- संसद के मॉनसून सत्र को खत्म हुए 65 दिन बीत चुके हैं लेकिन अभी तक सत्रावसान की घोषणा नहीं हुई है
- वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी ने मुख्य चुनाव आयुक्त चयन प्रक्रिया में सुधार की जरूरत जताई है
- अब दो दलों के बदले हुए रुख के बाद विशेष सत्र को लेकर संशय की स्थिति पैदा हो गई है
संसद के मॉनसून सत्र को खत्म हुए 65 दिन का वक्त बीत चुका है, लेकिन अब तक सत्रावसान की घोषणा नहीं हुई है. इसके कारण ये अटकलें रोज ही लग रही हैं कि विशेष सत्र कभी भी बुलाया जा सकता है. मगर पिछले दो दिनों में कुछ ऐसा घटा है, जिससे सरकार को विशेष सत्र बुलाने पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है. पहला है YSRCP के नेता जगन मोहन रेड्डी का ताजा बयान जो मौजूदा केंद्र सरकार के लिए अच्छी खबर ले कर नहीं आया है. वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन रेड्डी के सुर अब बदलने लगे हैं. उन्होंने कहा है कि केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन प्रक्रिया का जो बिल आया था, उसका जो उस वक्त हमने समर्थन किया था, अब हमें लगता है कि हमने गलत किया था.
जगन रेड्डी का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन की मौजूदा प्रक्रिया सही नहीं है और इसमें बदलाव की जरूरत है. जगन रेड्डी ने आगे यह भी कहा है कि केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का दखल कम होना चाहिए. वाईएसआर कांग्रेस ने इन्हीं कारणों से पुंगानुर नगर निगम चुनाव में भी हिस्सा लेने से मना कर दिया है. पार्टी का कहना है कि इस चुनाव में पारदर्शिता की कमी है और उनके उम्मीदवार को जान का खतरा है. राज्य सरकार उनके उम्मीदवार को प्रर्याप्त सुरक्षा मुहैया नहीं करा रही है. सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि वाईएसआर कांग्रेस ने परिसीमन और महिला आरक्षण बिल पर सरकार के पक्ष में वोट किया
था.
यही नहीं वाईएसआरसीपी केंद्र में कई बिलों पर सरकार का साथ देती रही खासकर राज्यसभा में. वहां पर वाईएसआर कांग्रेस, बीजू जनता दल और बीआरएस मिला कर कम से कम 20 सांसदों एक गुट सा बन गया था जो सरकार के पक्ष में ही मतदान करता रहा. मगर अब बीजू जनता दल INDIA गठबंधन के प्रदर्शन में शामिल हो जाती है और जगन रेड्डी अपना सुर बदल लेते हैं. दूसरी ओर डीएमके जो अब इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है ने भी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान किया है और मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन पर सवाल खड़े किए हैं,राष्ट्रपति को ज्ञापन देने और चुनाव बैलेट से कराने की मांग कर दी है.
जगन मोहन रेड्डी के यह ताजा बयान और डीएमके का अपने पत्ते नहीं खोलना दे ऐसी चीजें हैं, जिसने सरकार का काम कठिन कर दिया है. अभी भी 65 दिनों के बाद भी मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया गया है. इसको लेकर कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे प्रधानमंत्री को तीन खत भी लिख चुके है. खरगे ने मांग की है कि यदि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण बिल फिर से लाना चाहती है तो उन्हें पहले सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए और सभी दलों को भरोसा में लेना चाहिए.
खरगे की चिट्ठी का जवाब संसदीय कार्य मंत्री ने दिया है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि 'सत्रावसान में देरी असंवैधानिक नहीं है और पहले भी लंबे समय सत्रावसान नहीं किया गया है.सरकार परिसीमन बिल को लेकर विपक्ष के लगातार संपर्क में है. राहुल गांधी से मिल कर सहयोग मांगा था. सरकार ने नसीहत भरे अंदाज में कहा कि बार-बार सर्वदलीय बैठक की मांग करना ठीक नहीं. कांग्रेस सहयोग दे, रचनात्मक विपक्ष की भूमिका अदा करे.' कहने का मतलब है कि सरकार और विपक्ष के बीच विशेष सत्र को लेकर कोई विचार विमर्श होने वाला नहीं है. मगर सबसे महत्वपूर्ण है कि यदि डीएमके और अब वाईएसआर कांग्रेस ने यदि सरकार के पक्ष में वोट नहीं किया तो फिर सरकार विशेष सत्र बुलाकर एक बार फिर जोखिम नहीं उठाना चाहेगी. तृणमूल कांग्रेस और उद्धव शिवसेना के टूटने के बाद भी डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस का समर्थन सरकार को चाहिए ही चाहिए होगा. मगर आज के माहौल में क्या डीएमके,वाईएसआर कांग्रेस,बीजू जनता दल अपना फैसला बदलेंगे.
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