सुप्रीम कोर्ट ने पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ एक सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर द्वारा कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के प्रसार को रोकने और सोशल मीडिया पर ऐसे कंटेंट के नियमन के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से कहा कि ऐसी याचिकाओं का उद्देश्य मामला सनसनीखेज बनाना प्रतीत होता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र लागू हो.
कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वकील ने दलील दी कि एक पॉडकास्ट में की गई कथित टिप्पणियों से एक धार्मिक समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं. उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर ऐसे मामलों को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट संवैधानिक व्यवस्था नहीं है और इस विषय पर अदालत को दिशा-निर्देश तय करने चाहिए.
वहीं जस्टिस आलोक अराधे ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता को सूचना प्रौद्योगिकी (प्रक्रिया एवं सुरक्षा उपाय) नियम, 2009 की जानकारी नहीं है.
क्या है मामला?
जून में एक पॉडकास्ट के दौरान पैगंबर मोहम्मद और उनके परिवार के संबंध में कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं. इन टिप्पणियों के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उनके खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में कई एफआईआर दर्ज की गई.
इसमें धार्मिक पूजनीय व्यक्तियों के खिलाफ कथित अपमानजनक सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए दिशा-निर्देश बनाने, सोशल मीडिया पर ऐसे कंटेंट के दुरुपयोग को रोकने तथा कथित आपत्तिजनक वीडियो और पोस्ट को हटाने के निर्देश देने की मांग की गई थी. गौरतलब है कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर जल्द सुनवाई से इनकार करते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता उपलब्ध आपराधिक और अन्य वैधानिक उपायों का सहारा ले सकता है.
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