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भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की ढीली होती पकड़, चुनाव के नतीजों ने कैसे बदली सियासी दिशा?

2026 के विधानसभा चुनावों ने देश की राजनीति की दिशा बदल दी है. क्षेत्रीय पार्टियों की पकड़ कमजोर पड़ रही है और मतदाताओं का झुकाव तेजी से राष्ट्रीय दलों की ओर हो रहा है. क्या यह भारतीय राजनीति के नए युग की शुरुआत है. पूरी खबर पढ़ें और समझें बदलता सियासी समीकरण.

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की ढीली होती पकड़, चुनाव के नतीजों ने कैसे बदली सियासी दिशा?
  • 2026 चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों को बड़ा झटका, राष्ट्रीय दलों खासकर BJP की पकड़ मजबूत हुई.
  • विपक्ष के सामने चुनौती, संघीय मुद्दे उठाने के बावजूद मतदाता राष्ट्रीय नेतृत्व को तरजीह दे रहे हैं.
  • यह संकेत है कि राजनीति उस दौर में प्रवेश कर गई है, जहां क्षेत्रीय पहचान से अहम राष्ट्रीय मुद्दे, दल हो गए हैं.
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2026 के विधानसभा चुनाव नतीजों ने देश की राजनीति में एक बड़ा ट्रेंड साफ कर दिया है. क्षेत्रीय पार्टियों की पकड़ लगातार कमजोर हो रही है और मतदाता तेजी से राष्ट्रीय दलों खासकर भारतीय जनता पार्टी की ओर झुकते दिख रहे हैं. पश्चिम बंगाल में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की 15 साल पुरानी सत्ता का अंत और तमिलनाडु में डीएमके की अप्रत्याशित हार इस बदलाव का सबसे बड़ा संकेत है. तमिलनाडु में जहां नई पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम ने राजनीति में दमदार एंट्री की, वहीं यह भी साफ हुआ कि पारंपरिक क्षेत्रीय राजनीति पार्टियों का प्रभाव पहले से कमजोर हुआ है.

तमिल पहचान और गौरव के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाली डीएमके को सत्ता विरोधी लहर ने करारा झटका दिया. यहां तक कि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को भी हार का सामना करना पड़ा. यह ये भी दिखाता है कि केवल क्षेत्रीयता की भावना चुनाव जिताने के लिए काफी नहीं हैं. देश के अन्य हिस्सों में भी विभिन्न क्षेत्रीय पार्टियों की स्थिति कमोबेश यही है.

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Photo Credit: ANI

कौन-कौन क्षेत्रीय दल सिमट रहे?

बात अगर आम आदमी पार्टी की करें तो उसका दायरा भी पहले की तुलना में सिमटता दिख रहा है. भले ही राष्ट्रीय पार्टी का उसका दर्जा अभी बरकरार है पर दिल्ली से पंजाब तक आप सिमट रही है तो राज्यसभा में भी इसने अपनी ताकत खो चुकी है. कम्युनिस्ट पार्टी भी अब केरल तक ही सिमट कर रह गई है. बेशक पश्चिम बंगाल के चुनाव में उनकी एक सीट बढ़ी है पर राष्ट्र स्तर पर उसकी ताकत कुंद हो गई है. 2024 में ओडिशा में बीजू जनता दल की हार और नवीन पटनायक के लंबे शासन का अंत भी इसी ट्रेंड का हिस्सा है. इस सूची में बीएसपी को भी शामिल किया जा सकता है जो फिलहाल आप की तरह ही राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है पर 2024 के लोकसभा चुनाव में कमजोर पड़ गई थी और अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में उसका आधार भी खिसकता दिख रहा है. यूपी में बसपा का वोट शेयर 19.4% (2019) से गिरकर मात्र 9.39% (2024) रह गया. 2024 में इसने अपने सभी 10 सीटें गंवा दीं और शून्य पर सिमट गई. हालांकि इस बीच इसने मध्य प्रदेश में मामूली सुधार किया. यहां वोट शेयर 2019 के 2.38% से बढ़कर 2024 में 3.28% हो गया. 

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एक ही तराजू पर नहीं हैं सभी क्षेत्रीय दल 

हालांकि सिमटते क्षेत्रीय दलों के संदर्भ में कुछ अपवाद भी हैं. इसमें सबसे आगे झारखंड की झारखंड मुक्ति मोर्चा है, जिसने नवंबर 2024 में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज की. इंडिया गठबंधन के छत्र तले उसने अकेले 34 सीटें जीतीं, जबकि पूरे गठबंधन को 81 में से 56 सीटें मिली थीं. इसी तरह जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस भी अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं. 2024 के चुनाव में कुल 90 सीटों में से 42 सीटें अकेले NC ने जीतीं. कांग्रेस (6 सीटें) और सीपीआईएम के साथ इस गठबंधन ने बहुमत (46+ सीटें) का आंकड़ा पार कर लिया. तो जेएमएम और नेशनल कान्फ्रेंस, दोनों ही दल अपनी पकड़ मजबूत बनाए हुए हैं. 

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक 1989 के बाद का जो दौर क्षेत्रीय दलों के उभार का था, वह अब कमजोर पड़ रहा है. तब भारत में गठबंधन की राजनीति हावी थी, और उसी दौरान बने एनडीए और यूपीए जैसे बहुदल-गठबंधन इन्हीं क्षेत्रीय दलों पर निर्भर थे. यह वही दौर था जब उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य की क्षेत्रीय पार्टियां केंद्र में गठबंधन की सरकार चला रही थीं, तब केंद्र सरकार भी इन क्षेत्रीय दलों के मुद्दों के प्रति संवेदनशील रहती थी.  

लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में राजनीति का संतुलन लगातार पहले की तरह होता जा रहा है. आजादी के बाद पूरे देश पर कांग्रेस पार्टी की मजबूत पकड़ थी. 2014 के बाद से यह पकड़ बीजेपी की होती जा रही है. इसने अपनी पकड़ इतनी मजबूत बनाई है कि कई क्षेत्रीय दलों का आधार कमजोर पड़ गया है. बीजेपी पश्चिम से होती हुई उत्तर और मध्य भारत में अपना दबदबा बनाने लगी तो समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, शिवसेना और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी जैसे दलों का कद घटने लगा. लंबे समय से बिहार में अपना मुख्यमंत्री चाहने वाली बीजेपी वहां भी कामयाब हुई. 15 अप्रैल 2026 को पहली बार बिहार में बीजेपी के मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी ने शपथ लिया. 

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विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती

विपक्ष एक तरफ वह संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों की बात कर रहा है, दूसरी तरफ मतदाता राष्ट्रीय नेतृत्व और स्थिरता को प्राथमिकता देते नजर आ रहे हैं. कांग्रेस ने 2024 में बेहतर प्रदर्शन जरूर किया, लेकिन वह अभी तक खुद को बीजेपी के मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित नहीं कर पाई है.

दक्षिण भारत अब भी क्षेत्रीय दलों का गढ़ माना जाता है, लेकिन वहां भी दबाव बढ़ रहा है. तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति की हार इसका ताजा उदाहरण है. कुल मिलाकर 2026 के विधानसभा चुनाव नतीजे यह स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि भारतीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां क्षेत्रीय पहचान की जगह राष्ट्रीय मुद्दे और नेतृत्व ज्यादा अहम हो गए हैं.

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