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छात्र आंदोलन - दिल्ली पुलिस को मुंबई पुलिस से लेने चाहिये ये 5 सबक

दिल्ली में हालिया आंदोलन के दौरान पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में रही. वहीं, मुंबई पुलिस ने मराठा आंदोलन जैसी बड़ी चुनौती को संयम, संवाद और रणनीति के दम पर संभाला था.

छात्र आंदोलन - दिल्ली पुलिस को मुंबई पुलिस से लेने चाहिये ये 5 सबक
दिल्ली पुलिस हाल ही में लाठीचार्ज को लेकर काफी चर्चा में रही थी.

दिल्ली में बीते हफ्ते कॉर्कोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान खूब हिंसा हुई. इस आंदोलन के दौरान दिल्ली पुलिस के बर्ताव को लेकर भी खूब सवाल उठाये. दिल्ली पुलिस पर आरोप लगे कि उसने छात्रों पर बल प्रयोग करके आंदोलन को और ज्यादा भडका दिया. क्या दिल्ली पुलिस इस आंदोलन को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकती थी? आईये जानते हैं कि इसी तरह के घटनाक्रम से मुंबई पुलिस ने कैसे निपटा था. पिछले साल मुंबई पुलिस के सामने भी मराठा आंदोलन की शक्ल में ऐसी ही चुनौती आयी थी लेकिन मुंबई पुलिस ने बिना एक लाठी चलाये या किसी को एक थप्पड मारे बिना आंदोलन को खत्म करवा दिया था.

मराठा आरक्षण की मांग को लेकर 29 अगस्त 2005 की सुबह मराठा नेता मनोज जरांगे पाटिल जालना से मुंबई के आजाद मैदान पहुंच गये और वहां अपना अनशन शुरू कर दिया. उनके साथ 8 हजार वाहनों में महाराष्ट्र के अलग अलग इलाकों से करीब 60,000 आंदोलनकारी भी पहुंचे. एक साथ इतने लोगों के शहर में आ जाने से दक्षिण मुंबई में आम जनजीवन कुछ हद तक प्रभावित हुआ. 29 अगस्त से लेकर 2 सितंबर तक इन पांच दिनों में आंदोलनकारियों ने जमकर उत्पात मचाया. पुलिस के बैरीकेड ले उडे, रास्ता जाम किया, सीएसटी रेल स्टेशन पर कबड्डी खेली, दुकानों और शॉपिंग मॉल्स में जाकर हंगामा किया लेकिन पुलिस ने संयम बरता और कोई सख्ती नहीं बरती. ये आंदोलन बिना किसी हिंसा के शांतिपूर्वक निपट गया इस सफलता के पीछे मुंबई पुलिस कमिश्नर देवेन भारती और तत्कालीन ज्वाइंट कमिश्नर (कानून-व्सयवस्त्यथा) सत्यनारायण चौधरी की बनायी 5 सूत्रीय पुख्ता रणनीति थी.

1. पूर्व नियोजन -

सबसे पहले इस बात की जानकारी हासिल की गयी कि आंदोलन में कितने लोग आ सकते हैं, वे कहां कहां से आयेंगे और किन रास्तों से आयेंगे. इस जानकारी के आधार पर ट्रैफिक इस तरह से नियोजित किया गया कि बाहर से आ रहे आंदोलनकारी सीधे आजाद मैदान पहुंचे और मुंबई वालों को कम से कम दिक्कतों का सामना करना पडे. कुछ रास्ते आम लोगों के बंद किये गये तो कई जगह ट्रेफिक वैकल्पिक रास्तों की तरफ मोडा गया.

2. आंदोलनों का पूर्व इतिहास-

पुलिस बंदोबस्त के वक्त मराठा आंदोलन के इतिहास को खंगाला गया. मराठा आंदोलनो में भूतकाल में खूब हिंसा हुई थी विशेषकर साल 2018 और 2023 में. मुंबई पुलिस ने उन आंदोलनों का विश्लेषण किया और जाना कि तब आंदोलन से निपटने में क्या क्या खामियां थीं. इस जानकारी के आधार पर तय हुआ कि मुंबई में हो रहे आंदोलन के वक्त क्या करना है और क्या नहीं.

