सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों का एक संविधान पीठ सबरीमाला मामले में अपने फैसले पर आईं पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्धांत (Essential Religious Practice Doctrine), जो सबरीमाला पुनर्विचार मामलों से जुड़ा है, पर सुनवाई कर रहा था. इस दौरान अदालत ने उर्दू के मशहूर शायर मिर्जा गालिब का एक शेर सुनाया. अदालत ने कहा कि धर्म से जुड़ी ज्यादातर उलझनें इंसान ही पैदा करता है.
जस्टिस प्रसन्ना बी वराले इस पीठ का हिस्सा हैं. उन्होंने आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्धांत के इस्लाम में लागू होने पर चल रही बहस के दौरान हल्के-फुल्के अंदाज़ में ग़ालिब का यह शेर सुनाया, ''न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता.'' इसके बाद उन्होंने कहा कि धार्मिक परंपराओं से जुड़ी कई जटिलताएँ दरअसल हमारी अपनी बनाई हुई उलझनें हैं.उन्होंने यह टिप्पणी उस समय की जब पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं के वकीलों में से एक निजाम पाशा दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन दरगाह के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश का विरोध कर रहे थे. न्यायमूर्ति वराले ने स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध के खिलाफ दिए जा रहे पाशा के तर्कों का जवाब देते हुए भी ग़ालिब के इस शेर का ही सहारा लिया.
सुप्रीम कोर्ट में हिजाब पर बहस
पाशा ने दलील दी कि आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्धांत, जिसका इस्तेमाल अदालतें आमतौर पर यह तय करने में करती हैं कि कौन-सी धार्मिक प्रथा को संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए, उसे इस्लाम पर लागू नहीं किया जा सकता. उन्होंने यह भी कहा कि हिजाब पहनने जैसे मुद्दों को स्कूल के अनुशासन का मामला बनाकर आवश्यक धार्मिक प्रथा सिद्धांत के आधार पर आंकना गलत है.
पाशा की दलील थी कि कुरान एक बहुत संक्षिप्त (मिनिमल) ग्रंथ है. उनके मुताबिक,''इसमें यह नहीं बताया गया है कि किसी व्यक्ति को नमाज़ कैसे पढ़नी है या कितनी बार पढ़नी है. यह पैगंबर के जीवनकाल में लिखी भी नहीं गई थी… कुरान एक ढांचा (Skeleton) है, जबकि पैगंबर की परंपराएं धर्म का असली रूप (flesh and blood) हैं.''

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने यह साफ किया कि मौजूदा मामले में हिजाब का मुद्दा विचाराधीन नहीं है.
इसके बाद जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने कहा कि ये सारी जटिलताएं इंसानों की ओर से पैदा की गई हैं. उन्होंने मिर्जा गालिब का मशहूर शेर दोहराया-
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता
क्या है पूरा मामला: सबरीमला से निजामुद्दीन तक
यह मामला सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से 2018 में सुनाए गए फैसले से जुड़ा है. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत दी थी. इस फैसले के बाद कानून की एक छात्रा ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की. उनका कहना था कि उन्हें हजरत निजामुद्दीन दरगाह के उसे गर्भगृह में जाने से रोका गया था. उन्होंने इसे अपने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था, जैसा कि सबरीमला मामले में मान्यता दी गई थी.उन्होंने अपनी याचिका में मांग की थी कि दरगाह के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक घोषित किया जाए.
मुख्य सवाल यह है कि क्या गैर मानने वाले (Non-believers) भी धार्मिक प्रथाओं को चुनौती दे सकते हैं?
वकील निजाम पाशा ने अदालत से कहा कि यह मामला एक अहम संवैधानिक सवाल उठाता है, क्या कोई पूरी तरह बाहरी व्यक्ति या उस धर्म में आस्था न रखने वाला व्यक्ति किसी पूजा स्थल में जाकर वहां की स्थापित धार्मिक परंपराओं को अपने व्यक्तिगत अधिकारों के अनुसार बदलने की मांग कर सकता है? उन्होंने इसे ऐसा उदाहरण बताया, जहां अदालतों से बहुत गहरे धार्मिक विश्वास से जुड़े मुद्दों पर फैसला करने को कहा जा रहा है.
क्या होती है दरगाह
धार्मिक संदर्भ समझाते हुए पाशा ने कहा कि दरगाह किसी सूफी संत की कब्र होती है. सूफी परंपरा में इसका बहुत अधिक आध्यात्मिक महत्व होता है. उन्होंने कहा कि चिश्तिया संप्रदाय, जिससे हजरत निजामुद्दीन औलिया जुड़े हैं, उसे संविधान के तहत एक अलग धार्मिक संप्रदाय माना जाता है. उन्होंने यह भी कहा कि इस परंपरा में नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज जैसी इस्लामी प्रथाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं.उन्होंने कहा कि दरगाहों में सभी लोगों को आने देने से उनकी अलग धार्मिक पहचान कमजोर होती है. अपने इस तर्क के जवाब में पाशा ने अदालती फैसलों का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि अगर किसी धार्मिक स्थल पर दूसरे लोग भी आते हैं, तो इससे उसकी अलग धार्मिक पहचान खत्म नहीं हो जाती है.
प्रवेश का अधिकार और संवैधानिक संतुलन
वकील नाजिम पाशा ने कहा कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संतुलन से जुड़ा है. ये दोनों अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक समूहों को अपने मामलों को खुद संचालित करने का अधिकार देते हैं. उन्होंने समझाया कि अनुच्छेद 25 व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 26(बी) किसी धार्मिक समुदाय (Denomination) को अपने आंतरिक मामलों, जैसे कि प्रवेश के नियम तय करने का अधिकार देता है. उन्होंने यह भी माना कि अनुच्छेद 25(2)(b), जिसे अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) के साथ पढ़ा जाता है, सरकार को यह अधिकार देता है कि वह ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को पूजा स्थलों में प्रवेश दिलाने के लिए हस्तक्षेप कर सके.
नियम ज़रूरी हैं, लेकिन असीमित नहीं
इन दलीलों पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह पर कहा कि धार्मिक संस्थानों में व्यवस्था और नियम होना जरूरी है. उन्होंने कहा,''प्रबंधन के अधिकार का यह मतलब नहीं है कि कोई नियम ही न हों.'' उनके अनुसार, हर पूजा स्थल चाहे मंदिर हों या दरगाह, वहां पूजा-पद्धति, प्रवेश और प्रशासन को लेकर कुछ नियम होने चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि अव्यवस्था से बचने के लिए नियम जरूरी हैं, लेकिन ये नियम संविधान की सीमाओं के अंदर होने चाहिए और इनके नाम पर भेदभाव नहीं किया जा सकता.उन्होंने कहा,''हर संस्था के अपने नियम होते हैं, लेकिन ये नियम कोई भी व्यक्ति अपने हिसाब से तय नहीं कर सकता. इसके लिए एक मान्यता प्राप्त संस्था होनी चाहिए. यही बात संविधान भी सुरक्षित करता है.''
वो संवैधानिक सवाल, जो अभी बाकी हैं
नौ जजों का पीठ फिलहाल सबरीमाला पर आए फैसले से जुड़े बड़े सवालों पर विचार कर रहा है. इसमें यह देखा जा रहा है कि अदालतें धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा कितनी कर सकती हैं और अनुच्छेद 25 और 26 के तहत व्यक्तिगत अधिकारों और धार्मिक समूहों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. सुनवाई आगे भी जारी रहेगी, जहां अदालत आस्था, समानता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगी.
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