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मैरिटल रेप केस: SC बोला- जबरन यौन संबंध झेलने वाली महिला पीड़ित, सरकार ने किया विरोध

इस ममाले पर कोर्ट ने कहा कि विवाह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अंत नहीं कर सकता. हालांकि अदालत ने यह भी माना कि मौजूदा कानून में वैवाहिक बलात्कार से जुड़ा अपवाद मौजूद है. 

मैरिटल रेप केस: SC बोला- जबरन यौन संबंध झेलने वाली महिला पीड़ित, सरकार ने किया विरोध
सुप्रीम कोर्ट में मेरिटल रेप को अपराध बनाने की मांग उठ रही है.

सुप्रीम कोर्ट में वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में लाने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई. वहीं वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने की मांग पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी होने का मतलब यह नहीं है कि महिला की इच्छा और अधिकार खत्म हो जाएं. कोर्ट ने माना कि महिला की मर्जी के खिलाफ बनाए गए यौन संबंध उसे पीड़ित बनाते हैं. हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि मौजूदा कानून और संविधान के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए इस मामले पर फैसला किया जाएगा. मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी.

संविधान को अलग-अलग हिस्सों में नहीं देख सकते

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान को अलग-अलग हिस्सों में देखकर नहीं समझा जा सकता. अदालत के मुताबिक जब अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की बात होती है तो उसका असर अनुच्छेद 20 के तहत मिलने वाले कानूनी संरक्षण पर भी पड़ता है. कोर्ट ने संकेत दिया कि इस मामले में दोनों संवैधानिक प्रावधानों के प्रभावों को साथ लेकर विचार करना होगा.

केंद्र ने किया विरोध

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा है कि यदि वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाया जाना है तो यह विधायिका और कार्यपालिका का नीतिगत क्षेत्र है. वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील करुणा नंदी ने दलील दी कि विवाह के आधार पर पति को पत्नी की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाने के लिए आपराधिक जिम्मेदारी से छूट नहीं दी जा सकती.

विवाह से व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म नहीं हो सकती

पीठ ने कहा कि विवाह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता का अंत नहीं कर सकता. हालांकि अदालत ने यह भी माना कि मौजूदा कानून में वैवाहिक बलात्कार से जुड़ा अपवाद मौजूद है. ऐसे में यह देखना जरूरी होगा कि इस अपवाद के रहते हुए विवाह के भीतर बलात्कार के मामलों में अभियोजन किस प्रकार संभव हो सकता है.

अदालत के सामने सबसे बड़ा कानूनी सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाया. अदालत ने पूछा कि यदि संसद ने किसी विशेष कृत्य को स्पष्ट रूप से बलात्कार के अपराध से बाहर रखा है तो क्या अदालत केवल कानून की व्याख्या के जरिए उस कृत्य को फिर से उसी अपराध की श्रेणी में ला सकती है. पीठ इस पहलू को अनुच्छेद 20(1) के संदर्भ में भी देखेगी. यह अनुच्छेद किसी व्यक्ति को ऐसे कृत्य के लिए दोषी ठहराए जाने से संरक्षण देता है जो उस समय कानून के तहत अपराध नहीं था.

आपराधिक मंशा और जिम्मेदारी पर भी विचार

कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानूनों की जांच करते समय Mens Rea (अपराधिक मंशा/दुराशय) और 'Culpability' (अपराधिक जवाबदेही/दोषिता) यानी आपराधिक जिम्मेदारी जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा. साथ ही संविधान की ऐसी व्याख्या नहीं होनी चाहिए जिससे नागरिकों के सामने अप्रत्याशित कानूनी स्थिति पैदा हो जाए.

दो अहम सवालों पर होगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले में दो अलग-अलग कानूनी सवालों पर विचार करेगा. पहला, यदि वैवाहिक बलात्कार से जुड़ा अपवाद कानून में बना रहता है तो क्या इसके बावजूद किसी पति के खिलाफ बलात्कार का अभियोजन चलाया जा सकता है. दूसरा, क्या वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखने वाला मौजूदा कानूनी अपवाद संविधान के अनुरूप है या नहीं.

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