3. फोर्स का मनोबल  

पुलिसकर्मी इस तरह के आंदोलन के दौरान कई कई घंटे एक जगह खडे रहते हैं. उन्हें खाना-पानी नहीं मिल पाता, धूप या बारिश के रूप में मौसम की मार पडती है सो अलग. ऐसे में कोई आंदोलनकारी अगर पुलिसकर्मियों से बदसलूकी करता है तो पुलिसकर्मी अपना आपा खो सकते हैं. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने इस मनौवैज्ञानिक फैक्टर को भी ध्यान में रखा और अपनी टीम का मनोबल बनाये रखने के लिये प्रयास किये. वक्त पर खाने के लिये तैनत पुलिसकर्मियों के पास फूड पैकेट्स और पानी भिजवाया गया. पुलिस के बडे अधिकारी भी बंदोबस्त के लिये जमीन पर नजर बाकी पुलिसकर्मियों के साथ खडे नजर आये. पुलिसकर्मियों को ये भरोसा दिया गया कि सभी आला अधिकारी उनके साथ खडे हैं. 

4. लातों से नहीं बातों से काम -

पुलिसकर्मियों को समझाया गया कि आंदोलनकारी कितना भी उकसायें बल प्रयोग नहीं करना है. बल प्रयोग उसी स्थिति में किया जाना था जब किसी की जान का खतरा बन आता या फिर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता. पुलिस ने आंदोलनकारियों के बीच कुछ ऐसे स्वयंसेवक पहचान रखे थे जो कि उनकी बात सुनते और आंदोलनकारियों को समझाते. ये स्वयंसेवक (वॉलिंटियर्स) आंदोलकारियों और पुलिस के बीच एक संपर्क माध्यम की तरह थे. उस वक्त स्थिति इतनी विस्फोटक थी कि हल्का सा लाठीचार्ज भी बडे पैमाने पर हिंसा की आग भडका सकता था और इसका असर महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में भी नजर आता. जब भी कहीं पुलिसकर्मियों और आंदोलनकारियों के बीच गर्मागर्मी होती, बडे अधिकारी उसमें मध्यस्थता करते और बात को वहीं खत्म करवाते.

5. आपातकालीन इंतजाम -

तमाम पूर्व तैयारियों के बावजूद भी अगर बात बिगड जाती और भीड हिंसा पर उतारू हो जाती तो उसके लिये भी मुंबई पुलिस ने आपातकालीन इंतजाम कर रखे थे. इसके लिये तकनीक की मदद ली गयी. सीसीटीवी और ड्रोन कैमरों की मदद से आंदोलनकारियों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी. मसलन अगर दक्षिण मुंबई में हिंसा भडक जाती तो वहां से लोगों को निकालने के लिये वैकल्पिक रास्ते तैयार रखे गये थे. इसके अलवा अहम सरकारी ठिकानों पर अतिरिक्त सुरक्षा बल लगाये गये थे.

2 सितंबर को बॉम्बे हाईकोर्ट के दखल के बाद मनोज जरांगे पाटिल ने अपना आंदोलन वापस ले लिया. इसके बाद आंदोलनकारी शांतिपूर्व वापस अपने अपने जिलों में लौट गये. मुंबई शहर ने राहत की सांस ली और मुंबई पुलिस की रणनीति की तारीफ हुई.

मुंबई पुलिस के पूर्व ज्वाइंट कमिश्नर (कानून-व्यवस्था) सत्यनारायण चौधरी, जो अब ट्रैफिक पुलिस के प्रमुख हैं, का कहना है  - "मराठा आंदोलन से निपटना मेरे उस कार्यकाल की सबसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी थी." दिल्ली पुलिस ने अगर मुंबई पुलिस की प्लेबुक के कुछ पन्ने पढे होते तो शायद आज उसकी इतनी किरकिरी नहीं हो रही होती.

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