CBSE 3 Language formula : भारत जैसे विविधताओं वाले देश में हमेशा से ही एजुकेशन सिस्टम चर्चा का केंद्र रही है. इसमें भी 'थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला' (Three Language Formula) एक ऐसा विषय है, जिस पर दशकों से बहस चल रही है. नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के लागू होने के बाद, यह चर्चा फिर से तेज हो गई है. आखिर यह फॉर्मूला क्या है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं पूर्व NCERT निदेशक जे.एस. राजपूत से.
NEP 2020: मजबूरी नहीं, लचीलापन
थ्री लैंग्वेज फॉर्मूले को लेकर सबसे बड़ा डर अक्सर यह रहता है कि क्या सरकार बच्चों पर हिंदी या कोई खास भाषा थोप रही है? पूर्व NCERT निदेशक जे.एस. राजपूत स्पष्ट करते हैं कि NEP 2020 में किसी भी भाषा को अनिवार्य रूप से थोपने का कोई प्रावधान नहीं है.
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राजपूत के अनुसार, "नीति में यह कहीं नहीं लिखा है कि बच्चे को हिंदी ही पढ़नी है या अंग्रेजी ही पढ़नी है. यह पूरी तरह से राज्य, क्षेत्र और माता-पिता के विवेक पर छोड़ दिया गया है." यानी अगर कोई राज्य या क्षेत्र हिंदी नहीं पढ़ना चाहता, तो कोई भी उन्हें मजबूर नहीं कर सकता. वर्तमान विवादों को वे अक्सर नीति से ज्यादा 'राजनीतिक नैरेटिव' का हिस्सा मानते हैं.
Former NCERT Director, in an exclusive interview with NDTV's @TanushkaDutta , speaks on the three-language policy under National Education Policy (NEP) 2020. pic.twitter.com/EhVfR8kmvc
— NDTV Education (@ndtveducation) April 17, 2026
हकीकत का अंतर
थ्री लैंग्वेज फॉर्मूले का मूल मकसद था कि उत्तर भारत का बच्चा दक्षिण की कोई भाषा (जैसे तमिल, कन्नड़ या मलयालम) सीखे और दक्षिण का बच्चा उत्तर की कोई भाषा सीखे. इससे एक-दूसरे की संस्कृति के प्रति सम्मान और जिज्ञासा बढ़ती.
हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि कई राज्यों ने इसे औपचारिकता बना दिया है. उत्तर भारत के कई स्कूलों में इसे पूरा करने के लिए हिंदी, अंग्रेजी के साथ संस्कृत का एक छोटा सा पाठ्यक्रम जोड़ दिया जाता है. यह नीति की उस भावना के खिलाफ है, जिसमें देश की विशाल भाषाई विविधता और समृद्ध साहित्य से छात्रों को रूबरू कराना था.
क्यों चुनौतियां हैं बरकरार?
थ्री लैंग्वेज फॉर्मूले की विफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण है इसके इम्प्लीमेंटेशन में कमी. जे.एस. राजपूत का मानना है कि शिक्षा नीति को लागू करने का 95 प्रतिशत दायित्व राज्य सरकारों का है, और कई बार राज्य इसे गंभीरता से नहीं लेते.
शिक्षकों की कमी और भर्ती में देरीकिसी भी भाषा को सिखाने के लिए योग्य शिक्षकों की जरूरत होती है. राज्यों में शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं. जब बुनियादी विषयों के लिए ही शिक्षक नहीं हैं, तो तीसरी भाषा कैसे पढ़ाई जाएगी?
पढ़ाने के अलावा अन्य कामसरकारी स्कूलों के शिक्षकों को अक्सर चुनावी ड्यूटी या अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगा दिया जाता है. इससे कक्षा में पढ़ाई का समय कम हो जाता है.
इंटर-स्टेट सहयोग की कमीNEP 2020 में राज्यों के बीच शिक्षक आदान-प्रदान (Teacher Exchange) के लिए MoU (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) का सुझाव दिया गया था, लेकिन यह अभी भी कागजों तक ही सीमित है.
क्या है थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला?
वीदित हो कि थ्री लैंग्वेज फॉर्मूला की शुरुआत पहली बार 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हुई थी, जिसे कोठारी आयोग की सिफारिशों पर तैयार किया गया था. इसका मूल उद्देश्य बहुत सरल लेकिन गहरा था-
विद्यार्थियों को भाषा सीखने के माध्यम से राष्ट्रीय एकता, संज्ञानात्मक विकास (cognitive development) और सांस्कृतिक समझ से जोड़ना.
सरल शब्दों में, इसके तहत स्कूलों में छात्रों को तीन भाषाएं सिखाई जानी चाहिए. इसमें आमतौर पर- मातृभाषा या घर की भाषा और दो अन्य आधुनिक भारतीय भाषाएं या अंग्रेजी. NEP 2020 ने भी इस ढांचे को बरकरार रखा है, लेकिन इसमें पहले की तुलना में लचीलापन (flexibility) अधिक है.
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