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भारत को अराजकता से बचाएं; दुनिया के 27 देशों के 400 शिक्षाविदों और छात्रों ने जारी किया बयान

शिक्षाविदों और छात्रों ने आरोप लगाया कि अदालत में विचाराधीन मामलों का राजनीतिकरण करके भारतीय लोकतंत्र में संदेह पैदा करने की साजिश रची जा रही है.

भारत को अराजकता से बचाएं; दुनिया के 27 देशों के 400 शिक्षाविदों और छात्रों ने जारी किया बयान
  • 27 देशों के 400 से अधिक भारतीय मूल के छात्रों और शिक्षाविदों ने सुरक्षा को लेकर संयुक्त बयान जारी किया
  • बयान में लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने और अराजकता फैलाने के प्रयासों की कड़ी निंदा की गई है
  • चुनाव परिणामों को नकारने, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाने पर चिंता जताई गई है
नई दिल्ली:

दुनिया के 27 देशों के अग्रणी विश्वविद्यालयों से जुड़े 400 से अधिक भारतीय मूल के छात्रों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और पूर्व छात्रों ने एक संयुक्त बयान जारी कर भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने के प्रयासों पर गहरी चिंता व्यक्त की है. 'स्पेयर इंडिया फ्रॉम एनार्की' यानी भारत को अराजकता से बचाएं शीर्षक से जारी इस बयान में लोकतांत्रिक संस्थाओं को अस्थिर करने और अराजक सड़क प्रदर्शनों के माध्यम से संवैधानिक तंत्र को नीचा दिखाने की कोशिशों की कड़ी निंदा की गई है.

इस बयान पर हस्ताक्षर करने वाले भारतीय मूल के लोग 27 देशों में कार्यरत या अध्ययनरत हैं. इनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, आयरलैंड, इटली, स्पेन, स्वीडन, नॉर्वे, पोलैंड, रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, मलेशिया, इज़राइल और संयुक्त अरब अमीरात आदि शामिल हैं. हस्ताक्षरकर्ताओं में दुनिया के शीर्ष शिक्षण संस्थानों के छात्र और शिक्षाविद् शामिल हैं. इनमें मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, प्रिंसटन, हार्वर्ड, येल, स्टैनफोर्ड, कोलंबिया यूनिवर्सिटी, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर और टोरंटो विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षाविद् हैं.

बयान में कहा गया है कि आजादी के सात दशकों में भारतीय लोकतंत्र ने बार-बार अपनी ताकत और लचीलापन साबित किया है. देश में संवैधानिक संस्थाएं फली-फूली हैं और शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र का एक स्थायी आधार रहा है. हालांकि, हाल के दिनों में कुछ वर्गों द्वारा चुनाव परिणामों को नकारने, संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सवाल उठाने और 'संसद के स्थान पर सड़क'  को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति बढ़ी है. बयान के अनुसार, प्रतिकूल चुनावी परिणामों के बाद चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाते हैं. जब न्यायपालिका के फैसले पक्ष में नहीं आते तो न्यायिक स्वतंत्रता पर अनुचित टिप्पणियां की जाती हैं. यहां तक कि देश की सबसे गैर-राजनीतिक संस्था- भारतीय सशस्त्र बलों को भी बेवजह और अन्यायपूर्ण तरीके से राजनीतिक विवादों में घसीटा जा रहा है.

शिक्षाविदों और छात्रों ने आरोप लगाया कि अदालत में विचाराधीन मामलों का राजनीतिकरण करके भारतीय लोकतंत्र में संदेह पैदा करने की साजिश रची जा रही है. इसके बाद अराजक तत्वों के माध्यम से इन मुद्दों को सड़कों पर भड़काया जाता है, जिनका कभी भी संवैधानिक शासन व्यवस्था में विश्वास नहीं रहा है. बयान में कहा गया कि लोकतंत्र को बचाने के नाम पर यह सब करना अत्यंत विरोधाभासी और चिंताजनक है. बयान में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के ऐतिहासिक वक्तव्य को याद दिलाया गया है. डॉ. अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि यदि भारत को एक संवैधानिक गणराज्य के रूप में जीवित रहना है, तो हमें 'संवैधानिक तरीकों से मजबूती से बंधे रहना होगा और क्रांति के हिंसक तरीकों को छोड़ना होगा, जो अराजकता का व्याकरण हैं'. 

वक्तव्य में चिंता जताई गई कि आज अराजकता को एक विकल्प के रूप में अपनाया जा रहा है जो भाईचारे की भावना और बुद्धिमत्ता की जगह ले रहा है. बयान में स्पष्ट किया गया कि असहमति और विरोध लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन लोकतंत्र की आड़ में लोकतांत्रिक ढांचे को ही नष्ट करने के प्रयासों पर मूकदर्शक नहीं बना जा सकता. हस्ताक्षरकर्ताओं ने भारत के सभी सामाजिक और राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे अपनी चिंताओं को समझें और सभी मतभेदों को विरोध, बहस, चर्चा और संवाद के माध्यम से हल करें. उन्होंने आग्रह किया कि समाधान केवल उन्हीं संवैधानिक संस्थाओं के दायरे में खोजा जाना चाहिए जिन्हें हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने तैयार किया था, ताकि भारत पूरी दुनिया के सामने लोकतांत्रिक मूल्यों का एक बेहतरीन उदाहरण पेश कर सके.

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