भारतीय राजनीति में गुरुवार को एक तरह का अजीब घटनाक्रम देखने को मिला. बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद से कहा,''आप पार्टी से बाहर हैं, क्योंकि आपने ने एक्स पर मेरी पोस्ट को 'रीपोस्ट' नहीं किया और उनके ससुर ने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा करने में देर कर दी.'' संक्षेप में कहें तो बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से 'आजाद' कर दिया.
'बुआ-भतीजा-दामाद-ससुर' वाला यह पारिवारिक विवाद सुनने में किसी फिल्मी कहानी जैसा लग सकता है. लेकिन जिस पार्टी ने राजनीति में बड़ी ऊंचाइयां हासिल की हैं, उसमें इस तरह खुले तौर पर नाराजगी और कार्रवाई का सामने आना पार्टी के लिए अच्छा संकेत नहीं है. हालांकि, इस पूरे विवाद के पीछे बसपा पर नियंत्रण को लेकर एक गंभीर संघर्ष दिखाई देता है. यह संघर्ष उत्तर प्रदेश की कभी बेहद प्रभावशाली रही एक राजनीतिक पार्टी के भविष्य के लिए भी खतरा बन सकता है.
दामाद का निष्कासन और ससुर का संन्यास
आकाश आनंद को बसपा से बाहर करने का फैसला मायावती की गुरुवार को एक्स पर की गई नाराजगी भरी पोस्ट के जरिए सामने आया. मायावती ने लिखा कि आकाश अपने ससुर से ज्यादा जुड़े हुए हैं. उन्होंने मेरी पोस्ट तक रीपोस्ट नहीं की. अगर वह पार्टी में स्वतंत्र रूप से काम करना चाहते हैं, तो वो पूरी तरह स्वतंत्र हैं.
मायावती बसपा से निकाले जा चुके पूर्व राष्ट्रीय समन्वयक और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ से काफी नाराज हैं. अशोक आकाश के ससुर हैं.
मायावती ने नौ सितंबर को एक्स पर किए एक पोस्ट में अशोक सिद्धार्थ के संन्यास या राजनीति से संन्यास लेने को आकाश आनंद की पार्टी में सक्रिय भूमिका में वापसी से जोड़ दिया था. अपनी पार्टी की नेता की बात को मानते हुए अशोक ने 24 घंटे के भीतर राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी. लेकिन तब तक मायावती फैसला कर चुकी थीं, ''बहुत देर हो गई, आकाश बाहर हैं.''
अशोक सिद्धार्थ ने एक समय सरकारी नौकरी छोड़कर बसपा के संस्थापक और मायावती के राजनीतिक गुरु कांशीराम की ओर से गठित बामसेफ के नाम से मशहूर बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज इंप्लाइज फेडरेशन (BAMCEF) में कार्यकर्ता के रूप में काम शुरू किया था.

बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को कई बार पार्टी में उनके पद से हटाया और बिठाया है.
इसी दौरान उनकी दोस्ती मायावती के भाई आनंद कुमार से हुई. बाद में जब वह बसपा में शामिल हुए तो मायावती ने उन्हें उत्तर प्रदेश विधान परिषद भेजा और फिर राज्यसभा भी भेजा. उस समय सब कुछ ठीक चल रहा था. अशोक सिद्धार्थ, मायावती के भतीजे आकाश आनंद के साथ बसपा के राष्ट्रीय समन्वयक थे.
आकाश आनंद की शादी 26 मार्च 2023 को गुरुग्राम में अशोक सिद्धार्थ की बेटी डॉ. प्रज्ञा सिद्धार्थ से हुई थी. मायावती इस शादी में खास मौकों पर पहने जाने वाले अपने गुलाबी रंग के कपड़ों में नजर आईं और उन्होंने नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद दिया. इसके नौ महीने बाद मायावती ने आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. लेकिन 10 दिसंबर 2023 को हुए इस राजनीतिक 'ताजपोशी' के बाद रिश्तों में तेजी से गिरावट आने लगी.
