- माता-पिता की संपत्ति हासिल करने के बाद बच्चों का व्यवहार बदल जाने के कई उदाहरण अलग-अलग जगहों से सामने आए.
- ऐसी स्थिति में माता-पिता के लिए उम्र के आखिरी पड़ाव में कई मुश्किलें खड़ी हो जाती है.
- ऐसे ही एक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुर्जुगों की देखभाल से जुड़े मामले में अहम टिप्पणी की है.
जिन बच्चों के लालन-पालन में माता-पिता कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते, वहीं बड़े होने के बाद बुढ़े माता-पिता की देखभाल से कन्नी काटने लगते हैं. इसके कई उदाहरण अलग-अलग जगहों से सामने आए हैं. माता-पिता की संपत्ति हासिल करने के बाद बच्चों की नजर में अपने ही अभिभावक खटकने लगते हैं. इस स्थिति में उम्र के आखिरी पड़ाव पर चल रहे मां-बाप के पास अपना जीवन जीना बड़ा मुश्किल हो जाता है. इस स्थिति से निपटने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि माता-पिता अपनी संपत्ति इस शर्त पर अपने बच्चों को देते हैं कि वे बुढ़ापे में उनकी देखभाल करेंगे, तो शर्त पूरी न होने पर वे उस संपत्ति को वापस हासिल कर सकते हैं.
परेल के एक फ्लैट पर कब्जे को लेकर माता-पिता व बच्चों में कानूनी लड़ाई
HT कीी एक रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार माता-पिता के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने पर भी लागू होता है. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड़ की खंडपीठ एक 42 वर्षीय लोअर परेल निवासी की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की. याचिका में उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उसे लोअर परेल स्थित फ्लैट का कब्जा अपने 68 वर्षीय पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था.
पिता जौहरी, बेटे को दी थी फ्लैट, अब वो देखभाल नहीं कर रहा
मामले के अनुसार, पिता एक जौहरी हैं. उन्होंने मार्च 2005 में यह फ्लैट खरीदा था, जहां वे अपनी पत्नी, बेटे और उसके परिवार के साथ रहते थे. 18 साल बाद, 8 मई 2023 को उन्होंने एक गिफ्ट डीड के जरिए यह फ्लैट अपने बेटे को इस शर्त पर उपहार में दे दिया कि बेटा उन्हें और उनकी 60 वर्षीय पत्नी को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएगा और उनकी देखभाल करेगा.
तंग आकर माता-पिता को 2025 में घर छोड़ना पड़ा
हालांकि, पिता का आरोप है कि समय के साथ उनके और बेटे के बीच संबंध खराब होते गए और स्थिति इतनी बिगड़ गई कि वर्ष 2025 में उन्हें और उनकी पत्नी को घर छोड़ना पड़ा. इसके बाद उन्होंने माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) का रुख किया.
ट्रिब्यूनल ने 60 दिनों में बेटे को फ्लैट खाली करने को कहा था
13 अप्रैल को ट्रिब्यूनल ने बेटे और उसके परिवार को 60 दिनों के भीतर फ्लैट खाली कर उसका कब्जा माता-पिता को सौंपने का आदेश दिया.
बेटे ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कई तर्क दिए. उसका कहना था कि उसके 68 वर्षीय पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनका अपना व्यवसाय है और उनके पास अन्य अचल संपत्तियां भी हैं. बेटे ने दलील दी कि, "माता-पिता न तो निर्धन हैं और न ही अपने भरण-पोषण में असमर्थ हैं."
हाई कोर्ट भी ट्रिब्यूनल के फैसले के साथ
लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 की धारा 23 के तहत यदि किसी संपत्ति का हस्तांतरण इस शर्त पर किया गया हो कि प्राप्तकर्ता बुजुर्ग माता-पिता को बुनियादी सुविधाएं और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा, और वह ऐसा करने में विफल रहता है या इससे इनकार करता है, तो ट्रिब्यूनल उस उपहार को निरस्त (शून्य) घोषित कर सकता है.
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