- राज्यसभा में विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए नोटिस दिया है
- नोटिस पर हस्ताक्षर कर राज्यसभा सभापति और उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन से अंतिम निर्णय की मांग की
- आरोपों में चुनाव आचार संहिता लागू करने में पक्षपात का आरोप लगाया गया है, खासकर प्रधानमंत्री के संबोधन को लेकर
बंगाल चुनाव का दूसरा और आखिरी चरण अभी बाकी है.29 अप्रैल को दूसरे चरण के चुनाव में 142 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे.उसके पहले विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ( CEC ) को पद से हटाने के लिए राज्यसभा में एक प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया है.इस नोटिस में विपक्ष ने एक बड़ी मांग रखी है. विपक्षी नेताओं के मुताबिक इस नोटिस पर राज्यसभा के 73 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं.अब इस नोटिस पर राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन को अंतिम फैसला करना है.एनडीटीवी के पास इस नोटिस की प्रति उपलब्ध है.
ज्ञानेश कुमार चुनाव से रहें दूर
राज्यसभा सचिवालय को जो नोटिस सौंपी गई है उसमें ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 9 बड़े आरोप लगाए गए हैं और मांग की गई है कि इन आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश की अध्यक्षता में जल्द से जल्द कमिटी बनाई जाए. नोटिस में एक और बड़ी मांग की गई है. इसमें राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन से आग्रह किया गया है कि वो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बंगाल और बाकी राज्यों में हो रहे चुनाव कार्य से तबतक दूर रहने को कहें, जबतक कमिटी उनपर लगे आरोपों की जांच कर अपनी रिपोर्ट ने दे दे. इतना ही नहीं,ये भी मांग की गई है कि जिन राज्यों में SIR की प्रक्रिया चल रही है उन राज्यों में भी चुनाव संबंधी कामों से उनको दूर रखा जाए.
क्या हैं वो 9 आरोप ?
पिछले महीने भी विपक्षी पार्टियों की तरफ़ से संसद के दोनों सदनों में ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने का ऐसा ही नोटिस दिया गया था, लेकिन उसमें दिए गए तर्कों और आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उसे स्वीकार नहीं किया गया था मगर विपक्ष की ओर से दावा किया जा रहा है कि इस बार दिए नोटिस में जो आरोप लगाए गए हैं वो ज्यादा पुख्ता और गंभीर हैं.नोटिस में विश्वास जताया गया है कि आरोपों के नए बिंदु संविधान में दिए गए प्रावधानों की कसौटी पर खड़े उतरेंगे.
इनमें एक आरोप ये भी है कि चुनाव में आचार संहिता को लागू करने के मामले में ज्ञानेश कुमार पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं और इसके लिए हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन का उदाहरण दिया गया है.विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री ने सरकारी साधन का उपयोग कर दिए गए अपने संबोधन में खुले आम विपक्षी पार्टियों पर आरोप लगाए जबकि बंगाल और तमिलनाडु में मतदान बाकी था.इसको लेकर विपक्षी पार्टियों की ओर से की गई शिकायत के बावजूद आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की गई.
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