आखिरकार यही 'पारिवारिक रिश्ता' आकाश आनंद के लिए भारी पड़ गया. साल 2024 से 2026 के बीच मायावती ने आकाश के खिलाफ सार्वजनिक रूप से पांच बार कार्रवाई की.
- मई 2024 में उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक के पद से हटा दिया गया और मायावती के उत्तराधिकारी का दर्जा भी उनसे छीन लिया गया.
-मार्च 2025 में उन्हें फिर पद से हटाया गया और पार्टी से बाहर कर दिया गया.
-तीन सितंबर को उन्हें राष्ट्रीय संयोजक के पद से हटा दिया गया.
-10 सितंबर को उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया.
आकाश से रिश्ते की वजह से अशोक सिद्धार्थ को भी बसपा में दो बार कार्रवाई का सामना करना पड़ा.
आकाश का बसपा से ताजा निष्कासन
तीन सितंबर को लखनऊ के मॉल एवेन्यू स्थित बसपा मुख्यालय में हुई पार्टी बैठक में मायावती ने आकाश को नहीं बुलाया. इसी बैठक में उन्होंने आकाश को पद से हटाने का ऐलान किया. सोशल मीडिया पर मायावती की आलोचना हुई. पार्टी के अंदर भी इस फैसले को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं. ऐसा लगा कि मायावती अपने फैसले पर दोबारा विचार कर रही हैं. उन्होंने आकाश के लिए पार्टी में बने रहने का एक रास्ता खुला रखा.
मायावती ने एक्स पर लिखा कि आकाश के ससुर को न तो बसपा आंदोलन की चिंता है और न ही आकाश आनंद की. अगर वह अपने दामाद की मदद करना चाहते हैं तो उन्हें राजनीति से 'संन्यास' लेने की घोषणा करनी चाहिए.

बसपा प्रमुख मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं.
Photo Credit: Mayawati X
इसके बाद गुरुवार सुबह आकाश के ससुर सिद्धार्थ अशोक ने भावुक पोस्ट के जरिए राजनीति से विदाई की घोषणा की. उन्होंने कहा कि पार्टी और बहनजी के लिए वह अपनी जान तक देने को तैयार हैं. उन्होंने कभी पार्टी पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश नहीं की और न ही वह आकाश के संपर्क में रहे हैं.
बसपा सूत्रों का कहना है कि मायावती इससे बेहद नाराज हो गईं.
क्यों?
क्योंकि अशोक सिद्धार्थ ने अपना 'संन्यास' घोषित करने में 24 घंटे लगा दिए. हालांकि, सूत्रों का कहना है कि बुधवार को अशोक सिद्धार्थ की तबीयत खराब हो गई थी. उन्हें लखनऊ के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था. इसी वजह से मायावती के निर्देश पर उनकी प्रतिक्रिया में देरी हुई.
बसपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि पर्दे के पीछे इससे भी ज्यादा घटनाक्रम हुआ. बुधवार को बसपा के एक नेता ने आकाश से संपर्क किया और उनसे कहा कि वह अपने ससुर के खिलाफ मायावती की पोस्ट को रीपोस्ट करें.
बसपा में पर्दे के पीछे क्या हो रहा था
संयोग से तीन सितंबर को राष्ट्रीय संयोजक के पद से हटाए जाने के बाद आकाश ने एक्स पर अपना बायो बदल दिया था और अपने फोन से एक्स ऐप भी हटा दिया था. उन्होंने इसे सोशल मीडिया से कुछ समय के लिए दूरी बनाने का फैसला बताया था.
आकाश ने उस नेता से कहा कि जब मायावती को उन पर बिल्कुल भरोसा नहीं है तो उनकी पोस्ट रीपोस्ट करने का क्या फायदा? उन्होंने यह भी कहा कि मायावती ने एक्स पर उन्हें अपने भतीजे की बजाय अशोक सिद्धार्थ के दामाद के रूप में संबोधित किया है.
बसपा का वह नेता वापस गया और उसने यह बात मायावती को बता दी. यही आखिरी वजह बनी. मायावती ने अशोक सिद्धार्थ के संन्यास की घोषणा को 'बहुत कम और बहुत देर से उठाया गया कदम' माना और आकाश आनंद को पार्टी से निकाल दिया.
