दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को शनिवार को पुलिस ने अस्पताल में शिफ्ट कर दिया. वांगचुक 21 दिन से वहां अनशन कर रहे थे. हालांकि, अस्पताल पहुंचने के बाद भी सोनम वांगचुक का अनशन जारी है. उन्होंने दवा लेने से इनकार कर दिया है. अस्पताल में एक्सपर्ट डॉक्टरों की टीम उनकी निगरानी कर रही है.
इसी बीच सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की है. इसमें उन्होंने सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से किसी निजी अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की है.
अपनी याचिका में उन्होंने यह भी कहा कि शनिवार को मनमाने ढंग से और मौलिक अधिकारों को उल्लंघन करते हुए पुलिस ने सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से उनकी सहमति के बिना जबरन हटा दिया और उन्हें सफदरजंग अस्पताल पहुंचा दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने हाई कोर्ट के आदेश का गलत फायदा उठाया.
वहीं, पुलिस ने अपनी इस कार्रवाई के लिए दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया था, जिसमें कोर्ट ने अधिकारियों को वांगचुक की सेहत पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर मेडिकल मदद देने के लिए कहा गया था.
क्या भूख हड़ताल मौलिक अधिकार है?
भारत में भूख हड़ताल का लंबा इतिहास रहा है. आजादी की लड़ाई से लेकर अब तक कई भूख हड़ताल देखी गई हैं. आजादी के बाद सबसे लंबी भूख हड़ताल इरोम शर्मिला ने मणिपुर में AFSPA को खत्म करने की मांग को लेकर की थी. उनकी भूख हड़ताल 2000 में शुरू हुई थी और 2016 तक चली थी. इस दौरान उन्हें बार-बार जबरदस्ती खाना खिलाया गया.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और (b) के तहत देश के लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने और सरकार के किसी भी काम या फैसले के खिलाफ विरोध करने का अधिकार है.
इससे पहले 1972 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया था कि सरकार सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शन पर रोक को नियंत्रित कर सकती है, ताकि परेशानी या ट्रैफिक में रुकावट न हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह नागरिकों के अधिकारों को उल्लंघन करते हुए सभी सड़कों या सार्वजनिक जगहों को बंद कर दे.
2020 में शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शनों के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को सरकार को बढ़ावा देना चाहिए. हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा था कि सार्वजनिक जगहों पर अनिश्चित काल तक कब्जा नहीं किया जा सकता.
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सोनम वांगचुक और उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो.
Photo Credit: IANS
सुप्रीम कोर्ट का क्या है कहना?
2011 में केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के खिलाफ जमकर विरोध प्रदर्शन हुए थे. दिल्ली के जंतर-मंतर में अन्ना हजारे ने भी भूख हड़ताल की थी. उसी समय बाबा रामदेव भी भूख हड़ताल पर बैठ गए थे, लेकिन दिल्ली पुलिस ने इस पर सख्ती से कार्रवाई की थी.
इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए थे और दोषी अधिकारियों के खिलाप कार्रवाई का निर्देश दिया था. कोर्ट ने कहा था कि रामदेव का भूख हड़ताल पर बैठने का फैसला कोई ऐसी असाधारण स्थिति नहीं है, जिससे कानून व्यवस्था के लिए कोई तत्काल खतरा पैदा हो. कोर्ट ने दोहराया कि लोगों के मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता.
उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भूख हड़ताल को लेकर कहा था कि यह न तो असंवैधानिक है और न ही कानून के खिलाफ. कोर्ट ने कहा था, 'यह विरोध का एक ऐसा तरीका है जिसे हमारे संवैधानिक न्यायशास्त्र में ऐतिहासिक और कानूनी, दोनों ही रूपों में स्वीकार किया गया है.'
क्या जबरन अनशन तुड़वाया जा सकता है?
तो इसका सीधा जवाब है- नहीं. किसान आंदोलन के दौरान जब किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल भूख हड़ताल पर बैठ गए थे और लगातार उनकी हालत गिरती जा रही थी तो कोर्ट ने आदेश दिया था कि उन्हें अस्पताल ले जाया जाए. हालांकि, कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ कर दिया था कि कोर्ट उनसे अपना अनशन तोड़ने के लिए नहीं कह रही है.
कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया था कि अस्पताल ले जाने का मतलब यह नहीं है कि डल्लेवाल अपना अनशन जारी नहीं रख पाएंगे. लेकिन अस्पताल में ऐसी मेडिकल सुविधाएं होंगी, जिससे उनकी जान को कोई खतरा न हो.
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क्या जबरदस्ती खिलाया जा सकता है?
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के माल्टा घोषणापत्र में कहा गया है कि भूख हड़ताल के मामलों में डॉक्टरों के सामने दुविधा होती है. एक तरफ मरीज की देखभाल करना उनका फर्ज होता है तो दूसरी तरफ उन्हें मरीज की मर्जी (ऑटोनॉमी) का भी सम्मान करना होता है.
माल्टा घोषणापत्र के अनुसार, भूख हड़ताल करने वाले व्यक्ति को जबरदस्ती ऐसा इलाज नहीं दिया जाना चाहिए, जिसे लेने से उनसे मना कर दिया हो.
अदालतें भी ऐसा ही करती हैं. ज्यादातर मामलों में कोर्ट ने भूख हड़ताल करने वाले व्यक्ति को जबरदस्ती खाना खिलाने का आदेश नहीं दिया है. हालांकि, ये अलग-अलग मामलों पर निर्भर करती है. जैसे- इरोम शर्मिला को जब सरकार जबरदस्ती खाना खिलाना चाहती थी तो अदालतों ने दखल नहीं दिया. हालांकि, डल्लेवाल के मामले में उनकी बिगड़ती हालत के बावजूद अदालत ने सिर्फ उन्हें अस्पताल ले जाने का आदेश दिया था.
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