विज्ञापन

तेल को बना हथियार ईरान ने चली होर्मुज की चाल, दुनिया में मचा हड़कंप, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी बड़ा खतरा

ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद किए बगैर ही वैश्विक तेल सप्लाई को पूरी तरह प्रभावित कर दिया. भारत जैसे देशों के लिए यह चेतावनी है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए तेल-गैस में निवेश और वैश्विक गठबंधन बढ़ाना जरूरी है.

तेल को बना हथियार ईरान ने चली होर्मुज की चाल, दुनिया में मचा हड़कंप, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी बड़ा खतरा
  • ईरान की होर्मुज की एक चाल ने दुनिया को तेल के संकट में डाल दिया.
  • भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल- क्या हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए तैयार हैं?
  • तेल-गैस में निवेश बढ़ाए बिना भारत की आर्थिक और सैन्य ताकत सुरक्षित नहीं हो सकती.
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।

दुनिया में तेल की कोई कमी नहीं है. सच तो यह है कि बड़े तेल उत्पादक देशों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि मांग उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही जितनी वे चाहते हैं. फिर भी दुनिया आज एक गंभीर तेल संकट की गिरफ्त में आ गई है. कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और पर्शियन गल्फ क्षेत्र से गुजरने वाली करीब 20 प्रतिशत तेल सप्लाई बाधित हो चुकी है. आखिर इसकी वजह क्या है? इसका जवाब है कि तेल को हथियार बना दिया गया है.

सबसे पहले पश्चिमी देशों ने यूक्रेन पर हमले के लिए मॉस्को को सजा देने के नाम पर रूस के तेल और गैस पर प्रतिबंध लगाए. और अब ईरान ने तेल और LNG को सबसे नाटकीय और विनाशकारी तरीके से हथियार बना दिया है. ईरान ने गल्फ में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया है. यह वही समुद्री रास्ता है जो वैश्विक तेल आपूर्ति व्यवस्था और पूरी विश्व अर्थव्यवस्था की सबसे अहम नस माना जाता है. दुनिया के लिए यह किसी झटके से कम नहीं है. दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात करने वाले देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा का मतलब तेल की सप्लाई को सुरक्षित रखना है. वहीं तेल निर्यात करने वाले देशों के लिए भी यह संकट है, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था ज्यादातर मामलों में तेल की मांग पर ही टिकी होती है.

ईरान इस जियो-एनर्जी गणित को अच्छी तरह समझता है. वह अमेरिका और इजरायल की सैन्य ताकत का मुकाबला नहीं कर सकता. इसलिए उसने इतिहास में पहली बार यह कदम उठाया. ईरान ने सिर्फ चेतावनी दी कि जो भी तेल या गैस का टैंकर होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरने की हिम्मत करेगा, वो उस पर हमला कर देगा. उसकी यह रणनीति काम कर गई. इस तरह उसने होर्मुज को औपचारिक रूप से बंद किए बिना ही बंद कर दिया. लेकिन इस खतरनाक और हाई-वोल्टेज भू-राजनीतिक खेल के पीछे असली एजेंडा क्या है?

ये भी पढ़ें: तेल का महीनों का स्टॉक, लेकिन गैस क्यों नहीं? LPG-LNG के गणित को आसान भाषा में समझिए

अमेरिका क्या चाहता है?

साफ तौर पर देखा जाए तो अमेरिका चाहता है कि उसकी दीर्घकालिक रणनीति में ईरान रास्ते से हट जाए, ताकि इजरायल पूरे तेल-गैस समृद्ध मध्य पूर्व क्षेत्र में अपनी प्रधान शक्ति (हेजेमन) के रूप में स्थापित हो सके. दूसरा, अमेरिका इस इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव और उसके विशाल आर्थिक निवेश को खत्म करना चाहता है, खासकर ईरान में. वह ये भी चाहता है कि ईरान के विशाल तेल और गैस भंडार पश्चिमी कंपनियों के लिए उनकी शर्तों पर उपलब्ध हों. और अंत में, अमेरिका कि यह भी मंशा है कि शिया बहुल ईरान उसके हाथ में एक मोहरे की तरह काम करे, ताकि क्षेत्र की सुन्नी ताकतों, खासकर सऊदी अरब के प्रभाव को संतुलित किया जा सके. स्वाभाविक है कि यह सब ईरान को स्वीकार नहीं है.

जीवाश्म आधारित ईंधन पर निर्भरता

ईरान एक पुरानी सभ्यता है और खुद को एक बड़ी ताकत के रूप में देखता है. भले ही आज वह साम्राज्यवादी शक्ति न हो, लेकिन सायरस द ग्रेट के दौर में वह ऐसा रहा है. यह जियो-पॉलिटिकल युद्ध काफी लंबे समय तक चलता रहेगा, भले ही कुछ समय के लिए बंदूकें खामोश क्यों न हो जाएं.
आज भी कोयला, तेल और गैस मिलकर दुनिया की कुल ऊर्जा खपत का करीब 81 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं, जबकि अक्षय ऊर्जा खासकर सौर ऊर्जा में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. तेल अभी भी ऊर्जा का राजा बना रहेगा. शायद अगले 20 साल या उससे भी अधिक समय तक. दुनिया अभी भी फॉसिल फ्यूल यानी जीवाश्म पर आधारित ईंधन की अर्थव्यवस्था है. भारत में यह स्थिति और भी गहन है.

