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'सेकेंड क्लास यात्री' क्या होता है? SC बोला- खर्च से तय नहीं होनी चाहिए यात्री की क्लास; HC का निर्णय पलटा

Supreme Court: रेलवे में सुधारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है. जिसमें कोचों में सुधार की बात कही गई है. सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे में 'सेकंड क्लास यात्री' शब्द पर भी आपत्ति जताई है.

'सेकेंड क्लास यात्री' क्या होता है? SC बोला- खर्च से तय नहीं होनी चाहिए यात्री की क्लास; HC का निर्णय पलटा
रेलवे सुधारों पर सु्प्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
  • सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे में द्वितीय श्रेणी यात्री शब्द के उपयोग को संविधान की भावना के विपरीत करार दिया है
  • अदालत ने निर्देश दिया कि यात्रियों की श्रेणी उनके खर्च से नहीं बल्कि कोच के आधार पर निर्धारित होनी चाहिए
  • सुरक्षा और सुविधा सुधार के लिए कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि आवश्यक और रोजगार के अवसर बढ़ाने की जरूरत
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे में सुधारों और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर अहम फैसला सुनाया है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने रेलवे के दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाले 'सेकंड क्लास पैसेंजर' यानि द्वितीय श्रेणी यात्री शब्द पर कड़ी आपत्ति जताई है. सर्वोच्च न्यायालय ने  स्पष्ट किया कि भारत के इतिहास में वर्ग विभाजन की पृष्ठभूमि को देखते हुए, किसी व्यक्ति को इस तरह संबोधित करना संविधान की मूल भावना के विपरीत है. अदालत ने निर्देश दिया कि यात्री की श्रेणी उसके द्वारा किए गए खर्च से नहीं, बल्कि उस कोच से तय होनी चाहिए जिसमें वह सफर कर रहा है. इसलिए भविष्य में श्रेणी का उल्लेख यात्री के बजाय केवल कोच या डिब्बे के संदर्भ में ही किया जाना चाहिए. 

रेलवे में कर्मचारियों की जरूरत

जस्टिस करोल द्वारा लिखे फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे सुरक्षा व्यवस्था और यात्रियों की सुविधा से जुड़े मुद्दों पर टिप्पणी करते हुए कहा 'रेलवे मैनुअल के कई प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए अधिक कर्मचारियों की जरुरत है. पीठ ने कहा कि रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या में काफी वृद्धि करनी होगी. देश में आधुनिकीकरण के दौर में रेलवे में युवाओं को रोजगार देने से न केवल उन्हें स्थायी आजीविका मिलेगी, बल्कि इससे यात्रियों की जान बचाने में भी मदद मिलेगी. अदालत ने कहा कि भारत के इतिहास में वर्ग विभाजन की पृष्ठभूमि को देखते हुए किसी व्यक्ति को “सेकंड क्लास यात्री” कहना संविधान की भावना के विपरीत प्रतीत होता है. इसलिए बेहतर होगा कि श्रेणी का उल्लेख यात्री के बजाय कोच या डिब्बे के संदर्भ में किया जाए. 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पलटा

इसी के साथ रेल से गिरने से मौत होने पर यात्री की पत्नी को राहत देते हुए रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया है. अदालत ने कहा कि केवल मृतक के पास से यात्रा टिकट नहीं मिलने के आधार पर उसे गैर-टिकट यात्री नहीं माना जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृतक की पत्नी ने अपने हलफनामे में स्पष्ट रूप से बताया था कि उनके पति के पास वैध रेलवे टिकट था, लेकिन दुर्घटना के दौरान उनका बैग गुम हो गया, जिसमें टिकट रखा हुआ था. अदालत ने कहा कि इस बात का कोई विवाद नहीं है कि मृतक ट्रेन में यात्रा कर रहे थे और उनकी मौत रेलवे की अप्रिय घटना के कारण हुई. याचिकाकर्ता पत्नी के लिए लीगल एड से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड श्वेता प्रियदर्शिनी पेश हुईं थीं.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पहले के न्यायिक फैसलों के अनुसार, मृत यात्री के पास से टिकट बरामद न होना अपने आप में उसे वैध यात्री के दर्जे से वंचित नहीं करता. दावे की प्रारंभिक पुष्टि के लिए पत्नी का हलफनामा पर्याप्त है. सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे मैनुअल का भी उल्लेख करते हुए कहा कि यदि टिकट जांच की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया होता, तो यह रिकॉर्ड उपलब्ध होता कि यात्री का टिकट जांचा गया था और विवाद की स्थिति पैदा नहीं होती.' सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी को 8 लाख रुपए का मुआवजा देने के निर्देश दिए हैं वो भी ब्याज के साथ. 

क्या था एमपी से जुड़ा मामला 

ये मामला 28 नवंबर 2015 का है. मृतक चंद्रकांत ठक्कर रायपुर से अहमदाबाद जाने के लिए ट्रेन संख्या 12834 अहमदाबाद-हावड़ा मेल में यात्रा कर रहे थे. तेगांव सेक्शन के पास चलती ट्रेन से गिरने के कारण उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी. उनकी पत्नी ने रेलवे दावा ट्रिब्यूनल अधिनियम, 1987 के तहत 4 लाख रुपये मुआवजे और 18 प्रतिशत ब्याज की मांग करते हुए याचिका दायर की थी. उनका कहना था कि मृतक के सामान में यात्रा टिकट था, लेकिन सामान गुम हो गया और टिकट बरामद नहीं हो सका था. उन्होंने दावा किया कि मृतक व्यापारिक कार्य से अहमदाबाद जा रहे थे और वे वैध यात्री थे. रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि मृतक के वैध यात्री होने का प्रमाण नहीं दिया जा सका. हालांकि ट्रिब्यूनल ने माना कि यह घटना रेलवे अधिनियम के तहत अप्रिय घटना की श्रेणी में आती है, लेकिन यात्री की पात्रता साबित नहीं होने के कारण मुआवजा नहीं दिया जा सकता. 

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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी 3 जनवरी 2024 के अपने फैसले में ट्रिब्यूनल के निर्णय को बरकरार रखा. हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक के सामान की बरामदगी नहीं हुई और यात्रा से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे. अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि पत्नी के बयान और याचिका में यात्रा की तारीख को लेकर अंतर था. पत्नी ने पूछताछ में 26 नवंबर को यात्रा शुरू होने की बात कही थी, जबकि याचिका में 28 नवंबर की तारीख दर्ज थी. मृतक की पत्नी ने दोनों फैसलों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की थी. 

भीड़भाड़ पर जताई चिंता 

अदालत ने रेलवे में भीड़भाड़ की समस्या पर चिंता जताई और कहा कि इसे नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय की गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन में सुधार की जरूरत है.  साथ ही कोर्ट ने यात्रियों से भी अपील की कि वे चलती ट्रेन पकड़ने या फुटबोर्ड पर खड़े होकर यात्रा करने जैसे जोखिम भरे तरीकों से बचें. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यात्रियों की सुरक्षा रेलवे और यात्रियों दोनों की जिम्मेदारी है.

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