Siddaramaiah Resignation Inside Story: कांग्रेस नेतृत्व की इच्छा के मुताबिक, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पद से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है. डीके शिवकुमार जल्द ही अगले मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे. कर्नाटक में इतने बड़े राजनीतिक घटनाक्रम से सब हैरान हैं. आखिर सिद्धारमैया जैसे कद्दावर नेता इतनी आसानी से पद छोड़ने के लिए कैसे तैयार हो गए? इतने बड़े नेता ने आसानी से हथियार कैसे डाल दिए? सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के लिए कैसे तैयार किया? आइए आपको बताते हैं, सिद्धारमैया के सीएम पद से इस्तीफे की इनसाइड स्टोरी.
अच्छा फीडबैक नहीं
कर्नाटक के सबसे लंबे समय करीब आठ साल के सीएम सिद्धारमैया के दूसरे कार्यकाल को तीन साल पिछले हफ़्ते ही पूरे हुए हैं. पिछड़ी जाति से आने वाले सिद्धारमैया दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच भी बड़ा जनाधार रखते हैं. लेकिन सूत्रों ने बताया कि उनके दूसरे कार्यकाल को लेकर कांग्रेस नेतृत्व के पास अच्छा फीडबैक नहीं आ रहा था. एंटी इंकम्बेंसी बढ़ती जा रही थी. माना गया कि बढ़ती उम्र के कारण 78 साल के सिद्धारमैया पहले की तरह प्रभावशाली प्रशासक नहीं रहे. अगले विधानसभा चुनाव तक उनकी उम्र 80 साल हो जाती. जाहिर है कि तमाम फीडबैक के बाद राहुल गांधी ने कर्नाटक में बदलाव का फैसला कर लिया.

राहुल गांधी ने बिना लाग-लपेट स्पष्ट शब्दों में कह दिया
कांग्रेस आलाकमान सही समय का इंतजार कर रहा था. केरल, तमिलनाडु समेत पांच राज्यों का विधानसभा चुनाव खत्म होने और राज्यसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार को दिल्ली बुलाया गया. कांग्रेस मुख्यालय के अपने कमरे में राहुल गांधी ने सिद्धारमैया से सीधी बातचीत की और बिना लाग-लपेट के स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि अगले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए आपको इस्तीफा दे कर अगली पीढ़ी को मौका देना चाहिए. राहुल गांधी ने सिद्धारमैया से राज्यसभा के रास्ते दिल्ली आकर पार्टी की मदद करने का आग्रह किया. सिद्धारमैया को यह भी भरोसा दिया गया कि नई सरकार और प्रदेश संगठन में उनके लोगों को पर्याप्त जगह दी जाएगी.
शुरू में सिद्धारमैया ने राहुल गांधी को समझाने की कोशिश की कि उनकी सरकार अच्छा काम कर रही है. लेकिन जब उन्होंने महसूस किया कि उनके कांग्रेस आलाकमान मन बना चुका है, तो उन्होंने पद छोड़ने को लेकर अपनी सहमति दे दी. सूत्रों के मुताबिक, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी बदलाव के पक्ष में थे. यही राय कांग्रेस अध्यक्ष खरगे की भी थी जो ख़ुद कर्नाटक से आते हैं.

कांग्रेस ने डीके शिवकुमार से किया था वादा
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में नेतृत्व परिवर्तन का एक और पहलू है. 2023 में जब राज्य की 224 सीटों की विधानसभा में कांग्रेस को 136 सीटें मिलीं, तब डीके शिवकुमार पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे. बड़ी जीत के बाद उन्होंने सीएम के पद पर दावा ठोका, लेकिन तब कांग्रेस नेतृत्व यानी राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने अनुभवी सिद्धारमैया पर भरोसा जताया. तब करीब 100 विधायक सिद्धारमैया के पक्ष में थे. डीके शिवकुमार को उप मुख्यमंत्री पद देकर इंतज़ार करने को कहा गया. लेकिन उस समय से ही डीके शिवकुमार के करीबी यह दावा करते आए हैं कि कांग्रेस आलाकमान ने आधे कार्यकाल यानी ढाई साल के बाद सीएम बनाने का वादा किया गया है. हालांकि, इसको कभी आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया. उल्टे सिद्धारमैया यह संदेश देते रहे कि वो अपना कार्यकाल पूरा करेंगे.
लेकिन बीते साल नवंबर में सिद्धारमैया सरकार के ढाई साल पूरे होते ही डीके शिवकुमार ने दिल्ली में दबाव बनाना शुरू कर दिया. दूसरी तरफ सीएम सिद्धारमैया आधे कार्यकाल के बाद कैबिनेट में बदलाव की मांग कर रहे थे. तब राहुल गांधी के निर्देश पर कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने दोनों नेताओं को धीरज रखने का निर्देश देते हुए कहा सही समय पर पार्टी नेतृत्व फ़ैसला लेगा.

डीके शिवकुमार को धैर्य का इनाम मिला
सिद्धारमैया ने सुर बदलते हुए कहना शुरू किया कि कांग्रेस आलाकमान का कोई भी फैसला उन्हें मंजूर होगा. फीडबैक के आधार पर सही समय आते ही राहुल गांधी ने सीएम बदलने का फैसला किया. सिद्धारमैया ने वचन निभाया और डीके शिवकुमार को उनके धैर्य का इनाम मिल गया. डीके के करीबी दावा करते हैं कि छह महीने बाद सही लेकिन अंत में ढाई-ढाई साल वाला वादा निभाया गया है.
सिद्धारमैया ने हथियार कैसे डाल दिए?
सवाल उठता है कि 100 से ज्यादा विधायकों के समर्थन के बावजूद सिद्धारमैया ने हथियार कैसे डाल दिए? सूत्रों के मुताबिक, दरअसल वो समझ चुके थे कि कांग्रेस नेतृत्व की बात नहीं मानी तो पार्टी के विधायक उनसे छिटक सकते हैं. वैसे भी समय के साथ उम्र के कारण प्रशासन के साथ-साथ सियासत पर भी उनकी पकड़ ढीली हुई है. उनकी सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी विधायक खुद महसूस कर रहे थे. हालांकि, हाल में ही कांग्रेस ने कर्नाटक में दो सीटों पर हुए विधानसभा उपचुनाव में क्लीन स्वीप किया था.
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सिद्धारमैया के करीबियों का कहना है कि उन्होंने शराफत से राहुल गांधी की बात मान ली, क्योंकि कभी दूसरी पार्टी (जेडीएस) से आने के बावजूद सोनिया गांधी ने उन्हें सीएम बनाया था. उनके पास अब कुछ नया हासिल करने को नहीं बचा था. जिस सहज तरीके से सिद्धारमैया ने इस्तीफा दिया है, उससे उनका पद भले गया हो कद बढ़ा है और सहानुभूति भी मिली है. उनके बेटे यतींद्र को डीके शिवकुमार की सरकार में अहम ज़िम्मेदारी मिलना तय है.
देखना होगा कि सिद्धारमैया अपनी आगे की सियासी पारी कैसे खेलते हैं. ये तो अगले चुनाव में ही पता चलेगा कि इस अहम बदलाव से कांग्रेस को वाकई फायदा मिलेगा या नहीं?
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