ट्रंप 2.0 इसे अच्छी तरह समझता है. पिछले साल अपने शपथ ग्रहण के दिन उसका नारा Drill, Baby, Drill सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि एक नई ऊर्जा नीति की घोषणा थी. सबसे पहले वेनेजुएला इसका शिकार बना. अब ट्रंप 2.0 की नजर ईरान पर है. कोलंबिया को भी सतर्क रहना चाहिए.

ये भी पढ़ें: भारत में क्या है तेल का पूरा गणित? 1 डॉलर बढ़ा तो कितना महंगा होगा पेट्रोल-डीजल, कैसे तय होते हैं दाम

Latest and Breaking News on NDTV

Photo Credit: NDTV

भारत का क्या होगा?

ऐसे में भारत का क्या होगा यह भी सवाल उठता है क्योंकि भारत भी कई अन्य देशों की तरह ही तेल आधारित अर्यव्यवस्था है. भारत पूरी तरह से तेल आधारित अर्थव्यवस्था है. हमारी आयात पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है. हम रोज करीब 5.7 मिलियन बैरल तेल खपत करते हैं, जिसमें से 5.2 मिलियन बैरल हमें आयात करना पड़ता है. इसका बड़ा हिस्सा सऊदी अरब, इराक, अबू धाबी और कुवैत जैसे पर्शियन गल्फ देशों से आता है.
अगर हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती रही, तो यह आयात बढ़कर 8 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है. और अगर भारत की GDP वृद्धि दर 10 प्रतिशत जैसी दो अंकों की रफ्तार पकड़ लेती है, तो हमें इससे भी ज्यादा तेल आयात करना पड़ सकता है. इसलिए भारत को 2050 और उसके बाद के लिए एक व्यावहारिक और ईमानदार ऊर्जा सुरक्षा नीति बनानी होगी.

भविष्य की ऊर्जा

भविष्य निश्चित रूप से अक्षय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा का है. लेकिन अगले तीन दशकों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए हमें देश और विदेश में हाइड्रोकार्बन यानी तेल-गैस में ज्यादा आक्रामक निवेश करना होगा. अगर हम तेल और गैस की कीमत पर सिर्फ अक्षय ऊर्जा या हाइड्रोजन को प्राथमिकता देंगे, तो यह ऊर्जा आत्महत्या के  बराबर होगा. सच्चाई यह है कि पिछले 20 सालों में हमने तेल और गैस क्षेत्र की अनदेखी की है. हममें से कई लोग पश्चिम की उस सोच से प्रभावित हो गए थे जिसमें कहा गया कि तेल को बुरा बताओ और ग्रीन एनर्जी को प्राथमिकता दो. बेशक हमें ग्रीन एनर्जी को प्राथमिकता देनी चाहिए, लेकिन तेल और गैस की कीमत पर नहीं.आज भी हर घर में खाना गैस चूल्हे पर बनता है. ज्यादातर गाड़ियां अभी भी तेल या गैस से चलती हैं. और हवाई जहाज, पानी के जहाज आने वाले दशकों तक तेल से ही चलेंगे.

उम्मीद है कि यह युद्ध जल्द खत्म होगा. जैसे ही बंदूकें खामोश होंगी, होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकर फिर से गुजरने लगेंगे. लेकिन भारत के लिए यह युद्ध एक बड़ा सबक छोड़ जाएगा. हमें तेल और गैस पर ज्यादा ध्यान देना होगा. देश में तेल और गैस की खोज और उत्पादन में निवेश बढ़ाना होगा. और उससे भी ज्यादा जरूरी है कि भारतीय तेल कंपनियां विदेशों में जाकर निवेश बढ़ाएं. खासकर पश्चिम अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, अमेरिका और कनाडा, मध्य पूर्व और रूस जैसे ऊर्जा समृद्ध क्षेत्रों में. और ईरान को भी मत भूलिए, जो भौगोलिक रूप से हमारे सबसे करीब एक बड़ा तेल-गैस महाशक्ति है. भारत को तेल और गैस के मजबूत और टिकाऊ गठबंधन बनाने होंगे. वैसे ही जैसे सैन्य गठबंधन बनाए जाते हैं, जैसे NATO या कभी वारसा पैक्ट हुआ करता था.

 हमें याद रखना चाहिए कि दुनिया की कोई भी बड़ी उभरती अर्थव्यवस्था, भारत जितना तेल आयात पर निर्भर नहीं है. ऐसे में जब तक हम तेल और गैस के मामले में खुद को सुरक्षित नहीं करेंगे, तब तक हम आर्थिक और सैन्य रूप से भारत को सुरक्षित नहीं बना सकते. इसलिए तेल और गैस सुरक्षा सबसे पहले आनी चाहिए.

नरेंद्र तनेजा ऊर्जा नीति और भू-राजनीति के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित विचारक हैं.

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com