बाद बताया गया था बेकार

सुप्रीम कोर्ट ने इस विरोधाभास को गंभीरता से लिया. पीठ ने कहा कि जिस अधिकारी को हाल ही में उच्च पद पर पदोन्नति के योग्य माना गया हो, उसे कुछ ही समय बाद ‘डेडवुड' बताकर सेवा से बाहर करने के फैसले को ठोस और विश्वसनीय सामग्री से समर्थित होना चाहिए. कोर्ट ने माना कि FR 56(j) के तहत सरकार को किसी कर्मचारी को जनहित में समय से पहले सेवानिवृत्त करने की शक्ति है, लेकिन इसका इस्तेमाल मनमाने तरीके से या किसी कर्मचारी को हटाने के शॉर्टकट के तौर पर नहीं किया जा सकता. 

सम्मानजनक विदाई का भी आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारी को केवल वित्तीय लाभ देने तक मामला सीमित नहीं रखा. पीठ ने कहा कि लंबे समय तक सरकारी सेवा देने वाले अधिकारी को जिस तरह से ‘डेडवुड' बताकर अचानक सेवा से बाहर किया गया, उससे उसकी प्रतिष्ठा और गरिमा को भी नुकसान पहुंचा. इसी को देखते हुए कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को वह सम्मानजनक विदाई देने का निर्देश दिया, जिसके वे हकदार होते यदि उन्हें सामान्य तरीके से सेवानिवृत्त होने दिया जाता.

15 लाख रुपये मुआवजा और नोशनल पदोन्नति

पीठ ने केंद्र को अधिकारी के सेवा संबंधी सभी परिणामी लाभ बहाल करने और उन्हें उन नोशनल पदोन्नतियों का लाभ देने का निर्देश दिया, जो उन्हें सेवा में बने रहने पर मिल सकती थीं. इसके अलावा कोर्ट ने 15 लाख रुपये का मुआवजा भी देने का आदेश दिया. 
 

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