विज्ञापन

नेहरू नहीं, इस महिला का आइडिया था AIIMS, आज पूरा हिंदुस्तान बोलता है थैंक्यू

Rajkumari Amrit Kaur story: ये कहानी है देश में सबसे लंबे वक्त तक हेल्थ मिनिस्टर रहीं राजकुमारी अमृत कौर की. महात्मा गांधी की सेक्रेटरी रहीं राजकुमारी को देश आज भी AIIMS के लिए धन्यवाद कहता है.

नेहरू नहीं, इस महिला का आइडिया था AIIMS, आज पूरा हिंदुस्तान बोलता है थैंक्यू
Rajkumari Amrit Kaur AIIMS story

क्या आपने कभी किसी असली राजकुमारी की कहानी सुनी है? आमतौर पर राजकुमारियां महलों में रहती हैं, रेशम के गद्दों पर सोती हैं और ऐशो-आराम की जिंदगी जीती हैं. लेकिन जिस राजकुमारी की कहानी सुनाने जा रहे हैं, उसने महलों का सुख छोड़कर, देश की खातिर सड़कों की धूल छानी और लाठियां खाईं. ये कहानी है एक ऐसी औरत की, जिसने आजाद भारत की AIIMS की नींव रखी. आज हम बात कर रहे हैं- राजकुमारी अमृत कौर की. 

महलों से शुरुआत

राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी 1889 को लखनऊ में पंजाब के कपूरथला शाही परिवार में हुआ था. पिता राजा हरनाम सिंह ने बचपन में ही ईसाई धर्म अपना लिया था, इसलिए वो राजपाट की रेस से बाहर हो गए थे. 7 भाई-बहनों में अमृत इकलौती बहन थीं. बचपन घर पर बीता और फिर पढ़ाई के लिए उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से उन्होंने पढ़ाई की.   

Rajkumari Amrit Kaur: The Princess Who Became Indias First Health Minister and Founded AIIMS

बापू से मुलाकात और बदल गई जिंदगी

20 साल की उम्र में अमृत कौर विदेशी डिग्री लेकर भारत लौटीं. ये वो दौर था जब देश में आजादी की आग सुलग रही थी. 1919 आते-आते अमृत कौर महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हो गईं. वह बापू का आश्रम जॉइन करना चाहती थीं. लेकिन महात्मा गांधी ने मना कर दिया. बापू को लगा कि ये महलों में पली-बढ़ी लड़की है, अभी भी मोह-माया में फंसी है और इसके घरवाले भी शायद राजी न हों.

लेकिन अमृत कौर हार मानने वालों में से कहां थीं. उन्होंने अपना पूरा फोकस समाज सुधार पर लगा दिया. उन्होंने ठान लिया कि वो खुद को साबित करके रहेंगी. उन्होंने औरतों के हक के लिए, बाल विवाह, पर्दा प्रथा और देवदासी जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. 1927 में उन्होंने 'ऑल इंडिया विमेंस कॉन्फ्रेंस' की नींव रखी. आखिरकार उनकी लगन देखकर बापू भी पिघल गए और 1934 में उन्हें अपने 'सेवाग्राम आश्रम' में बुला लिया. अगले 16 साल तक अमृत कौर बापू की परछाईं बनकर, उनकी सेक्रेटरी के रूप में काम करती रहीं.

Latest and Breaking News on NDTV

आजादी के अखाड़े में

अब राजनीति और आजादी की लड़ाई उनके खून में उतर चुकी थी. 1930 के दशक में वो आजादी के आंदोलन में कूद पड़ीं. अंग्रेजों की 'बांटो और राज करो' की नीति के खिलाफ उन्होंने खुलकर आवाज उठाई. अंग्रेजों ने इस राजकुमारी को डराने की बहुत कोशिश की. कई बार जेल की सलाखों के पीछे डाला. नमक सत्याग्रह के दौरान उन्हें मुंबई से गिरफ्तार किया गया. 1937 में देशद्रोह के आरोप में फिर जेल गईं. और 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में तो अंग्रेजों ने उन पर ऐसी बेरहमी से लाठियां बरसाईं कि उनकी तबीयत बुरी तरह बिगड़ गई. उन्हें जेल से निकालकर शिमला में नजरबंद कर दिया गया. लेकिन ये राजकुमारी न झुकी, ना टूटी. जीवन भर वो एक सच्ची गांधीवादी रहीं. रेशम छोड़कर खादी पहनना और सादगी से रहना, यही उनका गहना बन गया था.

संविधान में योगदान

देश आजाद हुआ, तो भारत का संविधान बनने लगा. अमृत कौर संविधान सभा की सदस्य चुनी गईं. वो सभा में ज्यादा बोलती नहीं थीं, लेकिन उनके काम की गूंज बहुत तेज थी. वो मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) कमेटी का अहम हिस्सा थीं. उन्होंने डंके की चोट पर कहा कि धर्म की आजादी की आड़ में पर्दा प्रथा या देवदासी जैसी चीजों को कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए. उनकी जिद का ही नतीजा था कि संविधान में ये तय हुआ कि धर्म के नाम पर समाज सुधार के कानून बनाने से सरकार को नहीं रोका जा सकता.

देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री और AIIMS का जन्म

1947 में जब आजाद भारत की पहली सरकार बनी, तो पंडित नेहरू ने उन्हें देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री (Health Minister) बनाया. आजाद भारत के कैबिनेट में वो इकलौती महिला मंत्री थीं. पूरे 10 साल उन्होंने इस कुर्सी को संभाला. आज अगर आप बीमार पड़ते हैं या कोई बड़ी बीमारी होती है, तो सबसे पहले किस अस्पताल का नाम दिमाग में आता है? एम्स (AIIMS).

कहा जाता है कि पंडित नेहरू AIIMS के पक्ष में नहीं थे. नेहरू का मानना था कि देश को अभी इतने बड़े हॉस्पिटल की जरूरत नहीं है. क्योंकि उस वक्त देश में फंड की कमी थी. लेकिन राजकुमारी अमृत कौर इस आइडिया पर काम कर रही थीं. 1956 में संसद में AIIMS का बिल पास कराने वाली और देश में वर्ल्ड-क्लास मेडिकल पढ़ाई की नींव रखने वाली कोई और नहीं, बल्कि राजकुमारी अमृत कौर ही थीं. उन्होंने देश भर में नर्सिंग की पढ़ाई को बढ़ावा दिया और ढेरों ट्रेनिंग सेंटर खुलवाए. इस दौरान AIIMS के लिए उन्होंने न्यूजीलैंड समेत कई देशों से फंडिंग भी हासिल की थी.

दुनिया भर में बजा डंका

सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में उनकी धाक थी. 1950 में वो वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की प्रेसिडेंट बनीं. ये मुकाम हासिल करने वाली वो पहली महिला और पहली एशियाई थीं. WHO में कई बार भारत का नेतृत्व किया. इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी की वो फाउंडर थीं. शिक्षा, खासकर लड़कियों की पढ़ाई और बच्चों की भलाई के लिए उन्होंने अपनी जान लगा दी. दिल्ली के मशहूर लेडी इरविन कॉलेज को बनाने में भी उनका बड़ा हाथ था.

6 फरवरी 1964 को 75 साल की उम्र में दिल्ली में इस महान हस्ती ने आखिरी सांस ली. जाते-जाते वो औरतों के हक पर (जैसे- Woman in India, Challenge to Women) कई किताबें लिख गईं.

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
AIIMS Doctors, AIIMS Delhi, Success Story  NDTV
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com