अमृतसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार की 42वीं बरसी शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गई. हालांकि, अकाल तख्त के बाहर कुछ कट्टरपंथी संगठनों के समर्थकों ने खालिस्तान समर्थक नारे लगाए गए, जिसने एक बार फिर यह दिखाया कि जून 1984 की घटनाएं आज भी पंजाब के एक वर्ग की भावनाओं से जुड़ी हुई हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ऑपरेशन ब्लू स्टार अब भी पंजाब की चुनावी राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है?
पिछले कुछ सालों में पंजाब में पंथक राजनीति को लेकर चर्चा जरूर बढ़ी है. संगरूर लोकसभा उपचुनाव में सिमरनजीत सिंह मान की जीत और खडूर साहिब से अमृतपाल सिंह का सांसद चुना जाना इस बात का संकेत था कि कट्टरपंथी विचारधारा से जुड़े चेहरों को सीमित स्तर पर जनसमर्थन मिल सकता है. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन जीतों को केवल खालिस्तान या 1984 के मुद्दे से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. स्थानीय मुद्दे, मुख्यधारा की पार्टियों के प्रति नाराजगी और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि भी अहम कारण रहे.
ऑपरेशन ब्लू स्टारः कितना बड़ा मुद्दा?
वास्तविकता यह है कि पिछले कई विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पंजाब के मतदाताओं ने बेरोजगारी, नशे की समस्या, किसानों के मुद्दे, पलायन और सुशासन जैसे विषयों को अधिक महत्व दिया है. यही कारण है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार की भावनात्मक विरासत के बावजूद यह मुद्दा चुनावी नतीजों को बड़े स्तर पर प्रभावित नहीं कर पाया.
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क्या 2027 के चुनाव में बनेगा मुद्दा?
हालांकि, 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले पंथक राजनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ सकती है. अमृतपाल सिंह के जेल में होने से कट्टरपंथी राजनीति के क्षेत्र में एक खाली जगह बनी है, जिसे भरने की कोशिश विभिन्न संगठन और राजनीतिक दल कर सकते हैं. वहीं, शिरोमणि अकाली दल भी अपने पारंपरिक पंथक वोट बैंक को वापस हासिल करने के लिए धार्मिक और पहचान आधारित राजनीति पर अधिक जोर दे सकता है.
इसके साथ ही राज्य में हाल के महीनों में सामने आई कुछ आतंकी घटनाओं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने भी इस बहस को फिर से हवा दी है. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या राजनीतिक दल चुनावों के करीब आते-आते पंथक मुद्दों को प्रमुखता देंगे.
2027 में क्या होगा?
फिलहाल संकेत यही हैं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार पंजाब की सामूहिक स्मृति का अहम हिस्सा जरूर है, लेकिन मतदाता अब ऐतिहासिक भावनाओं और वर्तमान राजनीतिक जरूरतों के बीच फर्क करना सीख चुके हैं. आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि पंजाब की राजनीति फिर से पंथक मुद्दों की ओर लौटती है या विकास और शासन के सवाल ही निर्णायक बने रहते हैं.
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