परिवारिक विवाद के पीछे सत्ता की लड़ाई
बसपा और मायावती को नई पीढ़ी के नेताओं की जरूरत है. उनके छोटे भतीजे ईशान आनंद अभी राजनीतिक रूप से अनुभवी नहीं हैं. उन्हें आकाश के विकल्प के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है. लेकिन पार्टी के अंदरूनी लोगों का कहना है कि आकाश के साथ जो हुआ, वही समस्या ईशान के साथ भी हो सकती है.
बसपा में मायावती के भरोसेमंद नेताओं के एक गुट और उनके परिवार के उन सदस्यों के बीच सत्ता की लड़ाई चल रही है, जिन्हें मायावती पार्टी में लाकर आगे बढ़ाती हैं. मायावती के भरोसेमंद ये नेता जानते हैं कि उन्हें कभी उत्तराधिकारी नहीं बनाया जाएगा. इसलिए अपने प्रभाव और राजनीतिक जगह को बचाए रखने के लिए वे परिवार से आने वाले नेताओं को कमजोर करने के तरीके खोजते हैं.

ऐसा माना जा रहा है कि बहुजन समाज पार्टी के अंदर आकाश विरोधी गुट उनके उदय के समय से ही काम कर रहा है.
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एक बसपा नेता ने कहा कि सिद्धार्थ अशोक के बढ़ते प्रभाव से दूसरे नेताओं और राष्ट्रीय समन्वयकों की राजनीतिक जगह कम हो गई थी. आकाश आनंद को उत्तराधिकारी बनाए जाने और उनकी बेटी की शादी के बाद अशोक की स्थिति और मजबूत हो गई. पार्टी में 'दामाद-ससुर' की बढ़ती भूमिका ने उन नेताओं को मौका दिया जो अपनी जगह को लेकर परेशान थे. उन्होंने बुआ और भतीजे के बीच दरार पैदा करने की कोशिश की.उन्होंने मायावती की व्यक्तिगत असुरक्षाओं का भी फायदा उठाया.
बसपा में नेताओं को कितनी मिलती है स्वतंत्रता
कुछ साल पहले मायावती ने लखनऊ के मॉल एवेन्यू स्थित अपने घर से बाहर निकलना काफी कम कर दिया था. इसके बाद वह पार्टी के बारे में जानकारी, राजनीतिक सूचनाओं और प्रतिक्रिया के लिए कुछ चुनिंदा नेताओं पर ज्यादा निर्भर होने लगीं.
मायावती हमेशा से पार्टी में नेताओं को ज्यादा स्वतंत्रता देने को लेकर बहुत सावधान रही हैं. वह किसी भी नेता द्वारा तय सीमा यानी 'लक्ष्मण रेखा' पार करने को बर्दाश्त नहीं करतीं.इन नेताओं को उनकी चिंताओं और असुरक्षाओं की जानकारी थी.
अतीत में मायावती ने आकाश के पिता आनंद कुमार, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू लाल कुशवाहा जैसे नेताओं के साथ भी इसी तरह की कार्रवाई की थी.
आनंद कुमार ने नोएडा अथॉरिटी में क्लर्क के रूप में काम शुरू किया था. लेकिन 2007 में मायावती के पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद उन्होंने कारोबार की ओर रुख किया. नोटबंदी के बाद कथित फर्जी कंपनियों से उनके संबंधों को लेकर उन्हें आयकर विभाग और ईडी की जांच का भी सामना करना पड़ा.
2014 के बाद जब लखनऊ में अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और केंद्र में बीजेपी की सरकार थी, तब मायावती के लिए अकेले पार्टी चलाना मुश्किल होता जा रहा था.ऐसे 2017 में उन्होंने आनंद कुमार को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया ताकि उनकी गैरमौजूदगी में वह पार्टी का काम संभाल सकें. लेकिन मायावती ने उनके अधिकारों पर सीमा लगा दी. उन्होंने आनंद कुमार को चुनाव लड़ने और पार्टी के महत्वपूर्ण मामलों और टिकट बांटने पर अंतिम फैसला लेने से रोक दिया. धीरे-धीरे पार्टी में उनका प्रभाव और नियंत्रण बढ़ने लगा. इसके साथ ही पार्टी के एक गुट की ओर से उनके खिलाफ शिकायतें भी बढ़ने लगीं.
