West Bengal SIR Process Controversy: पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में न्यायिक अधिकारियों को घंटों बंधक बनाए रखने की घटना ने अब गंभीर राजनीतिक मोड़ ले लिया है. एक तरफ जहां इस मामले में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के नेता मोफकरुल इस्लाम को गिरफ्तार किया गया है, वहीं दूसरी तरफ इंडियन सेक्युलर फ्रंट के नेताओं की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है. पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्रवाई ने इस पूरे मामले में संभावित राजनीतिक नेटवर्क और संगठित विरोध की आशंकाओं को और गहरा कर दिया है.
9 घंटे तक सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाकर रखा
बुधवार (1 अप्रैल) को मालदा के कालियाचक इलाके में SIR प्रक्रिया के दौरान तैनात सात न्यायिक अधिकारियों को गुस्साई भीड़ ने अचानक घेरकर उन्हें करीब 9 घंटे तक बंधक बनाए रखा. इस दौरान न सिर्फ ऑफिसर्स को धमकाया गया, बल्कि पुलिस फोर्स पर पत्थर भी फेंके गए. इसके बाद बड़ी मुश्किलों से भारी पुलिस फोर्स की तैनाती के बाद देर रात ऑफिसर्स को सुरक्षित बचाया गया.
AIMIM नेता की गिरफ्तारी और ISF पर शिकंजा
इस पूरी घटना में एक बड़ा मोड़ तब आया जब पुलिस ने AIMIM नेता मोफक्करुल इस्लाम को 'मुख्य साज़िशकर्ता' बताते हुए गिरफ्तार कर लिया. उसे बंगाल पुलिस के जरिए बागडोगरा एयरपोर्ट पर राज्य से भागने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया. पुलिस के मुताबिक, इस्लाम ने ही विरोध प्रदर्शन का आयोजन कर भीड़ को भड़काने में अहम भूमिका निभाई थी.
इस बीच, इस मामले में ISF का कनेक्शन भी सामने आया है.पुलिस ने ISF लीडर मौलाना शाहजहां अली समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया है, जिन पर हिंसा और न्यायिक अधिकारियों के घेराव में शामिल होने का आरोप है. इससे पता चलता है कि यह विरोध प्रदर्शन सिर्फ अचानक नहीं हुआ था, बल्कि इसमें कई संगठनों की भी सक्रिय भूमिका हो सकती है.
मतदाता सूची में 'अडजुडिकेशन'
इस पूरे हिंसक विरोध के केंद्र में चुनाव आयोग का SIR प्रोसेस है. दरअसल में, चुनाव आयोग के बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट से नाम हटाने और लाखों नामों को 'एडजुडिकेशन' में डालने के बाद कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए थे. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इस प्रोसेस के नाम पर जायज वोटरों के लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और केंद्रीय एजेंसी को जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ा रुख अपनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य प्रशासन को फटकार लगाते हुए इसे 'गंभीर नाकामी' बताया है और जांच सेंट्रल एजेंसी को सौंपने का निर्देश दिया है. साथ ही, अधिकारियों की सुरक्षा के लिए सेंट्रल फोर्स तैनात करने के निर्देश दिए हैं.
यह केवल विरोध था या सुनियोजित राजनीतिक रणनीति
बता दें कि यह मुद्दा राजनीतिक रूप से और भी ज़्यादा संवेदनशील हो गया है. जहां सत्ताधारी पार्टी इस घटना को बाहरी राजनीतिक दखल और साज़िश से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष इसे प्रशासनिक विफलता और लोगों का गुस्सा बता रहा है AIMIM और ISF की कथित भूमिका ने इस बहस को और हवा दे दी है कि क्या यह सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन था या एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति थी.
जांच एजेंसियों की रिपोर्ट तय करेगी मामले की दिशा
मालदा की यह घटना अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में नए समीकरणों और संभावित ध्रुवीकरण की ओर इशारा कर रही है.आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगी.
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