- मंत्री संतोष कुमार सुमन ने कहा कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए लेकिन इसे समाप्त नहीं किया जाना चाहिए.
- उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के SC-ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण के फैसले का समर्थन करते हुए इसे आवश्यक बताया है.
- सुमन ने कहा कि दलित समाज के भीतर कुछ जातियां आरक्षण का अधिक लाभ पा रही हैं जबकि कई जातियां अभी भी पिछड़ी हैं.
बिहार सरकार में मंत्री और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के नेता संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण को लेकर बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए. लेकिन इसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए. उनका मानना है कि आरक्षण का फायदा उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है. सुमन ने SC-ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि दलित समाज की कुछ जातियों को लंबे समय से आरक्षण का ज्यादा लाभ मिला है, जबकि कई जातियां अभी भी पीछे हैं. इसलिए आरक्षण के भीतर जरूरतमंद और अधिक पिछड़ी जातियों के लिए अलग हिस्सा तय करने पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि सभी को समान अवसर मिल सकें.
'आरक्षण की समीक्षा का अर्थ आरक्षण समाप्त करना नहीं'
बिहार सरकार के मंत्री संतोष कुमार सुमन ने कहा, 'आरक्षण की समीक्षा का अर्थ आरक्षण समाप्त करना नहीं, बल्कि उसका लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचाना है. हमने SC-ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तब भी समर्थन किया था और आज भी करते हैं. आखिर 79 वर्ष की आजादी के बाद यह सवाल पूछना गलत कैसे हो सकता है कि आरक्षण का लाभ किन वर्गों को कितना मिला और समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े कौन-से लोग आज भी इससे वंचित हैं?
आरक्षण की समीक्षा का अर्थ आरक्षण समाप्त करना नहीं, बल्कि उसका लाभ सही व्यक्ति तक पहुँचाना है।
— Dr. Santosh Kumar Suman (@santoshmanjhi_) August 27, 2026
हमने SC-ST आरक्षण में उप-वर्गीकरण के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तब भी समर्थन किया था और आज भी करते हैं। आखिर 79 वर्ष की आजादी के बाद यह सवाल पूछना गलत कैसे हो सकता है कि आरक्षण का लाभ…
'क्या आरक्षण का लाभ सबसे वंचित लोगों तक पहुंच रहा है?'
संतोष कुमार सुमन ने एक्स पोस्ट में कहा, 'हमारे देश में सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को पहचानने के लिए वर्गीकरण की व्यवस्था पहले भी हुई है. सामान्य वर्ग के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए EWS की व्यवस्था बनी, पिछड़े वर्गों में भी पिछड़ा और अतिपिछड़ा की अलग पहचान की गई. जब एक ही बड़े सामाजिक वर्ग के भीतर वास्तविक वंचितों तक लाभ पहुंचाने के लिए अलग श्रेणियां बनाई जा सकती हैं, तो फिर दलित समाज के भीतर भी यह देखना क्यों गलत है कि आरक्षण का लाभ सबसे वंचित लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं?'
संतोष कुमार सुमन ने कहा कि दलित समाज कोई एकरूप वर्ग नहीं है. उसके भीतर भी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति में अंतर है. यदि कुछ जातियां आरक्षण का लाभ लगातार अधिक प्राप्त कर रही हैं और कुछ आज भी पीछे हैं, तो उन तक अवसर पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण क्यों नहीं होना चाहिए? इसका अर्थ आरक्षण समाप्त करना नहीं है. बल्कि बाबा साहब डॉ. आंबेडकर के दिए संवैधानिक अधिकार को उसके वास्तविक हकदारों तक पहुंचाना है. आरक्षण बचाना है तो उसकी पहुंच भी न्यायपूर्ण बनानी होगी. आरक्षण रहे, लेकिन उसका लाभ सबसे वंचित तक पहुंचे-यही सामाजिक न्याय है.'
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