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13 साल में कमाल, 182 से महज 2 जिले में सिमटे नक्सली, जानिए शुरुआत से खात्मे तक की कहानी

नक्‍सलवाद का खात्‍मा अब भारत से हो गया है. भारत में 2013 के 182 नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घटकर अब केवल छत्तीसगढ़ के बीजपुर और सुकमा तक सीमित रह गई है. गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि नक्सलवाद गरीबी से नहीं, वैचारिक कारणों से फैला था और सरकार सभी के साथ न्याय करेगी.

13 साल में कमाल, 182 से महज 2 जिले में सिमटे नक्सली, जानिए शुरुआत से खात्मे तक की कहानी
  • भारत में वर्ष 2013 में 182 जिले नक्सल प्रभावित थे, जो अब केवल दो जिलों तक सीमित रह गए हैं
  • छत्तीसगढ़ के बीजपुर और सुकमा जिले अभी भी नक्सल प्रभावित हैं, जहां बड़े नक्सली हमले हुए हैं
  • नक्सलवाद की शुरुआत 1976 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी, जो एक सशस्त्र विद्रोह था
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नई दिल्‍ली:

भारत से अब 'लाल आतंक' का लगभग खात्‍मा हो गया है. साल 2013 में भारत के 182 जिले नक्‍सल से प्रभावित थे और 30 मार्च 2026 तक ये सिर्फ 2 जिले तक सिमट कर रह गया है. ये जिले हैं, छत्‍तीसगढ़ के बीजपुर और सुकमा. भारत के एक दशक भर के कड़े प्रयासों ने नक्‍सल प्रभावित जिलों में 99% की कमी की है. मोदी सरकार की ये एक बड़ी उपलब्धि है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश में नक्सलवाद पनपने के लिए कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा को जिम्मेदार ठहराते हुए लोकसभा में कहा कि देश अब नक्सल मुक्त हो गया है.

सुकमा और बीजापुर के बड़े नक्‍सली हमले 

छत्‍तसीगढ़ के सुकमा और बीजापुर जिले लंबे समय से नक्‍सल प्रभावित रहे हैं. इन जिलों में कई बड़े नक्‍सली हमले हुए. साल 2017 में सुकमा में नक्सलियों ने सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगे सीआरपीएफ के जवानों पर हमला किया था, जिसमें 25 जवान शहीद हो गए थे. इन इलाकों में नक्‍सली विकास कार्यों को रोकना चाहते थे, जहां सरकार पहुंच बनाने की कोशिश कर रही थी. वहीं, साल 2021 में बाजीपुर और सुकमा सीमा पर नक्सलियों ने सुरक्षा बलों को घेरकर बड़ा हमला किया था. इस हमले में 22 जवान शहीद हो गए थे. 

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इतिहास के पन्‍नों दर्ज नक्‍सली

भारत में नक्सलवाद की शुरुआत साल 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के 'नक्सलबाड़ी गांव' से हुई थी. यह आंदोलन भूमिहीन किसानों और आदिवासियों द्वारा जमींदारों के खिलाफ शुरू किया गया एक सशस्त्र विद्रोह था, लेकिन बाद में माओवादी विचारधारा से प्रेरित होकर पूरे देश में फैल गया. इसके बाद नक्‍सलियों ने दशकों तक जो कत्‍लेआम किया, वो इतिहास के पन्‍नों में हमेशा दर्ज रहेगा. कुछ दशकों पहले यह कल्‍पना करना भी मुश्किल लगता था कि देश से नक्‍सलवाद का अंत हो सकता है. लेकिन मोदी सरकार ने इस नामुमकिन लगने वाले काम को भी कर दिखाया. 

नक्‍सल प्रभावित जिलों में 20,000 करोड़ रुपये खर्च

लोकसभा में ‘देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त करने के प्रयास' विषय पर हुई चर्चा के दौरान अमित शाह बताया कि कैसे देश में नक्‍सलवाद पनपा और फिर कैसे पिछले 12 सालों के दौरान इसे खत्‍म करने के लिए क्‍या-क्‍या कदम उठाए गए. अमित शाह ने बताया, साल 2014 में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित 126 जिलों में अब केवल दो ही ऐसे जिले बचे हैं, जिनमें कुछ नक्‍सली बचे हैं. ये भी कुछ दिनों में सरेंडर कर देंगे. 2014 में 35 जिलों की तुलना में अब देश में कोई भी 'सबसे अधिक प्रभावित वामपंथी उग्रवाद जिला' नहीं बचा है. अमित शाह ने बताया कि वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों में सड़क, बैंक, एटीएम, डाकघर जैसी सुविधाओं के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपये खर्च किये गए. 

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ये डरने वाली सरकार नहीं

लोक सभा में नियम 193 के तहत वामपंथी उग्रवाद के खात्मे से जुड़ी चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री ने कहा कि 1947 से पहले इस देश के ट्राइबल्स बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, रानी दुर्गावती, और मुर्मु बंधुओं को अपना आदर्श मानते थे. वहीं, आदिवासी 1970 आते-आते माओ को अपना हीरो मानने लगे. ये परिवर्तन क्यों हुआ? उन्होंने कहा कि ये परिवर्तन विकास की कमी या अन्याय के कारण नहीं हुआ. कठिन भूगोल और स्टेट की अनुपस्थिति के कारण अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए वामपंथियों ने इसी क्षेत्र को चुना, भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाया. नक्सलवाद गरीबी के कारण नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद के कारण इन पूरे क्षेत्र में सालों तक गरीबी रही. नक्सलवाद की जड़ें गरीबी और विकास से जुड़ी नहीं है, वो वैचारिक है. उन्होंने कहा कि हम लोकतंत्र में हैं, हमने इस देश के संविधान को स्वीकार किया है. अन्याय किसी के साथ भी हो सकता है, विकास कहीं पर भी कम ज्यादा हो सकता है. मैं पूछना चाहता हूं कि आप अपनी लड़ाई संवैधानिक तरीकों से लड़ेंगे या हाथ में हथियार लेकर निर्दोषों को मार डालेंगे. किस थ्योरी का यहां से समर्थन हो रहा था. अगर आप धमकाना चाहते हैं कि ये होगा तो ये भी हथियार उठाएंगे, वो होगा तो वो भी हथियार उठाएंगे. लेकिन कान खोलकर सुन लीजिए... ये डरने वाली सरकार नहीं है, सभी के साथ न्याय करने वाली सरकार है.

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