- राज कुमार थापा ने पाकिस्तान की भारी गोलाबारी के बीच बिना सुरक्षा छोड़ने अपनी जिम्मेदारी निभाई
- थापा का आवास शेलिंग में आ गया, जिसमें उनकी मृत्यु हुई, पर वे ड्यूटी से कभी पीछे नहीं हटे
- उन्होंने पत्नी को मौत की संभावना जताई और परिवार को मजबूत रहने तथा डरने से मना किया
ऑपरेशन सिंदूर की पहली बरसी पर एक ऐसे अफसर की कहानी सामने आ रही है, जिसने बिना वर्दी और बिना हथियार के भी अपनी जिम्मेदारी से कभी पीछे हटने का नाम नहीं लिया. 54 वर्षीय राज कुमार थापा, जो राजौरी में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट कमिश्नर के पद पर तैनात थे, उन्होंने पाकिस्तान की ओर से हो रही भारी गोलाबारी के बीच भी अपनी पोस्ट नहीं छोड़ी उनकी पत्नी डॉ. मीनाक्षी कुंदन ने आखिरी बातचीत को याद करते हुए बताया कि थापा ने अपनी सुरक्षा से ज्यादा ड्यूटी को महत्व दिया. उनके अनुसार, “उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की और पाकिस्तान की तरफ से भारी शेलिंग के बावजूद अपने स्टेशन पर डटे रहे.”
मुश्किल वक्त में भी जिम्मेदारी से निभाया फर्ज
राज कुमार थापा जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे. राजौरी में तैनाती के दौरान क्रॉस बॉर्डर शेलिंग के बीच उनका आवास पाकिस्तानी गोले की चपेट में आ गया, जिसमें उनकी मौत हो गई. एनडीटीवी से बातचीत में उनकी पत्नी ने बताया कि आखिरी दिनों में हालात बिगड़ने के बावजूद थापा लगातार डटे रहे. उन्होंने बताया कि परिवार में एक मौत के बाद जब हालात खराब हुए तो फोन पर बातचीत होती थी और वो कहते थे कि “माहौल बिगड़ा जरूर है लेकिन सब काबू में है.” कई बार कॉल करने पर वे मीटिंग में व्यस्त होने की बात बताते थे.
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जब मुझसे कहा एक दिन सबको जाना है...
एक दिन रात साढ़े नौ बजे उन्होंने फोन कर गंभीर चेतावनी दी थी कि भारी शेलिंग होने वाली है. उन्होंने कहा था कि “इस शेलिंग से कुछ भी हो सकता है, आपको घबराना नहीं है… मौत का कोई भरोसा नहीं होता, एक दिन सबको जाना है.” उन्होंने पत्नी से कहा था कि अगर कुछ हो जाए तो मजबूत रहना, बच्चों को संभालना और किसी से डरना नहीं. जब पत्नी ने उनसे वहां से हटने को कहा, तो थापा ने साफ मना कर दिया. उन्होंने कहा कि लोग मुसीबत में हैं और वह अपनी टीम के साथ काम कर रहे हैं. “अगर मैं यहां नहीं रहूंगा तो लोगों का भरोसा उठ जाएगा,” यह उनके आखिरी शब्दों में शामिल था.
लोगों ने कहा हमने उनसा अफसर नहीं देखा
पत्नी बताती हैं कि इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपना फर्ज निभाना जरूरी समझा. परिवार के लिए यह बड़ा झटका था, क्योंकि वही पूरे घर को संभालते थे और हर मुश्किल में साथ खड़े रहते थे. कश्मीर में बाढ़ के समय भी उन्होंने जिम्मेदारी निभाई थी. उनके निधन के बाद जब लोग मिलने आए तो हर किसी ने उनकी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की तारीफ की. लोगों का कहना था कि उन्होंने उनके जैसा अफसर पहले कभी नहीं देखा. आखिरी समय में जब पत्नी ने उन्हें फोन किया तो कॉल नहीं उठा और मैसेज का भी जवाब नहीं आया. बाद में किसी और ने फोन उठाया, तब उन्हें लगा कि शायद कुछ बड़ा हो गया है और लोग सुरक्षित जगहों पर जा रहे हैं.
ऑपरेशन सिंदूर की यह बरसी उस खामोश सेवा और समर्पण की याद दिलाती है, जिसने बिना किसी दिखावे के अपने कर्तव्य को सबसे ऊपर रखा. पत्नी ने अंत में कहा कि ऐसे संघर्षों में अक्सर मासूम लोग ही जान गंवाते हैं और यह पाकिस्तान की कायरता को दर्शाता है.
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