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घोर गरीबी में जी रहे जन्म से नेत्रहीन बेटे और उनकी मां पर सुप्रीम कोर्ट का ओडिशा सरकार से जवाब तलब

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, बेहद गरीबी में रह रहे जन्म से नेत्रहीन बेटे और उनकी मां को लेकर ओडिशा सरकार से जवाब मांगा. साथ ही मां-बेटे को फौरन राहत पहुंचाने और उससे जुड़ी सभी जानकारी सुप्रीम कोर्ट को देने का आदेश भी दिया. पढ़ें क्या है पूरा मामला...

घोर गरीबी में जी रहे जन्म से नेत्रहीन बेटे और उनकी मां पर सुप्रीम कोर्ट का ओडिशा सरकार से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट
ANI
  • एक नेत्रहीन बेटे और उनकी मां की घोर गरीबी पर SC ने स्वतः संज्ञान लेते हुए ओडिशा सरकार से जवाब तलब किया है.
  • सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि उन्हें किन-किन सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है?
  • SC ने इस परिवार से मिलने और बातचीत करने का आदेश दिया, साथ ही आगे इसपर विचार के लिए 13 जुलाई की तारीख तय की है.

जन्म से दृष्टिहीन एक व्यक्ति और उसकी 80 वर्षीय मां की गरीबी व बदहाल जीवन-स्थितियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए ओडिशा सरकार को नोटिस जारी किया है. अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि जब तक मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक मां-बेटे को सभी जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने 'अत्यंत गरीबी में जीवन गुजार रहे दिव्यांग नागरिकों की मानवीय गरिमा और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने' से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया.

मामले के केंद्र में ओडिशा के रहने वाले जन्म से दृष्टिहीन जापा भुए और उनकी बुजुर्ग मां राधिका भुए हैं. सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि राधिका भुए को आवास योजना के तहत घर आवंटित किया जा चुका है. साथ ही जापा भुए के दो भाइयों को भी अलग-अलग आवास दिए गए हैं.

सरकार ने यह भी जानकारी दी कि राधिका भुए को हर महीने 3,500 रुपये वृद्धावस्था पेंशन मिलती है, जबकि जापा भुए को समान राशि दिव्यांग पेंशन के रूप में दी जा रही है. इसके अलावा उन्हें सरकारी योजना के तहत मुफ्त चावल भी उपलब्ध कराया जा रहा है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसका मुख्य सरोकार सिर्फ योजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जन्म से दृष्टिहीन जापा भुए और उनकी वृद्ध मां वास्तव में सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन जी पा रहे हैं या नहीं.

पेंशन और अन्य लाभों का पूरा हिसाब मांगा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने ओडिशा सरकार को निर्देश दिया कि अतिरिक्त मुख्य सचिव से नीचे के वरिष्ठ अधिकारी के माध्यम से एक शपथपत्र दाखिल कर बताए कि क्या मां और बेटे को मिलने वाली पेंशन की सभी बकाया राशि और सामाजिक सुरक्षा के अन्य लाभ जारी कर दिए गए हैं.

चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने ओडिशा राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण को भी निर्देश दिया कि वह तुरंत परिवार से मिले और उनकी स्थिति का आकलन करे. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के मेंबर सेक्रेटरी अरबिंदो पटनायक की मौजूदगी दर्ज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि संबंधित जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण के सेक्रेटरी दिन के दौरान परिवार से मिलें और उनसे बातचीत करें.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसकी मुख्य चिंता 'जापा भुए (जो जन्म से नेत्रहीन हैं) और उनकी 80 वर्षीय मां श्रीमती राधिका भुए के भरण-पोषण और सम्मानजनक जीवन' को लेकर है.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा कि दृष्टिबाधित व्यक्ति के रूप में जापा भुए किन-किन सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के हकदार हैं और क्या उन्हें उन सभी योजनाओं का लाभ मिल रहा है.

पीठ ने कहा कि यह जानना आवश्यक है कि सामाजिक कल्याण योजनाओं के तहत जापा भुए को और कौन-कौन से अधिकार प्राप्त हैं तथा क्या वे वास्तव में उन सुविधाओं तक पहुंच पा रहे हैं.

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राधिका भुए या उनके दृष्टिहीन बेटे को तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत हो तो जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और मुख्य चिकित्सा अधिकारी मिलकर जरूरी व्यवस्था करें.

अलग घर मिलने का भी बनता है अधिकार?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि जापा भुए स्वयं एक अलग आवास इकाई पाने के हकदार हो सकते हैं. इसलिए राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण इस पहलू की विशेष रूप से जांच करे.

यदि जांच में यह पाया जाता है कि जापा भुए किसी सरकारी आवास योजना के तहत अलग घर पाने के पात्र हैं, तो राज्य सरकार से उचित राहत देने की सिफारिश की जाए.

दिव्यांगों के अधिकारों के लिए करेंगे जागरूकता अभियान

मामले में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जापा भुए को पैरा-लीगल वॉलंटियर के रूप में नियुक्त करने का निर्देश दिया. अदालत ने कहा कि वे अन्य दिव्यांग लोगों को उनके अधिकारों और केंद्र तथा राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जागरूक करने का काम करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस जिम्मेदारी के लिए उन्हें नियमित मानदेय दिया जाएगा और यह राशि ओडिशा सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं होनी चाहिए.

मानवीय गरिमा पर सुप्रीम कोर्ट का जोर

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख केवल कानूनी अधिकारों तक सीमित नहीं दिखा, बल्कि उसने मानवीय गरिमा को केंद्र में रखा. अदालत ने कहा कि किसी भी कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि समाज के सबसे कमजोर और असहाय लोग उन योजनाओं का वास्तविक लाभ प्राप्त कर सकें.

अब इस मामले पर आगे विचार के लिए 13 जुलाई की तारीख तय की गई है. तब तक ओडिशा सरकार को मां-बेटे की स्थिति, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा लाभों और आवास संबंधी सुविधाओं पर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करनी होगी.

लेखक के बारे में
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अभिजीत श्रीवास्तव
Assistant Editor, Digital Content
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