प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन के दोस्त दौलत खान पठान ने गुजरात के वडनगर में उनके शुरुआती दिनों की कई यादें साझा की हैं. पठान पास के पठान मोहल्ले में रहते थे, जहां उस समय करीब 250 से 300 घर थे. उन्होंने बताया कि उन्होंने प्रेरणा स्कूल में चौथी से सातवीं कक्षा तक नरेंद्र मोदी के साथ पढ़ाई की थी.
दोस्त दौलत खान से सुनाई बचपन की कहानी
1960 के दशक में दोनों परिवारों ने भारी आर्थिक तंगी देखी. पठान का छह लोगों का परिवार उनके पिता के निधन के बाद 35 रुपये की पेंशन पर गुजारा करता था, जबकि मोदी का परिवार घर चलाने वाले अकेले सदस्य उनके पिता की मामूली कमाई पर निर्भर था.
दोनों परिवार सरकार की ओर से मिलने वाले लाल गेहूं के लिए एक ही लाइन में खड़े होते थे. उस समय 20 किलो गेहूं 5.25 रुपये में मिलता था. वे स्थानीय पटेल समुदाय की तरफ से मिलने वाली मुफ्त छाछ पर भी निर्भर रहते थे. हालत ऐसी थी कि रबर की चप्पलें खरीदना भी उनके बस की बात नहीं थी, इसलिए दोनों नंगे पैर स्कूल जाया करते थे.
RSS में शामिल होने का वो किस्सा
बचपन का एक अहम पल 1961 में आया, जब दोनों लड़कों ने डॉ. वसंत पारिख के नेतृत्व में RSS में शामिल होने की कोशिश की. लेकिन उनके पास 1 रुपये की फीस देने तक के पैसे नहीं थे. युवा मोदी खुद पठान के घर गए और उनकी मां को फीस के लिए पैसे देने के लिए मनाया. वहीं, पठान पीएम मोदी की मां हीराबा के पास गए और उन्हें 1 रुपया देने के लिए राजी किया, ताकि दोनों अपना रजिस्ट्रेशन करा सकें.
हालांकि तीन दिन बाद पठान की फीस उनके मुस्लिम बैकग्राउंड की वजह से लौटा दी गई. शुरुआत में मोदी ने कहा कि वे अपने दोस्त के बिना वहां नहीं रहेंगे, लेकिन पठान ने उनसे बने रहने की अपील की, ताकि मोदी संगठन की ओर से मिलने वाली शॉर्ट्स (निकर) पा सकें. दशकों बाद, 2009 में गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय में एक बैठक के दौरान मोदी ने पठान के साथ बचपन की उन यादों को याद किया. उन्होंने मजाक में रिटायरमेंट के बाद उन्हें 'आधा गुजरात' देने की पेशकश भी की. हालांकि पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से पठान सक्रिय BJP राजनीति में शामिल नहीं हो सके.
डिबेट में लेते थे हिस्सा
हाई स्कूल के दिनों में दोनों की दोस्ती सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं थी. पढ़ाई-लिखाई, डिबेट प्रतियोगिताएं और शुरुआती दौर की समाज सेवा, सबमें दोनों साथ थे. बुधवार को होने वाली साप्ताहिक डिबेट में वे अक्सर टॉप पर रहते थे. 1965 में पूर्व मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता पर हुई एक डिबेट के बाद पठान ने मोदी को अखबार पढ़ने के लिए लाइब्रेरी जाने के लिए प्रेरित किया. इसी दौरान डॉ. वसंत पारिख ने युवा मोदी का मार्गदर्शन किया और उन्हें समाज सेवा के कामों से जोड़ा. उन्होंने मोदी और अन्य RSS कार्यकर्ताओं को चंपा, नवापुरा और सुल्तानपुरा जैसे सूखे से प्रभावित गांवों में सब्सिडी वाले बाजरे के भारी बोरे पहुंचाने का काम सौंपा. उस समय 5 किलो बाजरा 2 रुपये में मिलता था.
इस शुरुआती अनुभव ने मोदी को बाद में मुख्यमंत्री बनने पर एक लोकल फैक्ट्री शुरू करने के लिए सीधे तौर पर प्रेरित किया. यह फैक्ट्री आज भी वडनगर ब्लॉक में ठाकोर समुदाय के लोगों को रोजगार दे रही है. घर की घोर गरीबी, जिसमें मोदी की मां कुएं से पानी खींचने और बर्तन धोने का काम करती थीं और हर बर्तन के बदले एक आना कमाती थीं, ने उन्हें आगे चलकर पूर्णकालिक राष्ट्रीय सेवा के लिए खुद को समर्पित करने की दिशा में गहराई से प्रेरित किया.
डॉ. पारिख और RSS के निस्वार्थ सेवा के सिद्धांतों से प्रभावित होकर मोदी ने शादी न करने का फैसला किया. इसके बाद उन्होंने तीन साल तक एक साधु के रूप में पूरे भारत की यात्रा की, जिसमें वे पूरी तरह भिक्षा पर निर्भर रहे.
1971 में गुजरात लौटने के बाद उन्होंने अहमदाबाद के खाडिया RSS कार्यालय में काम शुरू किया. 1975 की इमरजेंसी के दौरान उन्होंने जेल में बंद विपक्षी नेताओं की सेवा की, अपनी पहली किताब 'संघर्ष मां गुजरात' लिखी और 1977 में मोरबी में आई बाढ़ के दौरान मिले सोने के सभी गहने पुलिस को सौंप दिए, जिससे उन्हें काफी सम्मान मिला.
अपने राजनीतिक सफर के दौरान मोदी ने सार्वजनिक जिम्मेदारियों और पारिवारिक मामलों के बीच हमेशा एक सख्त सीमा बनाए रखी. एक बार 1990 में उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री अशोक भट्ट को अपने बड़े भाई सोमाभाई का ट्रांसफर रद्द करने पर टोका भी था. भले ही आज उनके अपने शहर वडनगर में बड़े पैमाने पर विकास कार्य हो चुके हैं, लेकिन दौलत खान पठान की ये यादें मोदी के संघर्ष, दोस्ती, सेवा और शुरुआती जीवन की झलक दिखाती हैं.
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