एक ओर दुनिया विज्ञान और तकनीक के नए शिखर छू रही है. इंसान चांद और मंगल तक पहुंच चुका है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मानव अस्तित्व को चुनौती दे रहा है. वहीं दूसरी ओर बिहार के रोहतास जिले में एक ऐसी परंपरा आज भी जीवित है, जो आधुनिक सोच को चुनौती देती है. यहां आज भी भूत-प्रेत और आत्माओं में गहरा विश्वास देखने को मिलता है.
हम बात कर रहे हैं रोहतास जिले के संझौली प्रखंड स्थित घिन्हू ब्रह्म स्थान की, जहां हर साल चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र में एक अनोखा और रहस्यमयी मेला लगता है, जिसे स्थानीय लोग 'भूतों का मेला' कहते हैं.
2 किलोमीटर में फैला ‘भूतों का मेला'
चैत्र नवरात्र के 9 दिनों तक चलने वाला यह मेला करीब 2 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला होता है. यहां का माहौल किसी सामान्य धार्मिक मेले जैसा नहीं, बल्कि रहस्यमय और कई बार डरावना महसूस होता है. चारों ओर चीख-पुकार, अजीब हरकतें और तांत्रिकों द्वारा किए जा रहे तंत्र-मंत्र के बीच लोग भूत-प्रेत को शांत कराने आते हैं.
नवरात्र में लगता है ‘भूतों का मेला'
घिन्हू ब्रह्म स्थान पर लगने वाला यह मेला सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, झारखंड और अन्य राज्यों से आने वाले लोगों को भी आकर्षित करता है. मान्यता है कि यहां आने से भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों का असर खत्म हो जाता है. मेले का दृश्य बेहद विचित्र और डरावना होता है. चारों तरफ चीख-पुकार, तांत्रिकों के मंत्रोच्चार और लोगों की अजीब हरकतें... यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं, जिसे देखकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं.
अजीब हरकतें करती हैं महिलाएं
इस मेले में सबसे ज्यादा संख्या महिलाओं की होती है. कई महिलाएं खुले बालों के साथ चीखती-चिल्लाती नजर आती हैं. कोई दौड़ रही होती है, तो कोई जमीन पर लोटती हुई दिखाई देती है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इन महिलाओं पर 'भूत सवार' होता है और वे उसी के प्रभाव में ये हरकतें करती हैं. इस दौरान तांत्रिक उन्हें नियंत्रित करने और 'भूत उतारने' की कोशिश करते हैं.
तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक का सहारा
मेले में तांत्रिकों की भूमिका बेहद अहम होती है. वे मंत्रोच्चार, झाड़-फूंक और तंत्र क्रियाओं के जरिए पीड़ितों को ठीक करने का दावा करते हैं. कई बार वे पीड़ित व्यक्ति को जोर-जोर से झकझोरते हैं, यहां तक कि पिटाई भी करते हैं. तांत्रिकों का कहना है कि वे व्यक्ति को नहीं, बल्कि उसके अंदर मौजूद 'आत्मा' को मारते हैं, ताकि वह शरीर छोड़कर भाग जाए.
जानवरों की बलि की परंपरा
भूत-प्रेत को शांत करने के लिए यहां जानवरों की बलि देने की भी परंपरा है. खासकर मुर्गे की बलि दी जाती है. मान्यता है कि इससे नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं और पीड़ित व्यक्ति को राहत मिलती है.
100 साल पुरानी परंपरा
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह मेला करीब 100 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहा है. साल में दो बार चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां भारी भीड़ जुटती है. मेले में आने वाले ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से कमजोर तबके से होते हैं, जो अपनी समस्याओं का समाधान यहां तलाशते हैं.
कौन थे घिन्हू ब्रह्म
ग्रामीणों के अनुसार, घिन्हू ब्रह्म मूल रूप से बिक्रमगंज प्रखंड के माधवपुर गांव के निवासी थे. एक बार ससुराल से लौटते समय उन्होंने अपनी ताकत दिखाने के लिए जमीन में गड़े एक कील को उखाड़ दिया. इसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्होंने पानी मांगा. रौनी गांव के लोगों ने उन्हें पानी पिलाया, लेकिन पौनी गांव के लोगों ने उनका मजाक उड़ाया. इससे आहत होकर उन्होंने रौनी के समृद्ध होने और पौनी के विनाश का श्राप दे दिया.
श्राप देने के बाद उन्होंने वहीं प्राण त्याग दिए. उनकी मृत्यु के बाद उस स्थान पर ब्रह्म स्थान का निर्माण किया गया, जो आज घिन्हू ब्रह्म के नाम से प्रसिद्ध है.
श्राप की कहानी: पौनी गांव बना टीला
स्थानीय लोगों का दावा है कि घिन्हू ब्रह्म के श्राप का असर आज भी देखा जा सकता है. पौनी गांव धीरे-धीरे उजड़कर एक टीले में तब्दील हो गया, जबकि रौनी गांव आज भी आबाद और समृद्ध है.
क्या कहते हैं तांत्रिक?
सत्येंद्र पासवान (तांत्रिक) का कहना है कि वे पिछले 35 वर्षों से इस मेले में आ रहे हैं और सैकड़ों लोगों को भूत-प्रेत से मुक्ति दिला चुके हैं. वहीं मेले में आई एक महिला ने बताया कि वह कई वर्षों से यहां आ रही है, और उसे इससे काफी लाभ हुआ है. कुछ महिलाएं तो मेले में गाते-नाचते हुए 'भूत उतारने' की प्रक्रिया से गुजरती नजर आती हैं.
शराबबंदी के बावजूद शराब का इस्तेमाल
बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बावजूद मेले में शराब की बोतलें देखी जाती हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि कुछ लोग इसे 'चढ़ावा' के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं.
आस्था या अंधविश्वास
घिन्हू ब्रह्म का यह मेला आस्था और अंधविश्वास के बीच की एक पतली रेखा को उजागर करता है. जहां एक ओर लोग इसे अपनी समस्याओं का समाधान मानते हैं, वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण इसे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पहलू से जोड़कर देखता है. फिलहाल, यह मेला आज भी हजारों लोगों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है, जहां विज्ञान और विश्वास आमने-सामने खड़े नजर आते हैं.
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