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This Article is From Apr 04, 2026

‘हिंदी थोपने’ के आरोप बेबुनियाद... राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर तमिलनाडु सरकार को केंद्र का जवाब

केंद्र ने कहा है कि NEP को “भाषा थोपने” के रूप में पेश करना भ्रम फैलाने की कोशिश है और यह भारत की भाषाई विविधता के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है.

‘हिंदी थोपने’ के आरोप बेबुनियाद... राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर तमिलनाडु सरकार को केंद्र का जवाब
‘तीन भाषा नीति’ और हिंदी थोपने के आरोप पर घमासान
  • तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने केंद्र सरकार की तीन भाषा नीति को राज्यों के अधिकारों पर हमला बताया
  • केंद्र का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति मातृभाषा को प्राथमिकता देती है और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देती है
  • केंद्र ने तमिलनाडु सरकार पर वोट‑बैंक राजनीति के लिए छात्रों को राष्ट्रीय अवसरों से वंचित करने का आरोप लगाया है

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को एक पत्र लिखते हुए केंद्र सरकार की ‘तीन भाषा नीति' पर गंभीर सवाल उठाए हैं. स्टालिन ने इसे राज्यों के अधिकारों और भारत की भाषाई विविधता पर हमला बताया है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के बयानों पर केंद्र की ओर से कड़ा जवाब दिया गया है. केंद्र का दावा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति वास्तव में मातृभाषा को प्राथमिकता देती है और इसका उद्देश्य तमिलनाडु समेत हर राज्य के बच्चों को अपनी भाषा में बेहतर शिक्षा का अवसर देना है.

NEP 2020 में मातृभाषा को प्राथमिकता का दावा

एक बयान में कहा गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषा को शिक्षा का आधार मानती है, जिससे तमिलनाडु के बच्चे अपनी भाषा में उत्कृष्टता हासिल कर सकें. इसमें यह भी कहा गया है कि इस नीति को “अनिवार्य हिंदी” के रूप में पेश करना न केवल गलत है, बल्कि इससे युवाओं के वैश्विक अवसरों के रास्ते बंद किए जा रहे हैं. केंद्र का तर्क है कि बहुभाषी शिक्षा से तमिल कमजोर नहीं होती, बल्कि उसके बोलने वाले और अधिक आत्मविश्वासी व सक्षम बनते हैं.

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बहुभाषावाद को खतरे के रूप में दिखाने पर आपत्ति

केंद्र ने कहा है कि बहुभाषी अवसरों को खतरे के तौर पर दिखाना भ्रामकता है. बयान के अनुसार, अतिरिक्त भाषाएं सीखना तमिल की ताकत को कम नहीं करता, बल्कि उसे और मजबूत करता है. असल में इस नीति का उद्देश्य सभी भाषाओं को समान रूप से बढ़ावा देना है और मौजूदा दो‑भाषा प्रणाली की सीमाओं को दूर करना है. इसमें समग्र शिक्षा अभियान, शिक्षक प्रशिक्षण और DIET जैसे संस्थानों को राष्ट्रीय ढांचे के तहत मजबूत करने की बात कही गई है.

‘पारस्परिकता' पर सवालों को बताया जमीनी हकीकत से दूर

मुख्यमंत्री द्वारा उठाए गए “reciprocity” के सवालों को केंद्र ने जमीनी सच्चाई से दूर बताया है. बयान में कहा गया है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में तमिल भाषा को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सम्मान दिया गया है, चाहे वह काशी तमिल संगम हो या अंतरराष्ट्रीय मंच. वहीं आरोप लगाया गया है कि तमिलनाडु सरकार वोट‑बैंक राजनीति के लिए छात्रों को कई राष्ट्रीय अवसरों से वंचित कर रही है.

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संसाधनों पर सवाल और PM SHRI स्कूलों का मुद्दा

बयान में कहा गया है कि संसाधनों की कमी की बात सिर्फ बयानबाज़ी है. आरोप लगाया गया है कि तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने आश्वासन देने के बावजूद PM SHRI स्कूलों के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर नहीं किए, जिससे इस योजना को राज्य में रोका गया. इसे छात्रों के हितों के खिलाफ बताया गया है.

नवोदय विद्यालयों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला

केंद्र ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद तमिलनाडु में नवोदय विद्यालयों की स्थापना में बाधा डाली जा रही है. बयान के मुताबिक, यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उन लाखों वंचित छात्रों को नुकसान पहुंचाना है जो आवासीय, गुणवत्तापूर्ण और मेरिट‑आधारित शिक्षा से लाभान्वित हो सकते थे. आरोप है कि इससे आधुनिक ढांचा और प्रशिक्षित शिक्षक छात्रों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं.

‘भाषा थोपने' का आरोप बताया भ्रामक

केंद्र ने कहा है कि एक समावेशी और प्रगतिशील सुधार को “भाषाई थोपने” के रूप में पेश करना डर और भ्रम फैलाने का प्रयास है। बयान में दावा किया गया है कि असली समस्या नीति की अस्पष्टता नहीं, बल्कि उसे अपनाने की राजनीतिक अनिच्छा है। केंद्र का कहना है कि इससे भारत की भाषाई विविधता को संरक्षित करने के संवैधानिक मूल्यों से मुंह मोड़ा जा रहा है।

सभी भारतीय भाषाओं को सशक्त करने की अपील

आखिर में बयान में मुख्यमंत्री से अपील की गई है कि “हिंदी थोपने” के नैरेटिव का इस्तेमाल कर प्रशासनिक विफलताओं को ढकने के बजाय राष्ट्रीय प्रयासों में शामिल हों. केंद्र ने कहा है कि लक्ष्य हर भारतीय भाषा को सशक्त करना है और इसके लिए सहयोग जरूरी है.

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