मई 2018 में मायावती ने एक पार्टी बैठक में अपने भाई से पद छोड़ने को कहा. उन्होंने कहा कि अब वह एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह काम करेंगे ताकि बसपा पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप न लगे. लेकिन जून 2019 में यह व्यवस्था बदल गई. आनंद कुमार फिर पार्टी के उपाध्यक्ष बन गए और उनके बेटे आकाश को राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया.
मायावती से कौन कर रहा है आकाश की शिकायत
राष्ट्रीय समन्वयक और उत्तराधिकारी बनने के बाद आकाश अलग-अलग क्षेत्रों में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय रहे. सोशल मीडिया और न्यूज मीडिया में भी उन्हें लगातार प्रतिक्रिया मिलने लगी.
पुराने नेताओं ने मायावती से उनकी शिकायतें करना शुरू कर दिया. इनमें कहा गया कि आकाश मायावती के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं और दूसरे नेताओं के बजाय अपने ससुर के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. यह शिकायत भी की गई कि ससुर की सलाह पर आकाश पार्टी चलाने और चंदा जुटाने के पुराने तरीकों को बदलकर नई व्यवस्था लागू करना चाहते हैं.
इन शिकायतों ने मायावती के मन में आकाश को लेकर संदेह पैदा किया. पहले 2024 में आकाश को पार्टी से हटाया गया और उनका उत्तराधिकारी का दर्जा छीन लिया गया. बाद में मायावती ने उन्हें वापस लिया, लेकिन पार्टी में सत्ता की तलाश कर रहे नेताओं को पता था कि आकाश की मौजूदगी उनके लिए हमेशा चुनौती बनी रहेगी.
वे लगातार मायावती के सामने ऐसी 'जानकारियां' रखते रहे, जिनसे यह साबित करने की कोशिश की गई कि आकाश अपने ससुर की मदद से अपना अलग गुट बना रहे हैं और पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की कोशिश कर रहे हैं. इसी वजह से मायावती ने आकाश से उत्तराधिकारी का दर्जा वापस ले लिया और कहा कि जब तक वह खुद पार्टी में हैं, बसपा का कोई उत्तराधिकारी नहीं होगा.
बसपा में कौन है आकाश का विरोधी
आकाश आनंद के ताजा पद से हटाए जाने और निष्कासन की कहानी भी लगभग इसी तरह की है. सूत्रों के मुताबिक विदेश में पढ़े आकाश आनंद राष्ट्रीय संयोजक के रूप में पार्टी में नए जमाने के विचार और तरीके लाना चाहते थे. बताया जाता है कि उन्होंने सुझाव दिया था कि बसपा के पास मौजूद 600 करोड़ रुपये से ज्यादा के पार्टी फंड का इस्तेमाल पार्टी के विस्तार और चुनाव प्रचार के लिए किया जाना चाहिए. उन्होंने अगस्त में हाथरस के सादाबाद में एक रैली के जरिए 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए बसपा का अभियान शुरू किया था.इसके बाद पार्टी में चर्चा होने लगी कि आकाश टिकट बांटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.
हाथरस के बाद उनकी अगली रैली नोएडा के जेवर क्षेत्र में हुई. सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रीय संयोजक के रूप में आकाश ने रैली की जगह तय की थी.आकाश के विरोधियों ने मायावती से शिकायत की कि जेवर की रैली को बसपा के आधिकारिक सोशल मीडिया पेज पर लाइव नहीं दिखाया गया और इसमें आकाश के ससुर ने भी मदद की.इन शिकायतों के बाद मायावती ने उन्हें निर्देश दिया कि पार्टी का कोई भी कार्यक्रम आयोजित करने से पहले उनकी अनुमति लेना जरूरी होगा. इसके बाद मायावती ने तीन सितंबर को आकाश को उनके पद से हटा दिया.
बसपा सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के दो ताकतवर नेताओं की इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है. तीन सितंबर को आकाश को पद से हटाए जाने के बाद सोशल मीडिया पर नाराजगी देखने को मिली. दिल्ली के एक यूट्यूबर ने वीडियो पोस्ट कर सवाल उठाया कि बसपा किस तरह चलाई जा रही है. आकाश के ससुर ने इस वीडियो को रीपोस्ट कर दिया.
इस रीपोस्ट का स्क्रीनशॉट और वीडियो से जुड़ी पूरी जानकारी मायावती तक पहुंची.
बसपा के कुछ नेताओं का दावा है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता सतीश मिश्र ने यह जानकारी मायावती तक पहुंचाई. इसे आकाश और उनके ससुर की ओर से अनुशासनहीनता का सबूत माना गया. इसके तुरंत बाद मायावती ने अपने छोटे भतीजे ईशान आनंद को पार्टी का मुख्य सेक्टर प्रभारी बना दिया.
सत्ता की इस लड़ाई में दूसरे महत्वपूर्ण नेता बसपा के इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम हैं. रामजी गौतम ने बसपा में जमीनी स्तर से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था. आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ उनके शुरुआती राजनीतिक मार्गदर्शकों में से एक थे. दोनों पार्टी में राष्ट्रीय समन्वयक भी रह चुके हैं.
आकाश से रिश्ते के कारण सिद्धार्थ अशोक को पार्टी में एक अतिरिक्त फायदा मिलता था. यह बात रामजी गौतम को पसंद नहीं आई.दिलचस्प बात यह है कि जब भी सिद्धार्थ अशोक या आकाश आनंद बसपा में कमजोर हुए, उसका तत्काल फायदा रामजी गौतम को मिला. इस बार भी आकाश को पद से हटाए जाने के बाद मायावती ने रामजी गौतम को 10 राज्यों का सेक्टर प्रभारी बना दिया है.
बसपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं का दावा है कि तीन सितंबर की पार्टी बैठक में, जिसमें आकाश को पद से हटाया गया था, रामजी गौतम ने कहा था कि अगर आकाश को बसपा में काम करना है तो उनके ससुर को राजनीति छोड़नी होगी. नौ सितंबर को मायावती ने आकाश की वापसी पर विचार करने के लिए यही शर्त रख दी.

बसपा प्रमुख मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है.
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इससे काफी हद तक स्पष्ट हो गया कि पार्टी के अंदर आकाश के खिलाफ माहौल बनाने में कौन भूमिका निभा रहा था. राजनीति से 'संन्यास' की घोषणा करते हुए अशोक सिद्धार्थ ने अपनी भावुक पोस्ट में कहा कि उनके विरोधी मायावती को गलत जानकारी दे रहे हैं.
बसपा प्रमुख के डर की सबसे बड़ी वजह है
पुरुष शायद ही कभी यह बात पूरी तरह समझ पाएं कि भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए काम करना कितना मुश्किल है.
चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती के लिए भी यह अलग नहीं रहा. कांशीराम के साथ वह बसपा का चेहरा और पार्टी के लिए वोट जुटाने वाली सबसे बड़ी नेता रही हैं. इसके बावजूद उन्हें पार्टी के उन नेताओं की ओर से धोखा, पाला बदलने और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा, जो पूरी तरह उनके राजनीतिक प्रभाव पर निर्भर थे.
मायावती को हमेशा यह डर रहा है कि कोई उनके खिलाफ पार्टी में बगावत या नेतृत्व पर कब्जे की कोशिश कर सकता है.
हालांकि, चुनाव आयोग में बसपा की ओर से दर्ज केंद्रीय संगठन में ज्यादातर लोग मायावती के भरोसेमंद हैं. वे उनके खिलाफ बगावत करके आकाश या किसी दूसरे नेता के साथ मिलकर पार्टी का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की कोशिश नहीं करेंगे.
लेकिन मायावती कांशीराम नहीं हैं. कांशीराम ने 1977 से मायावती को तैयार किया, उनका राजनीतिक मार्गदर्शन किया और 2001 में एक सार्वजनिक रैली में उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था.
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